Childhood Obesity in India

नई दिल्ली (4 मार्च 2026): भारत को हमेशा से कुपोषण (Malnutrition) की समस्या से जूझने वाले देश के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में एक नई और बेहद खतरनाक स्वास्थ्य समस्या ने देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। एक हालिया और चौंकाने वाली वैश्विक स्वास्थ्य रिपोर्ट (Global Health Report) में यह बात सामने आई है कि भारत बच्चों के मोटापे में दुनिया में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा न केवल माता-पिता के लिए बल्कि देश के स्वास्थ्य नीति निर्माताओं (Health Policymakers) के लिए भी खतरे की एक बड़ी घंटी है।

1. The Shocking Global Report: भारत बच्चों के मोटापे में दुनिया में दूसरे नंबर पर कैसे पहुंचा

हाल ही में प्रकाशित हुई वैश्विक स्वास्थ्य और पोषण रिपोर्ट में 1990 से लेकर अब तक के डेटा का विश्लेषण किया गया है। इस रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में करोड़ों बच्चे और किशोर मोटापे का शिकार हैं, और इस सूची में चीन के बाद भारत का स्थान आता है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु (Key Highlights of the Report):

  • आंकड़ों में बेतहाशा वृद्धि: रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में 5 से 19 वर्ष की आयु के लगभग 1.25 करोड़ (12.5 मिलियन) से अधिक बच्चे मोटापे का शिकार हैं।
  • लड़के और लड़कियों दोनों में खतरा: इस मोटापे की दर लड़कों और लड़कियों दोनों में समान रूप से खतरनाक गति से बढ़ रही है।
  • दोगुना बोझ (Double Burden): भारत एक अनोखी और चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना कर रहा है। एक तरफ हमारे देश के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में बच्चे अभी भी अंडरवेट (Underweight) और कुपोषण का शिकार हैं, वहीं शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में ‘ओवरवेट’ (Overweight) और मोटापे की समस्या महामारी का रूप ले चुकी है।
  • वैश्विक रैंकिंग (Global Ranking): कुल संख्या के मामले में भारत ने कई विकसित देशों को पीछे छोड़ दिया है, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हमारी जीवनशैली (Lifestyle) और खानपान में भारी और नकारात्मक बदलाव आए हैं।

यह रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भारत को भविष्य में एक बीमार युवा पीढ़ी का सामना करना पड़ेगा, जो देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए एक बड़ा झटका होगा।

Childhood Obesity in India

2. Root Causes of Childhood Obesity: बच्चों में तेजी से बढ़ता मोटापा, आखिर जिम्मेदार कौन?

भारत बच्चों के मोटापे में दुनिया में दूसरे नंबर पर यूं ही नहीं पहुंच गया है। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और जीवनशैली से जुड़े कारण (Root Causes) हैं। हमारे समाज का ढांचा और काम करने का तरीका पिछले 20 सालों में पूरी तरह से बदल गया है। आइए इन कारणों को विस्तार से समझते हैं:

A. Dietary Shift: जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (Ultra-Processed Foods) की मार

भारतीय थाली, जो कभी दाल, रोटी, हरी सब्जियां और छाछ से भरी होती थी, आज पिज्जा, बर्गर, इंस्टेंट नूडल्स और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स (Cold Drinks) से रिप्लेस हो गई है।

  • चीनी और नमक की अधिकता (High Sugar and Salt): पैकेटबंद स्नैक्स और बिस्किट्स में ‘हिडन शुगर’ (Hidden Sugar) और सोडियम की मात्रा बहुत अधिक होती है।
  • कैलोरी सरप्लस (Calorie Surplus): बच्चे दिन भर में जितनी कैलोरी जलाते हैं, उससे कहीं ज्यादा कैलोरी वे इन जंक फूड्स के माध्यम से ग्रहण कर रहे हैं।
  • मार्केटिंग का मायाजाल: टीवी और सोशल मीडिया पर बच्चों को लुभाने वाले विज्ञापनों (Aggressive Marketing) की भरमार है। अपने चहेते कार्टून कैरेक्टर या सेलिब्रिटी को जंक फूड खाते देख बच्चे भी उसी की जिद करते हैं।

B. The Sedentary Lifestyle: मोबाइल स्क्रीन और कम फिजिकल एक्टिविटी का खतरनाक कॉम्बिनेशन

एक समय था जब बच्चे शाम होते ही खेल के मैदानों (Playgrounds) में क्रिकेट, फुटबॉल या पकड़म-पकड़ाई खेलने निकल जाते थे। आज वह जगह स्मार्टफोन्स और वीडियो गेम्स ने ले ली है।

  • बढ़ता स्क्रीन टाइम (Screen Time): ऑनलाइन क्लासेज, रील्स (Reels), यूट्यूब और गेमिंग के कारण बच्चों का स्क्रीन टाइम 5 से 6 घंटे प्रतिदिन तक पहुंच गया है।
  • मैदानों की कमी: तेजी से हो रहे शहरीकरण (Urbanization) के कारण शहरों में खुले खेल के मैदान कम हो गए हैं। सुरक्षा कारणों से भी माता-पिता बच्चों को बाहर भेजने से कतराते हैं।
  • सुविधाओं की आदत: स्कूल जाने के लिए बस या कार, और तीसरी मंजिल पर जाने के लिए लिफ्ट—इन सुविधाओं ने बच्चों की रोजमर्रा की शारीरिक गतिविधि (Physical Activity) को लगभग शून्य कर दिया है।

C. Psychological and Genetic Factors (मनोवैज्ञानिक और आनुवांशिक कारण)

  • तनाव और इमोशनल ईटिंग (Emotional Eating): पढ़ाई का प्रेशर या अकेलापन बच्चों में तनाव पैदा करता है, जिससे वे ‘कम्फर्ट फूड’ (ज्यादातर मीठा या तला हुआ) ज्यादा खाने लगते हैं।
  • जेनेटिक्स (Genetics): अगर माता-पिता मोटापे का शिकार हैं, तो बच्चों में भी इसके होने की संभावना बढ़ जाती है, हालांकि खराब जीवनशैली इसे ट्रिगर करने का सबसे बड़ा कारण है।

3. Health Risks & Consequences: मोटापे के कारण बच्चों को घेर रही हैं गंभीर बीमारियां (Health Hazards)

मोटापा अपने आप में एक बीमारी है, और यह कई अन्य जानलेवा बीमारियों को निमंत्रण देता है। जब बच्चे कम उम्र में ही मोटापे का शिकार हो जाते हैं, तो उनके शरीर के अंग समय से पहले ही बूढ़े होने लगते हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव (Physical Health Impacts):

  1. टाइप 2 डायबिटीज (Type 2 Diabetes): जो बीमारी पहले 40-50 साल की उम्र के वयस्कों को होती थी, वह अब 10-12 साल के बच्चों में धड़ल्ले से पाई जा रही है। मोटापे के कारण शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) पैदा हो जाता है।
  2. हृदय रोग और हाई ब्लड प्रेशर (Cardiovascular Diseases): बच्चों की धमनियों (Arteries) में कोलेस्ट्रॉल जमा होने लगता है, जिससे कम उम्र में ही हाई बीपी और भविष्य में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
  3. फैटी लिवर (Non-Alcoholic Fatty Liver Disease): जंक फूड के अत्यधिक सेवन से बच्चों के लिवर पर चर्बी जमा होने लगती है, जो लिवर डैमेज का कारण बन सकती है।
  4. स्लीप एप्निया और अस्थमा (Sleep Apnea & Asthma): वजन अधिक होने के कारण बच्चों को सोते समय सांस लेने में तकलीफ होती है और वे अक्सर खर्राटे लेते हैं।
  5. हड्डियों की समस्याएं (Orthopedic Issues): अधिक वजन के कारण बच्चों के घुटनों और रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे फ्लैट फीट और जोड़ों में दर्द की शिकायत होती है।

4. Mental Health Impact: मोटापे का बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर गहरा असर

रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि मोटापे का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता; यह बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य (Mental Well-being) को बुरी तरह से कुचल देता है।

  • बॉडी शेमिंग और बुलिंग (Bullying & Body Shaming): स्कूलों में मोटे बच्चों को अक्सर उनके वजन को लेकर चिढ़ाया जाता है। दोस्त उन्हें खेलों में शामिल नहीं करते।
  • कम आत्मविश्वास (Low Self-Esteem): लगातार मजाक उड़ाए जाने के कारण बच्चों का आत्मविश्वास टूट जाता है। वे खुद को दूसरों से कमतर समझने लगते हैं।
  • डिप्रेशन और एंग्जायटी (Depression and Anxiety): सामाजिक अलगाव (Social Isolation) के कारण बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। वे अपनी भावनाएं किसी से साझा नहीं कर पाते और अपना दुख भुलाने के लिए फिर से खाने (Overeating) का सहारा लेते हैं।
  • ईटिंग डिसऑर्डर (Eating Disorders): कई बार वजन कम करने के दबाव में बच्चे खाना-पीना बिल्कुल छोड़ देते हैं या एनोरेक्सिया (Anorexia) जैसी खतरनाक मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाते हैं।
Childhood Obesity in India

5. Government Initiatives and Policy Action: सरकार और हेल्थ एजेंसियों (Health Agencies) की क्या है जिम्मेदारी?

भारत बच्चों के मोटापे में दुनिया में दूसरे नंबर पर है, इस कलंक को मिटाने के लिए केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियों को भी युद्ध स्तर पर काम करना होगा।

क्या कदम उठाए जा रहे हैं और क्या और करने की आवश्यकता है?

पॉलिसी एक्शन (Policy Action)वर्तमान स्थिति और आवश्यकता (Current Status & Need)
FSSAI की गाइडलाइंसभारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने स्कूलों की कैंटीन के 50 मीटर के दायरे में जंक फूड की बिक्री पर रोक लगाई है। इसे सख्ती से लागू करने की जरूरत है।
शुगर टैक्स (Sugar Tax)मेक्सिको और यूके की तर्ज पर भारत सरकार को भी अत्यधिक मीठे पेय पदार्थों (Sugary Drinks) पर अतिरिक्त टैक्स (Sugar Tax) लगाना चाहिए ताकि इनकी खपत कम हो सके।
फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग (FOPL)पैकेटबंद खाने पर स्पष्ट रूप से रेड अलर्ट या स्टार रेटिंग होनी चाहिए, जिससे माता-पिता को पता चल सके कि उत्पाद में कितना नमक, चीनी या फैट है।
ईट राइट स्कूल (Eat Right School)स्कूलों में मिड-डे मील (Mid-day Meal) के साथ-साथ पोषण (Nutrition) को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
विज्ञापन पर रोक (Ban on Targeted Ads)बच्चों के टीवी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अनहेल्दी फूड्स के विज्ञापनों पर सख्त प्रतिबंध लगना चाहिए।

6. Prevention & Action Plan: Parents के लिए अपने बच्चों को फिट रखने के 5 अचूक उपाय

बच्चों का पहला स्कूल उनका घर होता है। एक स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण की शुरुआत घर की रसोई से ही होती है। अगर आप माता-पिता हैं, तो इस वैश्विक रिपोर्ट को एक चेतावनी के रूप में लें। यहां कुछ व्यावहारिक और Actionable Tips दिए गए हैं:

1. ‘रोल मॉडल’ बनें (Be a Role Model)

बच्चे वही करते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। अगर आप खुद चिप्स खाते हुए टीवी देखेंगे, तो आप बच्चे से सेब खाने की उम्मीद नहीं कर सकते। परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ खानपान की आदतें अपनाएं।

2. संतुलित आहार (Balanced Diet) की वापसी

  • अपनी रसोई से रिफाइंड शुगर, मैदा और ट्रांस-फैट (Trans-fat) को बाहर करें।
  • टिफिन में पैकेज्ड जूस या बिस्किट की जगह ताजे फल, नट्स (सूखे मेवे), मखाना, या घर पर बने पराठे दें।
  • ‘कलरफुल प्लेट’ रूल अपनाएं—बच्चे की थाली में अलग-अलग रंगों की सब्जियां और सलाद शामिल करें।
  • पानी पीने की आदत डालें। कोल्ड ड्रिंक्स और पैक्ड जूस को पूरी तरह ‘ना’ कहें।

3. फिजिकल एक्टिविटी को रूटीन बनाएं (Make Physical Activity Fun)

  • बच्चों को दिन में कम से कम 60 मिनट (1 घंटा) पसीना बहाने वाली फिजिकल एक्टिविटी करनी चाहिए।
  • उन्हें किसी खेल (क्रिकेट, स्विमिंग, बैडमिंटन) या डांस/मार्शल आर्ट्स क्लास में डालें।
  • सप्ताहांत (Weekends) पर परिवार के साथ मॉल जाने के बजाय, किसी पार्क में साइकिलिंग या ट्रेकिंग के लिए जाएं।

4. स्क्रीन टाइम का सख्त नियम (Strict Screen Time Rule)

  • 2 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम ‘जीरो’ (Zero) होना चाहिए।
  • बड़े बच्चों के लिए मनोरंजन का स्क्रीन टाइम दिन में 1 से 2 घंटे तक सीमित करें।
  • बेडरूम और डाइनिंग टेबल को ‘नो-स्क्रीन जोन’ (No-Screen Zone) घोषित करें। खाना खाते समय टीवी या मोबाइल बिल्कुल न देखें, इससे बच्चे ओवरईटिंग नहीं करेंगे।

5. पर्याप्त और अच्छी नींद (Adequate Sleep)

नींद की कमी सीधे मोटापे से जुड़ी है। जब बच्चा कम सोता है, तो उसके शरीर में ‘घ्रेलिन’ (Ghrelin) हार्मोन बढ़ता है, जो भूख बढ़ाता है। उम्र के अनुसार बच्चों को 8 से 10 घंटे की गहरी और शांत नींद मिलनी चाहिए। सोने से एक घंटे पहले सभी गैजेट्स बंद कर दें।

7. The Future Ahead: क्या भारत इस ‘ओबेसिटी एपिडेमिक’ (Obesity Epidemic) से लड़ पाएगा?

भारत एक युवा देश है। हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारा ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (Demographic Dividend) यानी हमारी युवा आबादी है। लेकिन अगर हमारी यह युवा आबादी मोटापे, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के साथ बड़ी होगी, तो यह ताकत हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाएगी।

भारत बच्चों के मोटापे में दुनिया में दूसरे नंबर पर है, यह रिपोर्ट (Report on Child Obesity) मात्र एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि हमारे समाज के लिए एक दर्पण है। हमें यह समझना होगा कि बच्चों को प्यार दिखाने का मतलब उन्हें चॉकलेट या पिज्जा खिलाना नहीं है। सच्चा प्यार उन्हें एक स्वस्थ शरीर और स्वस्थ दिमाग देना है।

स्कूलों, माता-पिता, समाज और सरकार—सभी को मिलकर एक ‘स्वस्थ भारत अभियान’ (Healthy India Movement) को जमीनी स्तर पर उतारना होगा। हमें पारंपरिक भारतीय खानपान—जो फाइबर, मोटे अनाज (Millets) और पोषण से भरपूर है—की ओर वापस लौटना होगा।

By Meera Shah

मीरा तेज खबरी (Tez Khabri) के साथ जुड़ी एक समाचार लेखिका हैं। वे सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, महिला संबंधित विषयों और जनहित से जुड़ी खबरों पर लेखन करती हैं। मीरा का उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में सत्यापित, उपयोगी और भरोसेमंद जानकारी पहुंचाना है।

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