24 फरवरी, 2026: 1.4 अरब से अधिक की आबादी वाले देश भारत में, जहां क्रिकेट को एक धर्म माना जाता है, वहां फुटबॉल हमेशा से अपनी एक अलग और संघर्षपूर्ण लड़ाई लड़ता आया है। वैश्विक पटल पर भारतीय फुटबॉल की स्थिति अक्सर चर्चा का विषय रही है। इसी कड़ी में, विश्व फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था ‘फीफा’ (FIFA) के अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो (Gianni Infantino) ने एक बार फिर भारतीय फुटबॉल के प्रशासन, बुनियादी ढांचे और भविष्य को लेकर एक सख्त लेकिन जरूरी अपील की है।
जियानी इन्फेंटिनो ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि “भारतीय फुटबॉल को अब केवल कागजी योजनाओं से बाहर निकलकर जमीन पर ठोस सुधार करने की जरूरत है।” उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय राष्ट्रीय टीम (Blue Tigers) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार संघर्ष कर रही है और देश का घरेलू ढांचा (Domestic Structure) अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंचने में विफल रहा है।
1. जियानी इन्फेंटिनो का बयान: ‘स्लीपिंग जायंट’ को जगाने का समय (The FIFA President’s Appeal)
फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो का भारत से एक विशेष लगाव रहा है। उन्होंने अतीत में भी भारत को विश्व फुटबॉल का ‘स्लीपिंग जायंट’ (Sleeping Giant) कहा था। लेकिन 2026 में उनकी यह अपील निराशा और उम्मीद के मिश्रण से भरी हुई है।

बयान के मुख्य बिंदु
अपने हालिया संबोधन में इन्फेंटिनो ने इस बात पर जोर दिया कि:
- क्षमता का कम उपयोग: भारत के पास प्रतिभा और जनसंख्या का एक असीमित भंडार है, लेकिन फुटबॉल के विकास के लिए उसका सही दिशा में उपयोग नहीं हो रहा है।
- संरचनात्मक सुधार (Structural Reforms): केवल एक व्यावसायिक लीग (जैसे ISL) चला लेना काफी नहीं है। जब तक निचले स्तर (Lower leagues) और युवा अकादमियों (Youth Academies) को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक राष्ट्रीय टीम का स्तर नहीं सुधरेगा।
- फीफा का समर्थन: उन्होंने याद दिलाया कि फीफा ‘फॉरवर्ड प्रोग्राम’ (FIFA Forward Program) के तहत भारत को लगातार वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है, लेकिन उस निवेश का सही ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ (ROI) मैदान पर दिखना चाहिए।
इन्फेंटिनो की यह टिप्पणी केवल एक सलाह नहीं है, बल्कि यह एआईएफएफ (AIFF) के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है कि वैश्विक समुदाय अब भारत से ठोस परिणामों की अपेक्षा कर रहा है।
2. भारतीय फुटबॉल की वर्तमान स्थिति: रैंक और प्रदर्शन की कड़वी हकीकत (Current Reality of Indian Football)
यदि हम 2026 के परिदृश्य में भारतीय फुटबॉल टीम के प्रदर्शन का निष्पक्ष विश्लेषण करें, तो तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं लगती।
फीफा रैंकिंग (FIFA Rankings) का संघर्ष
पिछले कुछ वर्षों से भारत की फीफा रैंकिंग 100 से 120 के बीच झूलती रही है। जब भी टीम टॉप 100 में प्रवेश करती है, वह वहां लंबे समय तक टिक नहीं पाती। एशियाई स्तर पर भी (AFC Rankings), भारत को जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान, सऊदी अरब और यहां तक कि कतर और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से बहुत पीछे आंका जाता है।
अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में प्रदर्शन
- एएफसी एशियन कप (AFC Asian Cup): हालिया एशियन कप टूर्नामेंट्स में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। बड़ी टीमों के खिलाफ गोल करने की क्षमता का अभाव और डिफेंस में अनुभवहीनता साफ झलकती है।
- सुनील छेत्री के बाद का शून्य (The Post-Chhetri Void): भारतीय फुटबॉल के दिग्गज कप्तान सुनील छेत्री के संन्यास के बाद, राष्ट्रीय टीम में एक ऐसे स्ट्राइकर की भारी कमी महसूस की जा रही है जो दबाव में गोल कर सके। “छेत्री के बाद कौन?” यह सवाल आज भी भारतीय फुटबॉल का सबसे बड़ा अनसुलझा रहस्य है।
3. ग्रासरूट डेवलपमेंट: जहां भारत सबसे ज्यादा पिछड़ रहा है (The Missing Grassroots Foundation)
किसी भी देश में फुटबॉल तब तक विकसित नहीं हो सकता जब तक उसकी ‘नर्सरी’ यानी ग्रासरूट लेवल मजबूत न हो। जियानी इन्फेंटिनो ने अपनी अपील में इसी बात को सबसे ज्यादा रेखांकित किया है।

