India-US Deal

भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक और व्यापारिक रिश्तों की बिसात पर फरवरी 2026 का यह सप्ताह इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रहा है। जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुए ‘अंतरिम व्यापार समझौते’ (Interim Trade Deal) को लेकर देश-दुनिया में उत्साह का माहौल था, वहीं दूसरी ओर वाशिंगटन से आई एक खबर ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।

यह मामला India-US Deal के उस आधिकारिक फैक्टशीट (Factsheet) से जुड़ा है, जिसे व्हाइट हाउस ने समझौते की घोषणा के ठीक बाद जारी किया था। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि जारी होने के महज 24 घंटे के भीतर व्हाइट हाउस ने इस दस्तावेज में चुपचाप कुछ अहम शर्तें बदल दीं। कूटनीति में शब्दों का हेरफेर केवल व्याकरण का मामला नहीं होता, बल्कि इसके गहरे कानूनी और रणनीतिक निहितार्थ होते हैं।

1. कूटनीतिक ड्रामा: क्या है पूरा मामला

9 फरवरी 2026 को व्हाइट हाउस ने एक ‘ऐतिहासिक ट्रेड डील’ की घोषणा करते हुए एक फैक्टशीट जारी की। इसमें भारत और अमेरिका के बीच होने वाले खरबों डॉलर के व्यापार और टैरिफ में कटौती का विस्तृत विवरण दिया गया था। भारत में इसे एक बड़ी जीत के रूप में देखा गया क्योंकि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले प्रभावी टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने का वादा किया था।

लेकिन 10 फरवरी 2026 की सुबह जब कूटनीतिक विश्लेषकों ने व्हाइट हाउस की वेबसाइट फिर से चेक की, तो फैक्टशीट का कलेवर बदला हुआ था। बिना किसी शोर-शराबे या आधिकारिक स्पष्टीकरण के, अमेरिका ने India-US Deal की कुछ सबसे महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताओं की भाषा को ‘नरम’ कर दिया और कुछ वस्तुओं को सूची से पूरी तरह बाहर कर दिया।

2. ‘Commit’ से ‘Intend’ तक का सफर: शब्दों की बाजीगरी

संशोधित फैक्टशीट में जो सबसे बड़ा बदलाव देखा गया, वह भारत की खरीद प्रतिबद्धता से जुड़ा है।

  • मूल फैक्टशीट (9 फरवरी): इसमें स्पष्ट लिखा था कि भारत अमेरिका से $500 बिलियन मूल्य की ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पादों की खरीद के लिए “प्रतिबद्ध” (Commits) है। यह एक कानूनी रूप से बाध्यकारी शब्द की तरह लग रहा था।
  • संशोधित फैक्टशीट (10 फरवरी): नए संस्करण में “Commits” शब्द को हटाकर “इरादा रखता है” (Intends) कर दिया गया।

इसका प्रभाव: कूटनीति में ‘Commit’ का मतलब होता है कि आपने वादा किया है जिसे आपको पूरा करना ही होगा। वहीं ‘Intends’ का मतलब होता है कि आपकी इच्छा तो है, लेकिन स्थितियाँ बदलने पर आप इससे पीछे हट सकते हैं। अमेरिका ने शायद भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) का सम्मान करते हुए या भारत के दबाव में इस भाषा को बदला है

India-US Deal

3. ‘दालों’ (Pulses) का रहस्य: आखिर सूची से बाहर क्यों?

भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। पहली फैक्टशीट में यह उल्लेख किया गया था कि भारत अमेरिकी दालों (विशेष रूप से मसूर और मटर) पर टैरिफ को कम या समाप्त करेगा।

हालांकि, 10 फरवरी की संशोधित फैक्टशीट से “Certain Pulses” (विशेष दालें) शब्द को पूरी तरह गायब कर दिया गया।

विश्लेषण: भारतीय किसान यूनियनों और घरेलू उद्योग ने संभवतः इस पर आपत्ति जताई होगी। भारत में दालों का उत्पादन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। यदि अमेरिका से सस्ती दालें भारत आने लगतीं, तो स्थानीय किसानों के हितों को नुकसान पहुँच सकता था। ऐसा लगता है कि भारत सरकार ने अंतिम समय में इस पर वीटो लगाया, जिसके कारण व्हाइट हाउस को अपना फैक्टशीट अपडेट करना पड़ा।

4. डिजिटल सर्विस टैक्स (DST): पर्दे के पीछे की जंग

एक और बड़ा बदलाव डिजिटल सर्विस टैक्स को लेकर हुआ। मूल फैक्टशीट में दावा किया गया था कि भारत अपने डिजिटल सेवा कर (जिसे ‘इक्वलाइजेशन लेवी’ भी कहा जाता है) को हटाने के लिए सहमत हो गया है। अमेरिका लंबे समय से इसे अमेरिकी तकनीकी दिग्गजों (Google, Amazon, Meta) के खिलाफ भेदभावपूर्ण मानता रहा है।

लेकिन संशोधित फैक्टशीट में “भारत डिजिटल टैक्स हटाएगा” वाले सीधे वाक्य को हटा दिया गया। इसके बजाय, अब इसमें केवल यह कहा गया है कि दोनों देश एक मजबूत डिजिटल व्यापार ढांचे पर बातचीत जारी रखने के लिए सहमत हुए हैं।

तुलनात्मक सारणी: क्या बदला? (9 Feb vs 10 Feb)

विषयमूल फैक्टशीट (9 फरवरी)संशोधित फैक्टशीट (10 फरवरी)
खरीद प्रतिबद्धताभारत $500B की खरीद के लिए Commits है।भारत $500B की खरीद का Intends रखता है।
कृषि उत्पादसूची में ‘Pulses’ शामिल थे।‘Pulses’ शब्द को हटा दिया गया
डिजिटल टैक्सभारत टैक्स हटाने पर सहमत।‘टैक्स हटाने’ का संदर्भ गायब
रूसी तेलखरीद रोकने पर सख्त भाषा।शर्तों को अधिक कूटनीतिक बनाया गया।

5. रूसी तेल और 25% दंडात्मक शुल्क का खेल

इस पूरी India-US Deal की सबसे बड़ी पृष्ठभूमि रूस-यूक्रेन संघर्ष और भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद है। अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारत पर 25% का अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क (Punitive Duty) लगाया था क्योंकि भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदना जारी रखा था।

India-US Deal

फरवरी 2026 के इस समझौते के तहत, अमेरिका इस 25% शुल्क को हटाने पर सहमत हुआ है। बदले में, भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को रूस से हटाकर अमेरिका और वेनेजुएला की ओर मोड़ने का आश्वासन दिया है।

6. $500 बिलियन का ‘खरीद लक्ष्य’: हकीकत या सपना?

संशोधित फैक्टशीट में ‘Intends’ शब्द आने के बावजूद, $500 बिलियन का आंकड़ा छोटा नहीं है। अगले 5 वर्षों में भारत को निम्नलिखित क्षेत्रों में भारी निवेश करना होगा:

  • ऊर्जा (Energy): अमेरिका से LNG और कोकिंग कोल का आयात।
  • रक्षा और उड्डयन (Defense & Aviation): एयर इंडिया और इंडिगो द्वारा बोइंग विमानों के बड़े ऑर्डर और GE F414 जेट इंजन का स्थानीय निर्माण।
  • तकनीक (Technology): ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) और डेटा सेंटर्स के लिए अमेरिकी चिप्स का आयात।

7. भारतीय शेयर बाजार पर प्रभाव: FPI की वापसी

जैसे ही इस डील की खबर फैली, भारतीय शेयर बाजार में ‘संजीवनी’ दौड़ गई। पिछले तीन महीनों से लगातार बिकवाली कर रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) फरवरी 2026 के पहले हफ्ते में ही नेट बायर्स बन गए हैं।

