भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक संबंध रहे हैं, जिन्हें ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ कहा जाता है। दोनों देशों के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी एक खुली सीमा (Open Border) है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और उत्तराखंड जैसे भारतीय राज्यों से होकर गुजरती है। यह खुली सीमा दोनों देशों के नागरिकों के लिए बिना वीज़ा और पासपोर्ट के आवाजाही की सुविधा प्रदान करती है। लेकिन, पिछले कुछ दशकों में इस खुली सीमा का फायदा उठाकर घुसपैठ, तस्करी और ‘नो मैंस लैंड’ (No Man’s Land) पर अवैध अतिक्रमण की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।
हाल ही में, नेपाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नेपाल में बालेंद्र शाह (बालेन शाह) के प्रधानमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करते ही देश की आंतरिक और बाह्य नीतियों में सख्ती देखी जा रही है। इस राजनीतिक बदलाव का सीधा असर भारत-नेपाल सीमा पर भी देखने को मिल रहा है। दोनों देशों की सरकारों ने सीमा की पवित्रता और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए हाल ही में शुरू हुए India Nepal Border Joint Survey ने दोनों देशों के बीच प्रशासनिक और कूटनीतिक हलचलों को तेज कर दिया है।
नेपाल में राजनीतिक फेरबदल और सीमा पर नई नीतिया
नेपाल की राजनीति हमेशा से ही उथल-पुथल भरी रही है। लेकिन 2026 में बालेंद्र शाह के नेतृत्व में बनी नई सरकार ने आते ही ‘एक्शन मोड’ अख्तियार कर लिया है। नई सरकार ने देश के भीतर कानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा है।
पदभार ग्रहण करते ही, नई सरकार ने नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली समेत कई बड़े नेताओं पर कार्रवाई की है। यह कार्रवाई मुख्य रूप से पिछले साल जेन जेड (Gen Z) के विरोध-प्रदर्शनों को दबाने और भ्रष्टाचार के मामलों से जुड़ी है। इस आंतरिक ‘क्लीन-अप’ अभियान के साथ-साथ, बालेंद्र शाह सरकार ने भारत के साथ संबंधों को एक नई, पारदर्शी और सुरक्षित दिशा देने का निर्णय लिया है। इसी कड़ी में सीमाओं पर अतिक्रमण और अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए भारत के साथ मिलकर एक वृहद अभियान शुरू किया गया है।
आखिर India Nepal Border Joint Survey की आवश्यकता क्यों पड़ी?
भारत और नेपाल की सीमा पूरी दुनिया में अपनी तरह की एक अनूठी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। लेकिन इसका खुलापन ही इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों ने कई ऐसी चुनौतियों को चिन्हित किया है, जिनके कारण यह सर्वे नितांत आवश्यक हो गया था:

1. नो मैंस लैंड (Dasgaja) पर बढ़ता अतिक्रमण
अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों ओर एक खाली पट्टी छोड़ी जाती है, जिसे ‘नो मैंस लैंड’ कहा जाता है। नेपाल में इसे ‘दसगजा’ (Dasgaja – 10 गज की भूमि) भी कहा जाता है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार इस क्षेत्र में कोई भी स्थायी या अस्थायी निर्माण नहीं किया जा सकता। लेकिन आबादी बढ़ने और स्थानीय प्रशासन की अनदेखी के कारण, इस खाली जमीन पर लोगों ने घर, दुकानें और यहां तक कि खेती करना भी शुरू कर दिया था। इस अतिक्रमण ने सीमा की स्पष्टता को धुंधला कर दिया था।
2. तीसरे देश के नागरिकों की घुसपैठ
चूंकि भारत-नेपाल सीमा खुली है, इसलिए पाकिस्तानी, चीनी, रोहिंग्या और अन्य तीसरे देशों के नागरिकों द्वारा अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने के लिए नेपाल के रास्ते का इस्तेमाल एक गंभीर सुरक्षा खतरा बन गया है। सीमा पर अवैध बस्तियां ऐसे घुसपैठियों के लिए छिपने का सबसे सुरक्षित ठिकाना (Safe Haven) बन जाती हैं।
3. मानव तस्करी, जाली नोट और मादक पदार्थों की तस्करी
खुली सीमा और ‘नो मैंस लैंड’ पर अनियंत्रित गतिविधियों के कारण तस्करों के हौसले बुलंद रहे हैं। भारत में जाली भारतीय मुद्रा (FICN), हथियार और मादक पदार्थों (Drugs) की तस्करी के लिए अक्सर इस बॉर्डर का इस्तेमाल होता रहा है।
इन सभी गंभीर समस्याओं को जड़ से खत्म करने के लिए ही दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने इस महा-सर्वेक्षण को हरी झंडी दिखाई है।
श्रावस्ती में हुई ऐतिहासिक ‘टीम-3’ की बैठक
इस वृहद सर्वेक्षण योजना को धरातल पर उतारने के लिए हाल ही में उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के कलेक्ट्रेट सभागार में ‘भारत-नेपाल संयुक्त सीमा सर्वेक्षण टीम-3’ की पहली अंतरराष्ट्रीय बैठक आयोजित की गई। बालेंद्र शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन को लेकर पहली इतनी उच्च स्तरीय बैठक थी।
इस बैठक की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें दोनों देशों के कई वरिष्ठ प्रशासनिक, पुलिस, वन विभाग और सुरक्षा बलों के अधिकारी शामिल हुए।
भारत का प्रतिनिधित्व: भारत की ओर से इस बैठक में श्रावस्ती के जिलाधिकारी (DM) अश्विनी कुमार पांडे, बलरामपुर के DM विपिन कुमार जैन के अलावा बहराइच, सिद्धार्थनगर और महराजगंज जिलों के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से श्रावस्ती के DM को सर्वे ‘टीम-3’ के लिए नोडल अधिकारी और ‘टीम लीडर’ नियुक्त किया गया है। उनका कार्य सभी संबंधित गतिविधियों की देखरेख और दोनों देशों के बीच सटीक समन्वय (Coordination) स्थापित करना है।
नेपाल का प्रतिनिधित्व: नेपाल की तरफ से इस महत्वपूर्ण बैठक में बर्दिया, बांके, रूपनदेही, दांग, कपिलवस्तु और नवलपरासी जिलों के मुख्य जिला अधिकारियों (CDO) ने हिस्सा लिया। नेपाली प्रतिनिधिमंडल में बर्दिया जिले के प्रमुख गोगन बहादुर हमाल टीम लीडर के रूप में शामिल हुए।
इसके अलावा, भारत की सीमा प्रहरी बल- सशस्त्र सीमा बल (SSB) की विभिन्न बटालियनों के कमांडेंट और नेपाल के आर्म्ड पुलिस फोर्स (APF) एवं नेपाल पुलिस के अधीक्षक भी इस बैठक का अहम हिस्सा रहे। इस बैठक में इस बात पर पूर्ण सहमति बनी कि ‘नो मैंस लैंड’ की शुचिता को हर हाल में बहाल किया जाएगा।
बिहार और उत्तर प्रदेश के 7 सीमावर्ती जिलों में हाई अलर्ट और ग्राउंड एक्शन
उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बिहार की सीमा पर भी इस संयुक्त अभियान ने गति पकड़ ली है। दोनों देशों ने अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे 7 प्रमुख जिलों (जिनमें बिहार के पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण शामिल हैं) में एक व्यापक सर्वे का काम शुरू कर दिया है।
रक्सौल (बिहार) में हुई अहम बैठक
24 मार्च 2026 को बिहार के रक्सौल में सशस्त्र सीमा बल (SSB) के मुख्यालय पर भारत और नेपाल की जॉइंट फील्ड सर्वे टीमों (FST) की पहली बैठक हुई। इस बैठक की अध्यक्षता पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल ने की।
भारतीय दल में सुपौल, मधुबनी, सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक (SP) शामिल थे। वहीं नेपाली प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सिराहा के DM सुरेंद्र पौडेल ने किया, जिनके साथ धनुषा, सिराहा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बारा, परसा और चितवन जिलों के शीर्ष अधिकारी मौजूद थे।
इस बैठक में साफ किया गया कि यह India Nepal Border Joint Survey का मुख्य एजेंडा सीमांकन को स्पष्ट करना और सीमा स्तंभों (Border Pillars) की वास्तविक स्थिति की जांच करना है।
सीमा स्तंभों (Border Pillars) का रखरखाव और तकनीकी सर्वेक्षण
भारत और नेपाल के बीच की सीमा का निर्धारण ब्रिटिश काल में 1816 की सुगौली संधि (Treaty of Sugauli) के तहत हुआ था। इस सीमा को स्पष्ट करने के लिए हजारों पिलर (स्तंभ) लगाए गए हैं, जिन्हें मुख्य स्तंभ (Main Pillar), उप-स्तंभ (Subsidiary Pillar) और लघु स्तंभ (Minor Pillar) में बांटा गया है।
समय के साथ, नदियों के बहाव (जैसे गंडक, कोसी, और महाकाली नदियां अक्सर अपना रास्ता बदलती हैं), बाढ़ और असामाजिक तत्वों द्वारा छेड़छाड़ के कारण कई पिलर या तो बह गए हैं, टूट गए हैं या अपनी जगह से गायब कर दिए गए हैं।
इस संयुक्त सर्वेक्षण के दौरान निम्नलिखित तकनीकी पहलुओं पर काम किया जा रहा है:
- GPS और सैटेलाइट मैपिंग: आधुनिक ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) और सैटेलाइट इमेजरी का उपयोग करके पुराने नक्शों का मौजूदा भौगोलिक स्थिति के साथ मिलान किया जा रहा है।
- स्तंभों की मरम्मत और नवनिर्माण: जो पिलर जर्जर अवस्था में हैं, उनकी मरम्मत की जा रही है। जहां पिलर गायब हैं, वहां दोनों देशों के सर्वेयर मिलकर निशानदेही कर रहे हैं और नए पिलर स्थापित कर रहे हैं।
- गायब निशानों की पुनर्स्थापना: कई जगह जहां ‘नो मैंस लैंड’ की पहचान पूरी तरह मिट चुकी थी, वहां लाल झंडियों और अस्थायी मार्किंग के जरिए सीमा रेखा को फिर से खींचा जा रहा है।
इन सभी तकनीकी पहलुओं को India Nepal Border Joint Survey के अंतर्गत शामिल किया गया है ताकि भविष्य में सीमा विवाद की कोई गुंजाइश न रहे।
अतिक्रमण पर बुलडोज़र: ‘नो मैंस लैंड’ को खाली कराने का महा-अभियान
जैसे-जैसे सर्वे टीम आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे ‘नो मैंस लैंड’ पर किए गए अवैध कब्जों को हटाने की कार्रवाई भी तेज हो गई है। दोनों तरफ की सरकारों ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर किसी भी प्रकार का अवैध अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
- नेपाली प्रशासन की कार्रवाई: पिछले कुछ दिनों में नेपाली प्रशासन ने रक्सौल के पास सीमा से सटे अहिरावा टोला और प्रेमनगर जैसे इलाकों में सघन अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया है। यहां ‘नो मैंस लैंड’ पर लोगों ने पक्के मकान और दुकानें बना ली थीं, जिन्हें भारी पुलिस बल की मौजूदगी में ध्वस्त कर दिया गया।
- SSB का कड़ा रुख: भारतीय सीमा के भीतर भी अवैध निर्माणों पर गाज गिरी है। SSB (सशस्त्र सीमा बल) ने पलानवा इलाके में बनी कई अवैध इमारतों को जमींदोज कर दिया है।
इस कार्रवाई को लेकर SSB की 47वीं बटालियन के कमांडेंट संजय पांडे ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “बॉर्डर की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह कार्रवाई की जा रही है और किसी भी अवैध कब्जे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” यह सख्त संदेश उन सभी अतिक्रमणकारियों के लिए है जो सीमावर्ती क्षेत्रों में कानून को ताक पर रखकर बैठे थे।

Boundary Working Group और 12वीं सर्वे कमिटी की सिफारिशें
यह अचानक लिया गया कोई एकतरफा फैसला नहीं है, बल्कि यह एक सुविचारित द्विपक्षीय प्रक्रिया का हिस्सा है। रक्सौल में हुई बैठक के दौरान पूर्वी चंपारण के DM सौरभ जोरवाल ने इस बात पर जोर दिया कि Field Survey Team (FST) पूरी तरह से ‘7वें बाउंड्री वर्किंग ग्रुप’ (7th Boundary Working Group – BWG) के निर्देशों और ’12वीं सर्वे ऑफिशियल कमिटी’ (Survey Official Committee) की सिफारिशों के अनुरूप काम कर रही है।
BWG भारत और नेपाल के सर्वेयर जनरलों का एक संयुक्त निकाय है, जिसे सीमा संबंधी तकनीकी और जमीनी मुद्दों को सुलझाने का कार्य सौंपा गया है। इस कमिटी का स्पष्ट मैंडेट है कि दोनों देशों की संप्रभुता (Sovereignty) का सम्मान करते हुए सीमांकन को वैज्ञानिक और त्रुटिहीन बनाया जाए।
सशस्त्र सीमा बल (SSB) की भूमिका और चुनौतियां
भारत की ओर से नेपाल और भूटान सीमाओं की सुरक्षा का जिम्मा ‘सशस्त्र सीमा बल’ (SSB) के कंधों पर है। 2001 में ‘वन बॉर्डर, वन फोर्स’ के सिद्धांत के तहत SSB को इस खुली सीमा की सुरक्षा सौंपी गई थी।
SSB की भूमिका किसी अन्य बॉर्डर गार्डिंग फोर्स (जैसे BSF जो पाकिस्तान-बांग्लादेश सीमा पर तैनात है) से काफी अलग और चुनौतीपूर्ण है। चूंकि यहां बाड़ (Fencing) नहीं है और लोगों का रोजमर्रा का आना-जाना है, इसलिए SSB को ‘पीपुल फ्रेंडली’ (जनता के अनुकूल) फोर्स के रूप में काम करना पड़ता है।
लेकिन इसी दोस्ताना रवैये का फायदा उठाकर आतंकी और तस्कर सीमा पार करने की कोशिश करते हैं। इसलिए, जब अतिक्रमण हटता है और ‘नो मैंस लैंड’ साफ होता है, तो SSB जवानों के लिए पेट्रोलिंग (गश्त) करना और रात के अंधेरे में थर्मल इमेजर और नाइट विजन कैमरों के जरिए घुसपैठियों पर नजर रखना बहुत आसान हो जाता है।
एक महीने का अल्टीमेटम: रिपोर्ट और आगे की राह
दोनों देशों के प्रशासनों ने इस काम को ‘मिशन मोड’ में लिया है। उम्मीद जताई जा रही है कि यह साझा सर्वे और अतिक्रमण हटाने का काम महज एक महीने के अंदर पूरा कर लिया जाएगा। Field Survey Team (FST) को 15 दिनों के अंदर दोनों देशों के गृह मंत्रालयों (Ministry of Home Affairs) को अपनी अंतरिम रिपोर्ट (Interim Report) सौंपने का लक्ष्य दिया गया है।
एक बार यह सर्वे पूरा हो जाने पर, दोनों देशों की खुली सीमा पर पुलिस, कस्टम, और सीमा सुरक्षा बलों के बीच तालमेल और प्रबंधन (Border Management) को मजबूती मिलेगी। इससे न केवल अपराधों में कमी आएगी बल्कि वैध व्यापार और आवाजाही को भी सुगम बनाया जा सकेगा।
भारत-नेपाल कूटनीतिक संबंधों का नया अध्याय
कूटनीतिक दृष्टि से India Nepal Border Joint Survey एक मील का पत्थर है। पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर जब नेपाल में वामपंथी (कम्युनिस्ट) सरकारें सत्ता में थीं, तब भारत और नेपाल के संबंधों में कई बार खटास देखने को मिली थी। ‘कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख’ जैसे नक्शे के विवादों ने दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया था।
लेकिन, नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के नेतृत्व में नेपाल ने एक अधिक व्यावहारिक और संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया है। बालेन शाह की सरकार यह समझती है कि नेपाल के आर्थिक विकास, व्यापार और सुरक्षा के लिए भारत के साथ मजबूत और विश्वासपूर्ण संबंध अनिवार्य हैं। यह जॉइंट सर्वे दोनों देशों के बीच उसी खोए हुए ‘पारस्परिक विश्वास’ (Mutual Trust) को बहाल करने की दिशा में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक कदम है।
भू-राजनीतिक मायने (Geopolitical Implications)
दक्षिण एशिया की राजनीति में इस India Nepal Border Joint Survey के भू-राजनीतिक मायने भी बेहद गहरे हैं। चीन पिछले एक दशक से नेपाल में अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और भारी निवेश के जरिए नेपाल को भारत के प्रभाव क्षेत्र से दूर करने की कोशिश कर रहा है। चीन की यह कोशिश रही है कि वह नेपाल का इस्तेमाल भारत के खिलाफ एक रणनीतिक बफर के रूप में करे।
भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा कड़ी होने और अवैध गतिविधियों पर लगाम लगने से चीन द्वारा प्रायोजित जासूसी या भारत विरोधी तत्वों की घुसपैठ पर सीधा प्रहार होगा। जब भारत और नेपाल मिलकर सीमा प्रबंधन का कार्य करते हैं, तो इससे यह कूटनीतिक संदेश भी पूरी दुनिया को जाता है कि दोनों देश अपने द्विपक्षीय मुद्दों को सुलझाने में पूरी तरह सक्षम हैं और इसमें किसी तीसरे देश (विशेषकर चीन) के हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
