अंतरराष्ट्रीय कूटनीति (International Diplomacy) में शब्दों का चयन बहुत मायने रखता है। आमतौर पर बयानों को चीनी की चाशनी में लपेटकर पेश किया जाता है, भले ही संदेश कड़वा क्यों न हो। लेकिन जब दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति का राष्ट्रपति किसी संप्रभु राष्ट्र को “खरीदने” की पेशकश एक रियल एस्टेट डील की तरह करे, तो कूटनीतिक मर्यादाएं तार-तार हो जाती हैं।
आज की सुबह विश्व राजनीति के लिए एक स्तब्ध कर देने वाली खबर लेकर आई है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका के पुराने नाटो सहयोगी डेनमार्क के बीच शब्दों का एक ऐसा युद्ध छिड़ गया है, जिसने शालीनता की सारी हदें पार कर दी हैं। ग्रीनलैंड (Greenland) को खरीदने की ट्रंप की जिद पर डेनमार्क के एक वरिष्ठ सांसद ने वह कह दिया है जो आज तक किसी पश्चिमी राजनेता ने अमेरिकी राष्ट्रपति को सार्वजनिक मंच पर नहीं कहा।
संसद भवन के बाहर मीडिया से बात करते हुए, डेनमार्क के सांसद (जिनका नाम गोपनीयता और सुरक्षा कारणों से अभी विवादित है, लेकिन वे दक्षिणपंथी पार्टी से ताल्लुक रखते हैं) ने सीधे कैमरे में देखते हुए कहा: “Mr. President, F* Off. ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है, और हम आपके गुलाम नहीं हैं।”**
यह बयान जंगल की आग की तरह फैल गया है। वाशिंगटन से लेकर मॉस्को तक और बीजिंग से लेकर ब्रुसेल्स तक, हर कोई इस अभूतपूर्व कूटनीतिक पतन (Diplomatic Meltdown) का विश्लेषण कर रहा है। आखिर मामला यहां तक कैसे पहुंचा? क्यों ट्रंप बर्फ से ढके इस द्वीप के पीछे पड़े हैं? और इस गाली के बाद अमेरिका-यूरोप संबंधों का क्या होगा?
भाग 1: विवाद की जड़ – “द डील ऑफ द सेंचुरी” या “बदतमीजी”?
इस पूरे विवाद की शुरुआत कल रात हुई जब राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट साझा की। इसमें उन्होंने ग्रीनलैंड के एक तटीय गांव के ऊपर चमकते हुए ट्रम्प टॉवर की एक फोटोशॉप की हुई तस्वीर (या वैचारिक ग्राफिक) पोस्ट की और लिखा: “वादा करता हूँ, मैं ग्रीनलैंड में ऐसा नहीं करूँगा… लेकिन डेनमार्क के साथ एक बड़ी डील के लिए तैयार हूँ। अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदने के लिए गंभीर है। यह डेनमार्क के लिए एक बोझ है, हमारे लिए एक संपत्ति।”
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड में रुचि दिखाई है। अपने पिछले कार्यकाल (2019) में भी उन्होंने ऐसी ही इच्छा जाहिर की थी, जिसे डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने “बेतुका” (Absurd) करार दिया था। उस समय ट्रंप ने नाराज होकर डेनमार्क का अपना राजकीय दौरा रद्द कर दिया था।
लेकिन 2026 में, स्थिति अलग है। ट्रंप की वापसी के बाद उनकी विदेश नीति और अधिक आक्रामक और लेन-देन (Transactional) वाली हो गई है। व्हाइट हाउस के सूत्रों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने इस बार केवल ट्वीट नहीं किया, बल्कि डेनमार्क सरकार को एक औपचारिक प्रस्ताव (Formal Offer) भेजा था, जिसमें ग्रीनलैंड के बदले अरबों डॉलर और ” Puerto Rico के साथ अदला-बदली” जैसे अजीबोगरीब विकल्प शामिल थे।