  • FPI निवेश: केवल फरवरी के शुरुआती दिनों में ही ₹8,100 करोड़ से अधिक की खरीदारी हुई है।
  • प्रमुख क्षेत्र: आईटी, फार्मा और टेक्सटाइल शेयरों में भारी उछाल देखा गया है।

बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि व्हाइट हाउस द्वारा शर्तों में किए गए ‘चुपचाप बदलाव’ से निवेशकों की अनिश्चितता कम हुई है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि भारत ने अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ से समझौता नहीं किया है।

8. रणनीतिक प्रभाव: चीन के खिलाफ ‘काउंटरवेट’

व्हाइट हाउस द्वारा फैक्टशीट में किए गए संशोधनों को केवल व्यापारिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। अमेरिका जानता है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन को संतुलित करने के लिए भारत उसका सबसे विश्वसनीय सहयोगी है।

शर्तों को नरम (Soften) करना इस बात का सबूत है कि राष्ट्रपति ट्रंप का प्रशासन भारत को दबाने के बजाय उसे साथ लेकर चलना चाहता है। अमेरिका ने वियतनाम, बांग्लादेश और मलेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के उत्पादों पर उच्च टैरिफ (करीब 35%) बनाए रखा है, जबकि भारत के लिए इसे घटाकर 18% कर दिया है। यह भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में एक रणनीतिक बढ़त देता है।

9. राजनीतिक प्रतिक्रिया: थरूर और सरकार का पक्ष

भारत में इस समझौते पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है। जहाँ वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे “भारत की जीत” बताया है, वहीं विपक्ष के नेता शशि थरूर ने इसे एक “प्री-कमिटेड परचेज एग्रीमेंट” (Pre-committed purchase agreement) करार दिया है।

थरूर का तर्क है कि अमेरिका ने भारत को खरबों डॉलर के सामान खरीदने के लिए मजबूर किया है। हालांकि, संशोधित फैक्टशीट में “Commits” की जगह “Intends” शब्द आने के बाद सरकार के पास विपक्ष के हमलों का जवाब देने के लिए मजबूत तर्क मिल गया है।

10. भविष्य की राह: क्या 2026 एक नया मोड़ है?

व्हाइट हाउस द्वारा शर्तों में किए गए इन बदलावों से यह स्पष्ट है कि India-US Deal अभी भी ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ है। दोनों देशों को मार्च 2026 के मध्य तक अंतिम कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने हैं। तब तक कूटनीतिक खींचतान जारी रहने की संभावना है।

भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अमेरिकी बाजार तक अपनी पहुंच बढ़ाते हुए अपने किसानों और डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty) की रक्षा कैसे करता है। दूसरी ओर, अमेरिका चाहेगा कि भारत उसकी ऊर्जा और रक्षा प्रौद्योगिकियों का सबसे बड़ा खरीदार बना रहे।

सावधानी भरा उत्साह

व्हाइट हाउस का फैक्टशीट को संशोधित करना हमें याद दिलाता है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कुछ भी ‘स्थायी’ नहीं होता। भारत और अमेरिका के बीच यह India-US Deal निस्संदेह भारत के आर्थिक भविष्य के लिए एक बड़ा बूस्ट है, लेकिन शर्तों में आए इन बदलावों ने हमें सचेत भी किया है।

खरीद प्रतिबद्धता को ‘इरादे’ में बदलना और दालों को सूची से हटाना भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा सकती है। यह दर्शाता है कि 2026 का भारत अपनी शर्तों पर सौदेबाजी करने में सक्षम है।

By Vivan Verma

विवान तेज खबरी (Tez Khabri) के समाचार रिपोर्टर हैं, जो ब्रेकिंग न्यूज़ और राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को कवर करते हैं। विवान तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और तेज अपडेट के लिए जाने जाते हैं और प्रशासनिक व जनहित से जुड़े मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *