Greenland Geopolitical Crisis 2026: क्या दुनिया एक और बड़े युद्ध की दहलीज पर खड़ी है? हाल ही में वाशिंगटन से आए एक बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ग्रीनलैंड (Greenland) में बढ़ते चीनी और रूसी प्रभाव को रोकने के लिए “सैन्य कार्रवाई” से भी पीछे नहीं हटेगा। इस बयान के बाद यूरोपीय संघ (EU) ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “लोकतंत्र और संप्रभुता पर हमला” करार दिया है।
ग्रीनलैंड पर महायुद्ध की आहट? अमेरिका की ‘सैन्य कार्रवाई’ वाली धमकी ने पूरी दुनिया में मचाया हड़कंप!
यह एक अत्यंत गंभीर और समसामयिक भू-राजनीतिक (Geopolitical) विषय है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ता तनाव भविष्य के वैश्विक समीकरणों को बदल सकता है।
1. विवाद की जड़: आखिर अमेरिका क्यों चाहता है ग्रीनलैंड?
ग्रीनलैंड तकनीकी रूप से डेनमार्क (Denmark) के अधीन એક स्वायत्त क्षेत्र है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका की नजर इस पर टिकी है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इसे खरीदने की इच्छा जताई थी, लेकिन 2026 में यह मामला केवल ‘सौदे’ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ‘सुरक्षा’ का मुद्दा बन गया है।

मुख्य कारण:
- रणनीतिक स्थिति (Strategic Location): ग्रीनलैंड उत्तरी ध्रुव (Arctic) के केंद्र में स्थित है। यहाँ से रूस और यूरोप दोनों पर नजर रखी जा सकती है।
- दुर्लभ खनिज (Rare Earth Minerals): ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ पिघल रही है, जिससे ग्रीनलैंड के नीचे दबे सोने, हीरे, यूरेनियम और सबसे महत्वपूर्ण— लिथियम और कोबाल्ट के भंडार सामने आ रहे हैं। ये खनिज इलेक्ट्रिक कारों और आधुनिक हथियारों के लिए अनिवार्य हैं।
- चीन का बढ़ता दखल: चीन यहाँ ‘पोलर सिल्क रोड’ बनाने की कोशिश कर रहा है और भारी निवेश के जरिए बंदरगाहों पर कब्जा करना चाहता है, जिसे अमेरिका अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।
2. अमेरिका की ‘सैन्य कार्रवाई’ वाली धमकी का सच
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) के एक हालिया बयान में कहा गया, “यदि ग्रीनलैंड का उपयोग हमारे दुश्मनों द्वारा रणनीतिक बेस के रूप में किया जाता है, तो अमेरिका अपनी रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने और आवश्यक सैन्य कार्रवाई करने के लिए तैयार है।”
इस बयान का सीधा मतलब है कि अमेरिका अब कूटनीति से ऊपर उठकर ‘बल प्रयोग’ की भाषा बोल रहा है। अमेरिका का तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस की बढ़ती परमाणु पनडुब्बियों और चीन के शोध केंद्रों को रोकने के लिए ग्रीनलैंड का अमेरिकी नियंत्रण में होना जरूरी है।
3. यूरोप की तीखी प्रतिक्रिया: “यह उपनिवेशवाद है”
यूरोपीय संघ और विशेष रूप से डेनमार्क ने अमेरिका के इस रुख की कड़ी निंदा की है।
- डेनमार्क का स्टैंड: डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और न ही यह किसी की जागीर है। किसी भी प्रकार का सैन्य दबाव अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन होगा।”
- यूरोपीय संघ (EU): ब्रुसेल्स में हुई बैठक में यूरोपीय नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड में एकतरफा हस्तक्षेप करता है, तो यूरोप और अमेरिका के बीच NATO (नाटो) गठबंधन खतरे में पड़ सकता है।

4. आर्कटिक की जंग: रूस और चीन का एंगल
ग्रीनलैंड केवल अमेरिका और यूरोप का मामला नहीं रह गया है।
- रूस: रूस ने पहले ही आर्कटिक क्षेत्र में अपने कई पुराने सैन्य बेस फिर से शुरू कर दिए हैं। रूस का कहना है कि अमेरिका की विस्तारवादी नीति वैश्विक शांति के लिए खतरा है।
- चीन: चीन खुद को ‘नियर-आर्कटिक स्टेट’ (Near-Arctic State) घोषित कर चुका है। वह ग्रीनलैंड के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) में अरबों डॉलर निवेश कर रहा है ताकि भविष्य के समुद्री व्यापार मार्गों पर उसका नियंत्रण हो सके।
5. ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनलैंड का भविष्य
विडंबना यह है कि यह पूरा तनाव जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की वजह से पैदा हुआ है।
- बर्फ का पिघलना: जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, नए जहाजरानी मार्ग (Shipping Routes) खुल रहे हैं। ये मार्ग पनामा और स्वेज नहर की तुलना में एशिया और यूरोप के बीच की दूरी को 40% तक कम कर देते हैं।
- संसाधनों की लूट: जो देश ग्रीनलैंड पर हावी होगा, वही भविष्य के इन व्यापारिक मार्गों और प्राकृतिक संसाधनों का राजा होगा।
6. क्या युद्ध होकर रहेगा? (The Potential Outcome)
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल पूर्ण युद्ध की संभावना कम है, लेकिन एक ‘शीत युद्ध 2.0’ (Cold War 2.0) निश्चित रूप से शुरू हो चुका है।
- सैन्य जमावड़ा: अमेरिका अपने थुले एयर बेस (Thule Air Base) को अपग्रेड कर रहा है।
- राजनैतिक अस्थिरता: ग्रीनलैंड के भीतर भी दो गुट बन गए हैं—एक जो स्वतंत्रता चाहता है और दूसरा जो अमेरिका के करीब जाना चाहता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
ग्रीनलैंड अब केवल एक शांत बर्फ का द्वीप नहीं रहा, बल्कि यह 21वीं सदी का नया युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका की धमकी और यूरोप की जवाबी प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि भविष्य में संसाधनों की लड़ाई कितनी भयानक हो सकती है।
भारत जैसे देशों के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि आर्कटिक में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर वैश्विक मानसून और समुद्र के बढ़ते स्तर पर पड़ेगा।