डेनमार्क का गुस्सा क्यों फूटा? डेनमार्क के लोगों के लिए यह स्वाभिमान का प्रश्न है। ग्रीनलैंड 18वीं सदी से डेनमार्क के साम्राज्य (Kingdom of Denmark) का हिस्सा है। हालांकि 1979 में इसे होम रूल (Home Rule) मिला और 2009 में स्वशासन (Self-Rule), लेकिन विदेश नीति और सुरक्षा अभी भी कोपेनहेगन के पास है।
डेनमार्क के राजनेताओं का मानना है कि 21वीं सदी में किसी देश या उसके लोगों को “मवेशियों या फर्नीचर” की तरह खरीदा या बेचा नहीं जा सकता। ट्रंप का प्रस्ताव उन्हें 19वीं सदी की उपनिवेशवादी मानसिकता (Colonial Mindset) की याद दिलाता है। यही कारण है कि डेनमार्क के सांसद का सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने “F-word” का इस्तेमाल कर डाला। यह गुस्सा केवल उस सांसद का नहीं, बल्कि पूरे यूरोप का है जो अमेरिका के “बुलिंग” (Bullying) रवैये से थक चुका है।
भाग 2: ग्रीनलैंड का भूगोल और महत्व – अमेरिका को यह क्यों चाहिए?
आम आदमी के लिए ग्रीनलैंड केवल बर्फ, ग्लेशियर और ध्रुवीय भालुओं का घर हो सकता है। लेकिन भू-राजनीतिक रणनीतिकारों (Geopolitical Strategists) के लिए, यह दुनिया का सबसे कीमती “रियल एस्टेट” है।
1. आर्कटिक का प्रवेश द्वार (Gateway to the Arctic) ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है। इससे नए समुद्री रास्ते (Shipping Routes) खुल रहे हैं जो एशिया और यूरोप/अमेरिका के बीच की दूरी को काफी कम कर देंगे। जो देश ग्रीनलैंड को नियंत्रित करेगा, वह इन भविष्य के व्यापार मार्गों पर राज करेगा।
2. दुर्लभ खनिजों का खजाना (Rare Earth Minerals) यह सबसे बड़ा आर्थिक कारण है। ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे दुर्लभ मृदा खनिजों (Rare Earth Elements – REEs) का विशाल भंडार है।
- नियोडिमियम, प्रेजोडिमियम, डिस्प्रोसियम: ये वो खनिज हैं जिनका उपयोग स्मार्टफ़ोन, इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी, विंड टर्बाइन, फाइटर जेट्स और मिसाइल गाइडेंस सिस्टम में होता है।
- चीन का एकाधिकार: वर्तमान में, दुनिया के 70% से अधिक दुर्लभ खनिजों पर चीन का नियंत्रण है। अमेरिका चीन पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहता है। ग्रीनलैंड पर नियंत्रण का मतलब है चीन की टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन पर पकड़ को तोड़ना।
3. सैन्य रणनीति (Military Strategy) शीत युद्ध के दौरान भी ग्रीनलैंड महत्वपूर्ण था और आज भी है।
- थुले एयर बेस (Thule Air Base): अमेरिका का पहले से ही उत्तरी ग्रीनलैंड में एक विशाल एयर बेस है। यह अमेरिका का सबसे उत्तरी सैन्य अड्डा है। यहां लगे रडार रूस से आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को डिटेक्ट करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- रूस और चीन पर नजर: रूस अपनी आर्कटिक सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है। चीन खुद को “नियर-आर्कटिक स्टेट” घोषित कर चुका है। अमेरिका नहीं चाहता कि उसके पिछवाड़े (Backyard) में चीन या रूस की कोई दखलंदाजी हो।
