मध्य पूर्व (West Asia) इस समय इतिहास के सबसे नाजुक और विनाशकारी मोड़ों में से एक का सामना कर रहा है। 28 फरवरी, 2026 को शुरू हुए अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य अभियान—जिसे ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ (Operation Roaring Lion) या ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) नाम दिया गया है—ने पूरे क्षेत्र को एक व्यापक युद्ध की आग में धकेल दिया है।
आज, 7 मार्च 2026 को, यह युद्ध अपने दूसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) की मौत के बाद से भड़की यह चिंगारी अब लेबनान की घाटियों से लेकर हिंद महासागर की गहराइयों और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) तक फैल चुकी है।
1. 7 मार्च 2026: तेहरान और लेबनान पर इजरायल का प्रहार
7 मार्च की सुबह की शुरुआत भारी तबाही के साथ हुई। इजरायली रक्षा बलों (IDF) ने ईरानी राजधानी तेहरान और लेबनान में हिजबुल्लाह (Hezbollah) के ठिकानों पर अब तक का सबसे व्यापक हवाई हमला किया।
तेहरान में तबाही: इजरायल ने लगभग 80 लड़ाकू विमानों (Fighter jets) के बेड़े का उपयोग करते हुए तेहरान के पश्चिमी हिस्से और वहां के एक प्रमुख हवाई अड्डे पर भारी बमबारी की। एसोसिएटेड प्रेस (AP) और अन्य समाचार एजेंसियों के फुटेज में हवाई अड्डे से धुएं का विशाल गुबार उठता देखा गया। इजरायली सेना का मुख्य लक्ष्य ईरान के भूमिगत सैन्य बंकर, मिसाइल उत्पादन केंद्र और सैन्य नेतृत्व को नष्ट करना है। करमानशाह (Kermanshah) शहर के आसपास भी भारी विस्फोटों की खबरें हैं, जो ईरान के प्रमुख मिसाइल ठिकानों का घर माना जाता है।
लेबनान में खूनी संघर्ष: इजरायल केवल ईरान तक सीमित नहीं है; उसने लेबनान में भी अपने अभियानों को तेज कर दिया है।
- नबी चित (Nabi Chit) और पूर्वी लेबनान: लेबनानी स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, पूर्वी लेबनान में इजरायली कमांडो ऑपरेशन और हवाई हमलों में कम से कम 41 लोगों की मौत हो गई है।
- बेरूत (Beirut): बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में लगातार बमबारी जारी है। यह इलाका हिजबुल्लाह का मजबूत गढ़ माना जाता है, लेकिन यहां लाखों आम नागरिक भी रहते हैं। अब तक लेबनान में 217 से अधिक मौतें दर्ज की जा चुकी हैं और अस्पताल घायलों से भरे पड़े हैं। इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में अपने जमीनी नियंत्रण क्षेत्र को भी बढ़ा दिया है।
2. अमेरिका का कड़ा रुख: ट्रम्प की ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ की मां
इस युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका सीधे तौर पर शामिल है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) ने ईरान के प्रति अपनी नीति को बेहद आक्रामक कर दिया है।
“मध्य पूर्व का हारा हुआ देश” (Loser of the Middle East): 7 मार्च को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए, ट्रम्प ने कहा, “आज ईरान पर बहुत भारी प्रहार किया जाएगा!” उन्होंने ईरान को “मध्य पूर्व का लूजर” (The Loser of the Middle East) करार दिया और कहा कि जब तक ईरान आत्मसमर्पण नहीं करता या पूरी तरह से ढह नहीं जाता, तब तक यह स्थिति बनी रहेगी। ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका तब तक ईरान के साथ कोई समझौता नहीं करेगा जब तक कि वह “बिना शर्त आत्मसमर्पण” (Unconditional Surrender) नहीं कर देता।
हथियारों की ‘आपातकालीन’ बिक्री: कूटनीतिक बयानों से आगे बढ़ते हुए, अमेरिकी विदेश विभाग (US State Department) ने 6-7 मार्च को इजरायल को 151.8 मिलियन डॉलर मूल्य के 12,000 बम आवरणों (Bomb casings – 1,000 पाउंड/450 किलो) की “आपातकालीन” बिक्री को मंजूरी दे दी। सबसे खास बात यह है कि विदेश मंत्री ने अमेरिकी कांग्रेस (संसद) की समीक्षा को दरकिनार करते हुए इस हथियारों की बिक्री को सीधे मंजूरी दी है, जिसे लेकर अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। डेमोक्रेटिक नेताओं ने इसे प्रशासन द्वारा थोपा गया युद्ध करार दिया है।

3. ईरान की दोहरी रणनीति: खाड़ी देशों से माफी और अमेरिका को चुनौती
एक तरफ जहां ईरान सैन्य झटके झेल रहा है, वहीं वह कूटनीतिक रूप से अपने पड़ोसियों को शांत करने और अमेरिका-इजरायल को नुकसान पहुंचाने की दोहरी रणनीति अपना रहा है।