स्थानीय निवासियों पर प्रभाव और सामाजिक सामंजस्य
‘नो मैंस लैंड’ पर अतिक्रमण हटाने से उन स्थानीय लोगों को जरूर परेशानी हो रही है जिन्होंने पीढ़ियों से वहां अपना डेरा जमा लिया था। हालांकि, प्रशासन इन लोगों को समझाने और शांतिपूर्ण तरीके से हटने का मौका दे रहा है।
दोनों देशों की सरकारें इस बात को लेकर बेहद सतर्क हैं कि इस सर्वे और कार्रवाई से आम नागरिक (जो ‘रोटी-बेटी’ के रिश्ते के तहत रोजाना सीमा पार करते हैं) परेशान न हों। सीमा पर रहने वाले नागरिकों को यह समझना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है। एक बार जब सीमा स्पष्ट हो जाएगी, तो निर्दोष नागरिकों को सुरक्षा बलों द्वारा अनावश्यक पूछताछ का सामना नहीं करना पड़ेगा, और केवल आपराधिक तत्व ही रडार पर होंगे।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि India Nepal Border Joint Survey केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों के खिलाफ भारत और नेपाल का एक संयुक्त शंखनाद है। नेपाल में बालेंद्र शाह की नई सरकार का यह एक्शन मोड इस बात का प्रमाण है कि दोनों राष्ट्र अब किसी भी प्रकार के सीमाई अपराध, घुसपैठ और आतंकवाद को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपना रहे हैं।
श्रावस्ती से लेकर रक्सौल तक, सीमा पर जो हलचल आज देखने को मिल रही है, वह भविष्य के एक सुरक्षित और समृद्ध भारत-नेपाल संबंधों की नींव रख रही है। ‘नो मैंस लैंड’ की सफाई और सीमा स्तंभों का जीर्णोद्धार न केवल भौगोलिक सीमाओं को स्पष्ट करेगा, बल्कि दोनों देशों के दिलों की दूरियों को भी मिटाकर एक अटूट विश्वास कायम करेगा।
अंतरराष्ट्रीय सीमा को निर्धारित करने वाले पिलर्स के दोनों ओर (भारत और नेपाल के मामले में आमतौर पर 10 गज दोनों तरफ) छोड़ी गई खाली जमीन को ‘नो मैंस लैंड’ कहते हैं। इसे बफर ज़ोन भी कहा जाता है। अंतरराष्ट्रीय नियम के अनुसार, इस जगह पर न तो भारत का और न ही नेपाल का कोई नागरिक स्थायी निर्माण कर सकता है।
इस जॉइंट सर्वे का मुख्य उद्देश्य गायब या क्षतिग्रस्त हो चुके सीमा स्तंभों (Border Pillars) को खोजना, उनकी मरम्मत करना, नए पिलर स्थापित करना और ‘नो मैंस लैंड’ पर हुए अवैध कब्जों (मकान, दुकान, खेती) को हटाना है।
भारत की ओर से नेपाल (और भूटान) सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाले ‘सशस्त्र सीमा बल’ (SSB) के पास है।
खुली सीमा का मतलब दोनों देशों के नागरिकों की बिना वीज़ा मुक्त आवाजाही है, इसका मतलब यह नहीं है कि भौगोलिक सीमाएं समाप्त हो गई हैं। तस्करों, घुसपैठियों (जैसे तीसरे देश के नागरिक) और असामाजिक तत्वों को रोकने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों को अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का सटीक पता होना जरूरी है।
नेपाल में प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की नई सरकार के गठन के बाद प्रशासन में सख्ती आई है। नई सरकार भारत के साथ संबंधों को सुधारने और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इस सीमा अतिक्रमण के खिलाफ जीरो-टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है।

भावेश Tez Khabri के सह-संस्थापक और प्रबंध संपादक हैं। अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के बाद, अब वे पत्रकारिता के माध्यम से समाज में पारदर्शिता लाने का प्रयास कर रहे हैं। भावेश जी मुख्य रूप से राजनीति, क्राइम और शिक्षा से जुड़ी खबरों का नेतृत्व करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि हर खबर पूरी तरह से सत्यापित (Verified) हो।