भाग 3: क्या किसी देश को खरीदा जा सकता है? (इतिहास के पन्ने)
ट्रंप का प्रस्ताव सुनने में जितना अजीब लगता है, अमेरिकी इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं। अमेरिका ने अपना विस्तार “खरीदकर” ही किया है।
- लुइसियाना परचेज (1803): अमेरिका ने फ्रांस से विशाल भू-भाग खरीदा।
- अलास्का (1867): अमेरिका ने रूस से अलास्का को मात्र 7.2 मिलियन डॉलर में खरीदा था। उस समय इसे “सीवार्ड की मूर्खता” कहा गया था, लेकिन आज अलास्का तेल और संसाधनों का गढ़ है।
- वर्जिन आइलैंड्स (1917): अमेरिका ने डेनमार्क से ही वेस्ट इंडीज (अब यूएस वर्जिन आइलैंड्स) को सोने के सिक्कों के बदले खरीदा था।
ग्रीनलैंड को खरीदने की पिछली कोशिशें:
- 1867: अमेरिकी विदेश विभाग ने पहली बार ग्रीनलैंड और आइसलैंड को खरीदने का विचार किया था।
- 1946: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने डेनमार्क को ग्रीनलैंड के लिए 100 मिलियन डॉलर (सोने में) देने की पेशकश की थी। डेनमार्क ने तब भी विनम्रता से मना कर दिया था।
फर्क यह है कि 1946 में यह कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से गुप्त रूप से किया गया था। 2026 में, ट्रंप ने इसे ट्विटर (X) और टीवी पर एक तमाशा बना दिया है। और सबसे बड़ी बात, 1946 में “आत्मनिर्णय” (Self-determination) का अधिकार इतना प्रबल नहीं था जितना आज है। आज ग्रीनलैंड के 56,000 लोग अपनी नियति खुद तय करने का अधिकार रखते हैं।
भाग 4: डेनमार्क सांसद का गुस्सा – “F*** Off” के मायने
उस डेनिश सांसद का बयान केवल एक गाली नहीं है। यह यूरोप में अमेरिका के प्रति बदलते नजरिए का प्रतीक है।
सांस्कृतिक टकराव: स्कैंडिनेवियाई देश (डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे) अपनी विनम्रता, समतावादी समाज और कूटनीतिक शालीनता के लिए जाने जाते हैं। वहां का कोई राजनेता सार्वजनिक रूप से ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करता। यदि किसी ने ऐसा किया है, तो इसका मतलब है कि अपमान की सीमा पार हो चुकी है।
सांसद ने अपने बयान में आगे कहा: “यह सोचना कि हम 2026 में लोगों को बेच सकते हैं, यह दर्शाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का मानसिक स्तर क्या है। ग्रीनलैंड के लोग कोई वस्तु नहीं हैं। वे हमारे परिवार हैं, हमारे नागरिक हैं। ट्रंप को अपनी गंदी दौलत अपने पास रखनी चाहिए।”
ग्रीनलैंड की प्रतिक्रिया: ग्रीनलैंड के प्रीमियर (स्थानीय सरकार के मुखिया) ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “हम व्यापार के लिए खुले हैं (Open for business), लेकिन बिक्री के लिए नहीं (Not for sale)।” ग्रीनलैंड के लोगों को डर है कि अगर वे अमेरिका का हिस्सा बन गए, तो उनकी संस्कृति, भाषा और पर्यावरण को नष्ट कर दिया जाएगा, जैसा कि अलास्का के मूल निवासियों के साथ हुआ।
भाग 5: नाटो (NATO) में दरार – पुतिन की जीत?