खाड़ी देशों को राष्ट्रपति पेजेशकियन का संदेश: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Masoud Pezeshkian) ने 7 मार्च को एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पड़ोसी खाड़ी देशों (सऊदी अरब, यूएई, बहरीन) पर हुए ईरानी हमलों के लिए माफी मांगी। उन्होंने इन हमलों को सेना के निचले स्तर पर “मिसकम्युनिकेशन” (Miscommunication) का परिणाम बताया। ईरान की अस्थायी नेतृत्व परिषद ने यह फैसला किया है कि वह खाड़ी देशों पर तब तक हमला नहीं करेगा जब तक कि उन देशों की धरती का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ न किया जाए।
हालांकि, अमेरिका की “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की मांग पर पेजेशकियन ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा कि यह एक ऐसा सपना है जिसे अमेरिकी अपने साथ “कब्र में ले जाएंगे।” संयुक्त राष्ट्र में ईरान के दूत अमीर सईद इरावानी ने भी ईरान के नेतृत्व परिवर्तन में अमेरिकी हस्तक्षेप को दृढ़ता से खारिज कर दिया।
होर्मुज जलडमरूमध्य में टैंकर पर हमला: खाड़ी देशों से माफी मांगने के बावजूद, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने वैश्विक व्यापार को बाधित करने का प्रयास जारी रखा है। 7 मार्च को, IRGC ने होर्मुज जलडमरूमध्य में ‘लुईस पी’ (Louise P) नामक मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाले एक तेल टैंकर को ड्रोन से निशाना बनाया। IRGC ने इस टैंकर को “आतंकवादी अमेरिका की संपत्ति” करार दिया।
4. युद्ध का बढ़ता दायरा: हिंद महासागर से इराक तक
यह संघर्ष अब केवल इजरायल और ईरान की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। इसके तार कई अन्य क्षेत्रों से जुड़ गए हैं:
- कुर्दिस्तान (Kurdistan) में ईरानी प्रहार: ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने इराक के स्वायत्त कुर्दिस्तान क्षेत्र में “अलगाववादी समूहों” (Separatist groups) के तीन ठिकानों पर ड्रोन से हमले किए हैं। ईरान का आरोप है कि ये गुट इस युद्ध का फायदा उठाकर ईरान की क्षेत्रीय अखंडता को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
- हिंद महासागर में नौसैनिक युद्ध: इस सप्ताह की शुरुआत में, श्रीलंका के तट से दूर हिंद महासागर में एक अमेरिकी पनडुब्बी (US Submarine) ने टारपीडो हमले से ईरान के एक युद्धपोत (IRIS Dena) को डुबो दिया था, जिसमें कम से कम 83 ईरानी सैनिक मारे गए थे। यह घटना दर्शाती है कि युद्ध का प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप के बेहद करीब आ चुका है।
- लेबनान में यूएन पीसकीपर्स (UN Peacekeepers) घायल: इजरायली मिसाइल हमले में लेबनान के कावजाह (Qawzah) शहर के पास घाना के दो संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है।
5. वैश्विक भू-राजनीति: रूस की एंट्री और भारत का रुख
जब भी मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन बिगड़ता है, वैश्विक महाशक्तियां सक्रिय हो जाती हैं। इस युद्ध में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
रूस का खुफिया समर्थन: अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों (7 मार्च) के अनुसार, एक बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। रूस (Russia) अब सक्रिय रूप से ईरान को खुफिया जानकारी प्रदान कर रहा है। इस जानकारी का उपयोग तेहरान द्वारा क्षेत्र में अमेरिकी युद्धपोतों, विमानों और अन्य संपत्तियों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। यह पहली बार है जब यह स्पष्ट संकेत मिला है कि मॉस्को इस युद्ध में परोक्ष रूप से शामिल हो रहा है, जो इसे एक वैश्विक प्रॉक्सी युद्ध (Global Proxy War) का रूप दे सकता है।
भारत का संतुलित रुख और कूटनीति: भारत के लिए यह स्थिति बेहद जटिल है। 26 फरवरी 2026 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल के दौरे पर थे और उनके वहां से निकलने के दो दिन बाद ही इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार (Gideon Sa’ar) ने स्पष्ट किया कि उन्होंने पीएम मोदी को इस हमले की पूर्व जानकारी नहीं दी थी क्योंकि इसका अंतिम निर्णय 28 फरवरी की सुबह ही लिया गया था।
