Sonia Gandhi

नई दिल्ली, 3 मार्च 2026: मध्य पूर्व (Middle East) में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की नृशंस हत्या के बाद जो भू-राजनीतिक (Geopolitical) ज्वालामुखी फटा है, उसकी राख अब भारत की घरेलू राजनीति पर भी गिरने लगी है। दुनिया जब तीसरे विश्व युद्ध (World War 3) की आहट से कांप रही है, तब नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में एक नया और तीखा राजनीतिक संग्राम छिड़ गया है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की पूर्व अध्यक्षा और वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने केंद्र की नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार पर एक बेहद तीखा और अभूतपूर्व कूटनीतिक प्रहार किया है। वर्तमान समय में सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचार मंचों पर एक ही हेडलाइन सबसे ज्यादा गूंज रही है— ईरान मुद्दा: Sonia Gandhi ने सरकार की चुप्पी को बताया विदेश नीति से विचलन

1. सोनिया गांधी का तीखा प्रहार: “सरकार की चुप्पी डराने वाली है”

सोमवार शाम को कांग्रेस मुख्यालय (AICC) से जारी एक विस्तृत प्रेस वक्तव्य में सोनिया गांधी ने मध्य पूर्व के ताजा हालात और उस पर भारत सरकार के आधिकारिक रुख (या रुख के अभाव) पर गंभीर सवाल खड़े किए।

उनका मुख्य आरोप यह है कि जब एक संप्रभु राष्ट्र (Sovereign Nation) के सर्वोच्च नेता की दूसरे देशों द्वारा एकतरफा कार्रवाई में हत्या कर दी जाती है, तो यह स्पष्ट रूप से अंतरराष्ट्रीय कानून (International Law) और संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) का उल्लंघन है। ऐसे में विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के स्वघोषित नेता भारत का इस मुद्दे पर स्पष्ट रूप से निंदा न करना एक बहुत बड़ी कूटनीतिक विफलता है।

ईरान मुद्दा: Sonia Gandhi ने सरकार की चुप्पी को बताया विदेश नीति से विचलन— इस बयान के पीछे सोनिया गांधी के तीन मुख्य तर्क हैं:

  • सिद्धांतों से समझौता: उन्होंने कहा, “भारत की विदेश नीति हमेशा से शांति, गुटनिरपेक्षता (Non-alignment) और दूसरे राष्ट्रों की संप्रभुता के सम्मान पर आधारित रही है। आज जब मध्य पूर्व को एक अंतहीन युद्ध में धकेला जा रहा है, तब हमारी सरकार की ‘चुप्पी’ (Deafening Silence) यह दर्शाती है कि हम अपने ऐतिहासिक सिद्धांतों से भटक गए हैं।”
  • अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी: कांग्रेस नेता ने जोर देकर कहा कि किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष या सर्वोच्च धार्मिक नेता की ‘टारगेटेड किलिंग’ (Targeted Killing) को सही नहीं ठहराया जा सकता। अगर भारत आज इस पर चुप रहता है, तो कल यह किसी भी अन्य विकासशील देश के साथ हो सकता है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का पतन: सोनिया गांधी ने मोदी सरकार पर परोक्ष रूप से आरोप लगाया कि भारत अब अमेरिकी दबाव या इजरायल के साथ अपने रक्षा संबंधों के कारण अपनी स्वतंत्र आवाज खो चुका है।
Sonia Gandhi

2. क्या है भारत की ऐतिहासिक विदेश नीति? (The Historical Context)

जब ईरान मुद्दा: Sonia Gandhi ने सरकार की चुप्पी को बताया विदेश नीति से विचलन की बात होती है, तो हमें भारत की आजादी के बाद की विदेश नीति के पन्नों को पलटना होगा।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (NAM – Non-Aligned Movement) की नींव रखी थी। इसका मूल उद्देश्य शीत युद्ध (Cold War) के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) दोनों खेमों से दूरी बनाए रखना और एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करना था।

मध्य पूर्व के प्रति भारत का ऐतिहासिक दृष्टिकोण:

  1. फिलिस्तीन का समर्थन: ऐतिहासिक रूप से, भारत ने हमेशा फिलिस्तीनी कॉज (Palestinian Cause) का पुरजोर समर्थन किया था। 1974 में, भारत फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को फिलिस्तीनी लोगों के एकमात्र और वैध प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बना था।
  2. ईरान के साथ सभ्यतागत संबंध: ईरान और भारत के बीच केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने सभ्यतागत और सांस्कृतिक संबंध (Civilizational Ties) रहे हैं। कांग्रेस के शासनकाल (इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह तक) में भारत ने ईरान के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे, भले ही अमेरिका ने ईरान पर कितने ही प्रतिबंध (Sanctions) क्यों न लगाए हों।
  3. सिद्धांत-आधारित कूटनीति (Principled Diplomacy): भारत हमेशा से दुनिया में ‘हस्तक्षेप न करने’ (Non-intervention) और किसी भी संप्रभु राष्ट्र पर बाहरी सैन्य हमले का मुखर विरोधी रहा है।

सोनिया गांधी का बयान इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से आता है। उनका मानना है कि वर्तमान सरकार ने इस ‘सिद्धांत-आधारित कूटनीति’ को ‘लेन-देन वाली कूटनीति’ (Transactional Diplomacy) में बदल दिया है।

3. मोदी सरकार की रणनीति: ‘चुप्पी’ नहीं, बल्कि ‘सामरिक संतुलन’ (Strategic Balancing)

विपक्ष के इन गंभीर आरोपों के बीच, हमें यह भी समझना होगा कि वर्तमान भारत सरकार इस मुद्दे पर जो रुख अपना रही है, क्या वह वाकई ‘चुप्पी’ है या फिर एक बहुत ही सोची-समझी ‘कूटनीतिक चाल’ (Calculated Diplomatic Move)?

सत्ता पक्ष और रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान मुद्दा: Sonia Gandhi ने सरकार की चुप्पी को बताया विदेश नीति से विचलन का दावा पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है। 2026 की दुनिया 1970 या 1980 के दशक की दुनिया से बिल्कुल अलग है। आज की कूटनीति गुटनिरपेक्षता (NAM) से आगे बढ़कर ‘बहु-गठबंधन’ (Multi-alignment) और ‘मुद्दे-आधारित भागीदारी’ (Issue-based Partnerships) पर आ गई है।

भारत सरकार के लिए ‘संतुलन’ क्यों आवश्यक है

  • इजरायल के साथ प्रगाढ़ रक्षा संबंध: भारत आज इजरायल का सबसे बड़ा रक्षा खरीदार (Defense Buyer) है। इजरायल ने करगिल युद्ध (1999) से लेकर बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019) तक हमेशा भारत का तकनीकी और रणनीतिक रूप से साथ दिया है। आतंकवाद के खिलाफ दोनों देशों का रुख एक समान है। ऐसे में भारत इजरायल की सीधी निंदा करके अपने इस ‘ऑल-वेदर’ दोस्त को खोना नहीं चाहता।
  • अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी (Strategic Partnership): चीन (China) के बढ़ते खतरे को काउंटर करने के लिए भारत को अमेरिका की सख्त जरूरत है। क्वाड (QUAD), iCET (क्रिटिकल और इमर्जिंग टेक्नोलॉजी), और सेमीकंडक्टर डील्स के जरिए भारत-अमेरिका संबंध अपने ऐतिहासिक चरम पर हैं।
  • अरब देशों (GCC) के साथ नए समीकरण: प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में सऊदी अरब (Saudi Arabia) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ भारत के संबंध अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंचे हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये सुन्नी बहुल अरब देश भी अंदरखाने शिया बहुल ईरान के प्रभाव से घबराते हैं। भारत का अरब देशों के साथ $100 बिलियन से अधिक का व्यापार है।

इसलिए, भारत सरकार की नीति यह है कि वह किसी एक पक्ष (ईरान या इजरायल/अमेरिका) का खुलकर समर्थन या विरोध करने के बजाय, कूटनीतिक भाषा में “संयम बरतने” (Exercising Restraint) और “तनाव को कूटनीति से सुलझाने” (De-escalation through diplomacy) की अपील कर रही है।

4. ईरान के साथ भारत के दांव पर लगे हित (India’s Stakes in Iran)

भले ही भारत इजरायल और अमेरिका के करीब जा रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत ईरान को नजरअंदाज कर सकता है। जब ईरान मुद्दा: Sonia Gandhi ने सरकार की चुप्पी को बताया विदेश नीति से विचलन की बात कांग्रेस उठाती है, तो वह भारत के उन आर्थिक और रणनीतिक हितों की ओर भी इशारा करती है जो ईरान से जुड़े हैं।

  1. चाबहार पोर्ट (Chabahar Port): यह भारत का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जो चीन चला रहा है) को काउंटर करने और अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया (Central Asia) तक सीधी पहुंच बनाने के लिए भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है। हाल ही में भारत ने इसे 10 साल तक संचालित करने का लॉन्ग-टर्म एग्रीमेंट भी साइन किया था।
  2. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC): यह एक 7,200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मोड ट्रांसपोर्ट नेटवर्क है जो भारत, ईरान, अजरबैजान, रूस और यूरोप को जोड़ता है। यह स्वेज नहर (Suez Canal) का विकल्प है। इस प्रोजेक्ट की सफलता पूरी तरह से ईरान की स्थिरता पर निर्भर है।
  3. ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ने ईरान से सीधे तेल खरीदना काफी कम कर दिया था, लेकिन फिर भी ईरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा के गणित में एक ‘स्विंग स्टेट’ की भूमिका निभाता है।
  4. हूती विद्रोहियों और समुद्री सुरक्षा का मुद्दा: लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर हमले करने वाले यमन के हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) को ईरान का समर्थन प्राप्त है। भारत को अपने समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखने के लिए ईरान के साथ बैक-चैनल बातचीत की आवश्यकता हमेशा रहती है।

यही कारण है कि भारत सरकार ईरान के खिलाफ किसी भी कड़े अमेरिकी प्रस्ताव का आँख बंद करके समर्थन नहीं कर सकती।

5. कूटनीति का घरेलू राजनीतिकरण: कांग्रेस बनाम बीजेपी (Domestic Political Fallout)

ईरान मुद्दा: Sonia Gandhi ने सरकार की चुप्पी को बताया विदेश नीति से विचलन — यह बयान केवल कूटनीति के लिए नहीं दिया गया है, बल्कि इसके गहरे घरेलू राजनीतिक (Domestic Politics) मायने भी हैं।

भारत में विदेश नीति अब बंद कमरों की चर्चा नहीं रही; यह चुनावी रैलियों और टीवी बहसों का मुख्य मुद्दा बन चुकी है।

  • अल्पसंख्यक वोट बैंक (Minority Vote Bank): भारत में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, जिसमें एक महत्वपूर्ण शिया (Shia) समुदाय भी शामिल है। ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या से इस समुदाय में भारी रोष है (जैसा कि कश्मीर, लखनऊ और कारगिल के विरोध प्रदर्शनों में देखा गया)। कांग्रेस का यह बयान इस समुदाय की भावनाओं को आवाज देने और उन्हें अपने पक्ष में लामबंद करने का एक प्रयास भी माना जा रहा है।
  • सत्ता पक्ष का पलटवार: बीजेपी और सत्ता पक्ष के नेताओं ने सोनिया गांधी के इस बयान पर तीखा पलटवार किया है। उनका तर्क है कि कांग्रेस ‘राष्ट्रीय हित’ (National Interest) को ताक पर रखकर ‘वोट बैंक की राजनीति’ (Appeasement Politics) कर रही है। सत्ता पक्ष का कहना है कि जब देश की अर्थव्यवस्था और 1 करोड़ प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा दांव पर हो, तब अति-आदर्शवाद (Idealism) नहीं, बल्कि यथार्थवाद (Pragmatism) की जरूरत होती है।
  • विपक्ष का एकजुट होना: सोनिया गांधी के इस बयान के बाद, लेफ्ट पार्टियों (CPI, CPI-M) और अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी केंद्र सरकार से मांग की है कि वह संसद का विशेष सत्र बुलाए और इस अंतरराष्ट्रीय संकट पर देश के सामने अपना स्पष्ट रुख (White Paper) रखे।

6. ग्लोबल साउथ की आवाज: क्या भारत अपना नैतिक प्रभाव खो रहा है?

सोनिया गांधी के बयान का एक बहुत ही महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहलू है—भारत की ‘ग्लोबल साउथ के नेता’ (Leader of the Global South) की छवि।

जी-20 (G-20) की सफल अध्यक्षता के दौरान भारत ने खुद को विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की सबसे मजबूत आवाज के रूप में पेश किया था। अफ्रीकी संघ (African Union) को G-20 में शामिल करवाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण था।

लेकिन, जब पश्चिमी देश (अमेरिका, ब्रिटेन, इजरायल) मिलकर मध्य पूर्व में एकतरफा कार्रवाइयां करते हैं, अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाते हैं और भारत उस पर मौन रहता है, तो अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी और अन्य एशियाई देशों में यह संदेश जा सकता है कि भारत अब पश्चिमी देशों के खेमे (Western Bloc) का हिस्सा बन गया है।

सोनिया गांधी का यही तर्क है कि ईरान मुद्दा: Sonia Gandhi ने सरकार की चुप्पी को बताया विदेश नीति से विचलन। उनके अनुसार, अगर भारत अन्याय के खिलाफ नहीं बोलेगा, तो वह ‘विश्व गुरु’ या ‘विश्व मित्र’ (Vishwa Mitra) बनने का नैतिक अधिकार (Moral High Ground) खो देगा। दूसरी ओर, चीन (China) और रूस (Russia) इस शून्यावकाश (Vacuum) का फायदा उठाकर मध्य पूर्व में अपने आप को शांतिदूत (Peacemakers) के रूप में स्थापित कर रहे हैं।

7. भारत सरकार के सामने वर्तमान चुनौतियां (The Tightrope Walk)

विपक्ष के हमलों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच, प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के सामने एक बेहद कठिन डगर (Tightrope Walk) है:

  1. 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षित वापसी (Evacuation): खाड़ी देशों में काम कर रहे 1 करोड़ से अधिक भारतीयों की सुरक्षा सरकार की सबसे बड़ी चिंता है। अगर भारत किसी भी एक पक्ष (ईरान या इजरायल) के खिलाफ बयानबाजी करता है, तो वहां फंसे भारतीयों के लिए खतरा बढ़ सकता है। सरकार की ‘चुप्पी’ दरअसल अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने की एक ‘सामरिक खामोशी’ (Strategic Silence) भी हो सकती है।
  2. पेट्रोल-डीजल के दाम और महंगाई: अगर युद्ध बढ़ता है और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद होता है, तो भारत में कच्चा तेल (Crude Oil) पहुंचना मुश्किल हो जाएगा। चुनाव या आर्थिक विकास के इस अहम दौर में सरकार महंगाई का जोखिम नहीं ले सकती।
  3. आतंकवाद पर कड़ा रुख: भारत दशकों से सीमा पार आतंकवाद (Cross-border Terrorism) का शिकार रहा है। भारत की आधिकारिक नीति हमेशा आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की रही है। चूंकि ईरान हमास (Hamas) और हिजबुल्लाह (Hezbollah) जैसे गुटों का समर्थन करता है, जिन्हें कई देश आतंकी संगठन मानते हैं, इसलिए भारत के लिए ईरान का सीधा बचाव करना वैचारिक रूप से भी एक विरोधाभास पैदा करता है।

8. निष्कर्ष: यथार्थवाद बनाम आदर्शवाद का द्वंद्व (Pragmatism vs Idealism)

भारतीय विदेश नीति के इतिहास में यह दौर एक बड़े ‘प्रतिमान बदलाव’ (Paradigm Shift) के रूप में दर्ज किया जाएगा।

ईरान मुद्दा: Sonia Gandhi ने सरकार की चुप्पी को बताया विदेश नीति से विचलन — यह बयान पूरी तरह से गलत नहीं है, क्योंकि यह सच है कि भारत अब नेहरूवादी आदर्शवाद (Nehruvian Idealism) से बहुत दूर निकल चुका है। लेकिन दूसरी तरफ, यह विचलन कोई अचानक नहीं हुआ है, बल्कि यह एक उभरती हुई विश्व शक्ति (Emerging Global Power) की भू-राजनीतिक मजबूरियों और राष्ट्रीय हितों का नतीजा है।

आज का भारत अंतरराष्ट्रीय संबंधों को ‘धर्म-अधर्म’ या ‘सही-गलत’ के चश्मे से देखने के बजाय, “क्या यह भारत के राष्ट्रीय हित (National Interest) में है?” इस कसौटी पर परखता है।

सोनिया गांधी का बयान एक स्वस्थ लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की आवश्यक भूमिका निभाता है। यह सरकार को याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश की कूटनीतिक साख केवल व्यापारिक सौदों से नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था (Just World Order) के लिए खड़े होने से भी बनती है।

आने वाले दिन भारतीय कूटनीति के लिए सबसे बड़े टेस्ट (Litmus Test) साबित होंगे। दुनिया यह देखेगी कि क्या भारत की ‘रणनीतिक खामोशी’ मध्य पूर्व में शांति ला पाती है, या यह चुप्पी भारत के पुराने दोस्तों (जैसे ईरान) को हमेशा के लिए दूर कर देती है।

By Isha Patel

Isha Patel Tez Khabri के साथ जुड़ी एक समाचार रिपोर्टर हैं। वे भारत और राज्यों से जुड़ी ताज़ा, ब्रेकिंग और जनहित से संबंधित खबरों को कवर करती हैं। Isha Patel शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर सत्यापित व तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करती हैं।

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