इस विवाद का सबसे खतरनाक पहलू नाटो गठबंधन पर इसका प्रभाव है। डेनमार्क नाटो का एक वफादार सदस्य है। डेनमार्क के सैनिक अफगानिस्तान से लेकर इराक तक अमेरिकी सैनिकों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़े हैं।
जब गठबंधन का नेता (अमेरिका) अपने ही सहयोगी (डेनमार्क) की संप्रभुता का सम्मान नहीं करता, तो गठबंधन कमजोर होता है।
- रूस की खुशी: व्लादिमीर पुतिन के लिए यह खबर किसी तोहफे से कम नहीं है। जब भी नाटो के सदस्य आपस में लड़ते हैं, रूस मजबूत होता है। क्रेमलिन के प्रवक्ता ने आज सुबह व्यंग्यात्मक टिप्पणी की: “शायद अमेरिका अब एफिल टॉवर खरीदने की बोली लगाएगा।”
- चीन का अवसर: चीन ग्रीनलैंड में बुनियादी ढांचे (एयरपोर्ट, माइनिंग) में निवेश करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका और डेनमार्क के बीच का यह झगड़ा चीन को ग्रीनलैंड के नेताओं के करीब जाने का मौका दे सकता है। चीन कह सकता है, “देखो, अमेरिका तुम्हें खरीदना चाहता है, हम तुम्हारे साथ केवल बिजनेस पार्टनरशिप करना चाहते हैं।”
भाग 6: आर्थिक समीकरण – क्या ग्रीनलैंड एक “बोझ” है?
ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क के लिए एक आर्थिक बोझ है। क्या यह सच है?
हां और नहीं। ग्रीनलैंड की अर्थव्यवस्था बहुत छोटी है और मुख्य रूप से मछली पकड़ने (Fishing) पर निर्भर है। डेनमार्क हर साल ग्रीनलैंड को लगभग 600 मिलियन डॉलर (लगभग 5000 करोड़ रुपये) की सब्सिडी देता है, जिसे “ब्लॉक ग्रांट” कहा जाता है। यह ग्रीनलैंड के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा है।

ट्रंप का कहना है कि अमेरिका यह खर्चा उठा लेगा और डेनमार्क को राहत देगा। लेकिन डेनमार्क के लिए यह पैसे का मामला नहीं है। यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय गौरव का मामला है। एक अमीर देश होने के नाते, डेनमार्क के लिए 600 मिलियन डॉलर कोई बड़ी रकम नहीं है जिसे बचाने के लिए वह अपने भू-भाग का 98% हिस्सा बेच दे।
भाग 7: पर्यावरण का मुद्दा – ट्रंप और जलवायु परिवर्तन
ग्रीनलैंड विवाद का एक और पहलू पर्यावरण है। ट्रंप प्रशासन जलवायु परिवर्तन को लेकर संशयवादी (Skeptical) रहा है। ट्रंप ग्रीनलैंड को इसलिए चाहते हैं ताकि वहां खनन (Mining) और तेल ड्रिलिंग की जा सके।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारें पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। उन्होंने हाल ही में ग्रीनलैंड में तेल की खोज पर प्रतिबंध लगा दिया था ताकि पर्यावरण को बचाया जा सके। ग्रीनलैंड के लोगों को डर है कि अगर अमेरिका आया, तो:
- सुंदर ग्लेशियरों को खोद डाला जाएगा।
- विशाल माइनिंग प्रोजेक्ट्स से पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) नष्ट हो जाएगा।
- आर्कटिक के पिघलने की गति और तेज हो जाएगी।
यह “ग्रीन पॉलिटिक्स” (Green Politics) बनाम “रिसोर्स पॉलिटिक्स” (Resource Politics) की लड़ाई है।
भाग 8: भारत का नजरिया – हमें क्यों परवाह करनी चाहिए?