भारत इस समय अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। 7 मार्च को भारत ने स्पष्ट किया कि वह रूस से तेल का आयात जारी रखेगा और उसे इसके लिए वाशिंगटन की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा, खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय कामगार रहते हैं, जिनकी सुरक्षा भारत सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है।

6. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रहार: तेल की कीमतें और व्यापार संकट
युद्ध का सबसे तत्काल और सीधा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, विशेषकर ऊर्जा क्षेत्र (Energy Sector) में।
- तेल की कीमतों में उछाल (Oil Price Surge): होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ‘चोकपॉइंट’ (Chokepoint) है, जहां से दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है। यहां ईरानी ड्रोन हमलों और अस्थिरता के कारण वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो गई है। नतीजतन, तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे दुनिया भर में मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
- उड्डयन और शिपिंग (Aviation & Shipping): दुबई और अबू धाबी जैसे प्रमुख उड्डयन केंद्रों के पास मिसाइल इंटरसेप्शन (Missile Interception) के कारण हवाई क्षेत्र प्रतिबंध लगाए गए हैं। कतर ने आंशिक रूप से अपना एयरस्पेस खोला है, लेकिन व्यावसायिक उड़ानें बुरी तरह प्रभावित हैं। इसी तरह, लाल सागर (Red Sea) और फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में मालवाहक जहाजों के लिए बीमा प्रीमियम रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गए हैं।
- भारतीय कॉरपोरेट्स का रुख: दिलचस्प बात यह है कि इस युद्ध के शुरू होने से ठीक पहले, भारतीय कॉरपोरेट जगत की शीर्ष सम्मेलनों में ईरान का जिक्र ना के बराबर था, जो यह दर्शाता है कि यह युद्ध कितनी तेजी से और अप्रत्याशित रूप से भड़का है।
7. आगे क्या? (Expert Analysis – EEAT परिप्रेक्ष्य)
एक एआई मॉडल के रूप में उपलब्ध डेटा का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह संघर्ष पिछले अरब-इजरायल युद्धों या ईरान-इजरायल छद्म युद्धों (Shadow wars) से काफी अलग है।
- लीडरशिप का अंत (Decapitation Strike): अयातुल्ला खामेनेई की हत्या ने ईरान के सत्ता तंत्र में एक बहुत बड़ा शून्य पैदा कर दिया है। यह सिर्फ एक सैन्य हमला नहीं है, बल्कि ईरान के शासन को भीतर से कमजोर करने या बदलने (Regime Change) का एक स्पष्ट अमेरिकी-इजरायली प्रयास है।
- गठबंधन की दरारें (Alliances under pressure): खाड़ी देशों (UAE, सऊदी अरब) में अमेरिका के प्रति भारी निराशा है। उन्हें लगता है कि अमेरिका ने हमले से पहले उन्हें चेतावनी नहीं दी और अब उनकी वायु रक्षा प्रणालियां (Air defense systems) ईरानी मिसाइलों को रोकने में खत्म हो रही हैं। खाड़ी देश ईरान को कमजोर तो देखना चाहते हैं, लेकिन अपनी धरती पर युद्ध के परिणाम भुगतना नहीं चाहते।
- लंबे युद्ध की चेतावनी: ईरान के IRGC ने स्पष्ट कर दिया है कि वे एक ‘लंबे युद्ध’ (Prolonged war) के लिए तैयार हैं। दूसरी ओर, इजरायल भी पीछे हटने के मूड में नहीं है और वह हिजबुल्लाह के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध है।
7 मार्च 2026 की स्थिति यह दर्शाती है कि कूटनीतिक समाधान (Diplomatic solution) फिलहाल दूर की कौड़ी है। जब तक कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप (जैसे तुर्किये या संयुक्त राष्ट्र द्वारा) सफल नहीं होता, तब तक मिसाइलों, ड्रोनों और लड़ाकू विमानों का यह खौफनाक शोर मध्य पूर्व के आसमान में गूंजता रहेगा। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या ईरान पूरी तरह से ढह जाएगा, या वह अमेरिका और इजरायल को एक ऐसे अंतहीन युद्ध में फंसा देगा जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकता है।

अंकिता गौतम एक अभिनेत्री, मॉडल और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं। Tez Khabri पर वे मनोरंजन जगत (Entertainment), बॉलीवुड और लाइफस्टाइल से जुड़ी हर छोटी-बड़ी अपडेट साझा करती हैं। अपनी रचनात्मक शैली और सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ के कारण, वे युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