एक भारतीय पाठक सोच सकता है कि डेनमार्क और अमेरिका के झगड़े से हमारा क्या लेना-देना? लेकिन भू-राजनीति में सब कुछ जुड़ा हुआ है।
- आर्कटिक में भारत: भारत आर्कटिक काउंसिल का ऑब्जर्वर (Observer) देश है। भारत भी आर्कटिक संसाधनों और रिसर्च में रुचि रखता है। वहां की अस्थिरता भारत के हितों को प्रभावित कर सकती है।
- चीन का मुकाबला: अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करके चीन को दुर्लभ खनिजों (Rare Earths) की सप्लाई चेन से बाहर करता है, तो यह भारत के लिए भी अच्छा है। भारत भी चीन के टेक्नोलॉजी प्रभुत्व को कम करना चाहता है।
- अंतरराष्ट्रीय कानून: भारत हमेशा से संप्रभुता (Sovereignty) का समर्थक रहा है। अगर बड़े देश छोटे देशों को “खरीदने” लगें, तो यह एक खतरनाक उदाहरण (Precedent) होगा। क्या कल को कोई पाकिस्तान के बलूचिस्तान या PoK को खरीदने की बोली लगाएगा? यह सिद्धांत का प्रश्न है।
भाग 9: आगे क्या होगा? (भविष्यवाणी)
यह विवाद इतनी जल्दी शांत होता नहीं दिख रहा है। अगले कुछ दिनों में हम निम्नलिखित घटनाक्रम देख सकते हैं:
1. कूटनीतिक शीत युद्ध: डेनमार्क और अमेरिका के राजदूतों को तलब किया जा सकता है। ट्रंप प्रशासन डेनमार्क पर दबाव बनाने के लिए नाटो के खर्चों या व्यापार शुल्कों (Trade Tariffs) का हथियार इस्तेमाल कर सकता है।
2. ग्रीनलैंड में जनमत संग्रह (Referendum) की मांग: अमेरिका सीधे ग्रीनलैंड के लोगों को लुभाने की कोशिश कर सकता है। “हम आपको डेनमार्क से ज्यादा पैसा देंगे, आप आजादी की घोषणा कर दो और हमारे साथ आ जाओ।” यह डेनमार्क के अंदर अलगाववाद को हवा देगा।
3. यूरोपीय संघ (EU) का हस्तक्षेप: डेनमार्क EU का सदस्य है। पूरा यूरोप डेनमार्क के पीछे खड़ा होगा। यह अमेरिका और EU के बीच एक बड़े व्यापार युद्ध (Trade War) का कारण बन सकता है।
4. सांसद पर दबाव: अमेरिकी लॉबी उस डेनिश सांसद से माफी मांगने की मांग करेगी जिसने “F*** Off” कहा था। लेकिन वर्तमान मूड को देखते हुए, वह सांसद अपने बयान पर कायम रहेगा और शायद डेनमार्क में हीरो बन जाएगा।
भाग 10: निष्कर्ष – अहंकारी शक्ति बनाम आत्मसम्मान
21 जनवरी, 2026 की यह घटना इतिहास में दर्ज होगी। यह हमें बताती है कि दुनिया कितनी बदल गई है और कितनी नहीं बदली।
एक तरफ महाशक्ति का अहंकार है जो मानता है कि हर चीज की एक कीमत होती है। दूसरी तरफ एक छोटे देश का आत्मसम्मान है जो कहता है कि कुछ चीजें बिकाऊ नहीं होतीं। डेनमार्क के सांसद का वह अपशब्द, भले ही कूटनीतिक रूप से गलत हो, लेकिन वह उस हताशा (Frustration) को दर्शाता है जो दुनिया भर के देश अमेरिका की मनमानी के खिलाफ महसूस कर रहे हैं।
ग्रीनलैंड का यह विवाद सिर्फ जमीन के टुकड़े का झगड़ा नहीं है। यह संसाधनों की भूख, रणनीतिक वर्चस्व और राष्ट्रीय अस्मिता की लड़ाई है। चाहे ट्रंप ग्रीनलैंड खरीद पाएं या नहीं, लेकिन उन्होंने पश्चिमी गठबंधन में जो दरार डाली है, उसे भरना बहुत मुश्किल होगा।
बर्फ से ढके ग्रीनलैंड के नीचे दबे खजाने ने दुनिया की राजनीति में आग लगा दी है। और यह आग अभी बुझने वाली नहीं है।
आपकी राय: क्या आपको लगता है कि अमेरिका का ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार व्यावहारिक है? क्या डेनमार्क के सांसद का “F*** Off” कहना सही था या उन्हें मर्यादा बनाए रखनी चाहिए थी? अपने विचार कमेंट्स में जरूर लिखें।
अतिरिक्त विश्लेषण: डोनाल्ड ट्रंप की “डीलम मेकर” मानसिकता
इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए हमें डोनाल्ड ट्रंप के मनोविज्ञान में और गहराई से उतरना होगा। ट्रंप एक राजनेता से पहले एक रियल एस्टेट टाइकून हैं। उनकी पूरी जिंदगी मैनहट्टन के क्षितिज पर इमारतों को खरीदने और बेचने में गुजरी है।
उनके लिए, ग्रीनलैंड एक “डिस्ट्रेस्ड एसेट” (Distressed Asset) है।
- बड़ा आकार: 2 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक।
- कम जनसंख्या: सिर्फ 56,000 लोग।
- मालिक: डेनमार्क, जो इसे चलाने में पैसे खो रहा है।
ट्रंप के नजरिए से, यह एक “नुकसान वाला सौदा” है जिसे वे डेनमार्क के हाथों से लेकर “लाभदायक” बना सकते हैं। वे संप्रभुता, संस्कृति या इतिहास की बारीकियों को नहीं देखते; वे केवल बैलेंस शीट देखते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत भी है और कूटनीति में उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी।
वह सांसद के “F*** Off” को अपमान के रूप में नहीं, बल्कि एक “हार्ड बार्गेनिंग टैक्टिक” (मोलभाव की रणनीति) के रूप में भी देख सकते हैं। उनका मानना हो सकता है कि “हर किसी की एक कीमत होती है, बस सही नंबर बोलने की देर है।” लेकिन स्कैंडिनेवियाई संस्कृति, जो सामाजिक मूल्यों पर टिकी है, ट्रंप के इस विशुद्ध पूंजीवादी दृष्टिकोण से मौलिक रूप से टकराती है।
आर्कटिक में नया शीत युद्ध (New Cold War in the Arctic)
इस घटना को केवल अमेरिका-डेनमार्क विवाद तक सीमित रखना गलती होगी। यह आर्कटिक में चल रहे “ग्रेट गेम” (Great Game) का हिस्सा है।
- रूस: आर्कटिक तटरेखा का सबसे बड़ा हिस्सा रूस के पास है। उसने वहां नए मिलिट्री बेस बनाए हैं और आइसब्रेकर जहाजों का बेड़ा तैयार किया है।
- चीन: चीन खुद को आर्कटिक का खिलाड़ी मानता है और “पोलर सिल्क रोड” (Polar Silk Road) बनाना चाहता है।
अमेरिका को लगता है कि वह इस दौड़ में पीछे छूट रहा है। अलास्का के अलावा अमेरिका के पास आर्कटिक में पैर जमाने की जगह कम है। ग्रीनलैंड को हासिल करके (या उस पर अपना प्रभाव बढ़ाकर), अमेरिका एक झटके में आर्कटिक का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन सकता है। यह “फोमो” (FOMO – Fear Of Missing Out) ही है जो ट्रंप को कूटनीतिक शिष्टाचार तोड़ने पर मजबूर कर रहा है।
लेकिन क्या सहयोगी देशों को नाराज करके रणनीतिक जीत हासिल की जा सकती है? इतिहास गवाह है कि जबरदस्ती बनाए गए रिश्ते ज्यादा दिन नहीं टिकते। ग्रीनलैंड विवाद यह साबित करेगा कि 21वीं सदी में सॉफ्ट पावर (Soft Power) और सम्मान, हार्ड पावर (Hard Power) और पैसों से ज्यादा मायने रखते हैं या नहीं।