अकादमियों का अभाव (Lack of Elite Academies)
यूरोप या दक्षिण अमेरिका में बच्चे 5-6 साल की उम्र से ही पेशेवर अकादमियों में प्रशिक्षण लेना शुरू कर देते हैं। वहां 10-12 साल की उम्र तक उनका तकनीकी विकास (Technical Development) पूरा हो चुका होता है। इसके विपरीत, भारत में ज्यादातर खिलाड़ी 13-14 साल की उम्र में पेशेवर कोचिंग प्राप्त करते हैं, जो आधुनिक फुटबॉल के मानकों के हिसाब से बहुत देर है।
टैलेंट स्काउटिंग (Talent Scouting) में विफलता
भारत के ग्रामीण इलाकों—विशेषकर पूर्वोत्तर (North-East), बंगाल, केरल और गोवा—में अद्भुत प्रतिभाएं हैं। लेकिन एक मजबूत ‘स्काउटिंग नेटवर्क’ न होने के कारण ये प्रतिभाएं कभी राष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंच पातीं। फीफा के पूर्व ‘चीफ ऑफ ग्लोबल फुटबॉल डेवलपमेंट’ आर्सेन वेंगर (Arsène Wenger) ने भी भारत का दौरा किया था और ‘फीफा टैलेंट डेवलपमेंट स्कीम’ के तहत एक अकादमी स्थापित करने में मदद की थी। लेकिन पूरे देश को कवर करने के लिए ऐसी सैकड़ों अकादमियों की आवश्यकता है।
4. एआईएफएफ (AIFF) का ‘विजन 2047’: क्या यह केवल एक कागजी शेर है? (Vision 2047 Analysis)
अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) ने अध्यक्ष कल्याण चौबे के नेतृत्व में ‘विजन 2047’ (Vision 2047) नाम का एक महत्वाकांक्षी रोडमैप लॉन्च किया था। इसका लक्ष्य 2047 (भारत की आजादी के 100वें वर्ष) तक भारत को एशियाई फुटबॉल में शीर्ष 4 देशों में शामिल करना है।
विजन 2047 के प्रमुख स्तंभ:
- रेफरी और कोच की संख्या में भारी वृद्धि।
- महिला फुटबॉल का कायाकल्प।
- राज्य संघों (State Associations) का आधुनिकीकरण।
- व्यावसायिक और निचले स्तर की लीग्स के बीच ‘प्रमोशन-रेलिगेशन’ (Promotion-Relegation) सिस्टम लागू करना।
जमीनी हकीकत और चुनौतियां
हालांकि ‘विजन 2047’ पढ़ने में बहुत शानदार लगता है, लेकिन जियानी इन्फेंटिनो की टिप्पणी दर्शाती है कि इसके क्रियान्वयन (Execution) की गति बेहद धीमी है।
- फंडिंग की समस्या: राज्य फुटबॉल संघों के पास बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: महासंघ और राज्य स्तर पर राजनीति और गुटबाजी आज भी फुटबॉल के विकास में एक बड़ा रोड़ा है।
5. इंडियन सुपर लीग (ISL) बनाम राष्ट्रीय हित: विरोधाभास की कहानी (The ISL Paradox)
जब 2014 में इंडियन सुपर लीग (ISL) की शुरुआत हुई थी, तो इसे भारतीय फुटबॉल के ‘गेम-चेंजर’ के रूप में प्रचारित किया गया था। इसमें कोई शक नहीं कि ISL ने भारतीय फुटबॉल में पैसा, ग्लैमर और प्रसारण गुणवत्ता (Broadcasting Quality) ला दी है। लेकिन क्या इससे राष्ट्रीय टीम को फायदा हुआ?
विदेशी खिलाड़ियों का वर्चस्व
ISL में प्रत्येक टीम को कई विदेशी खिलाड़ियों को मैदान पर उतारने की अनुमति है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि सबसे महत्वपूर्ण ‘पोजीशन’ (जैसे सेंटर-फॉरवर्ड या मुख्य डिफेंडर) हमेशा विदेशी खिलाड़ियों के पास रहती है। भारतीय स्ट्राइकर्स को अपने ही क्लबों में खेलने का पर्याप्त समय (Game time) नहीं मिलता। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मैचों में हमारे पास गोल करने वाले खिलाड़ियों का टोटा पड़ जाता है।

सीजन की लंबाई
दुनिया भर की शीर्ष लीग्स 9 से 10 महीने तक चलती हैं, जिससे खिलाड़ियों का फिटनेस स्तर और ‘मैच शार्पनेस’ बनी रहती है। लेकिन भारत में लीग का ढांचा छोटा है, जिसके कारण भारतीय खिलाड़ियों को साल भर प्रतिस्पर्धी फुटबॉल खेलने का मौका नहीं मिल पाता। इन्फेंटिनो ने भी कई बार लीग कैलेंडर को वैश्विक मानकों के अनुरूप लंबा करने की सलाह दी है।
6. बुनियादी ढांचा (Infrastructure) और कोच की शिक्षा (Coach Education)
अगर आपको विश्वस्तरीय खिलाड़ी चाहिए, तो आपको विश्वस्तरीय कोच और मैदान भी चाहिए। भारत इस मोर्चे पर भी काफी पीछे है।
- पिच की गुणवत्ता: आज भी कई घरेलू टूर्नामेंट खराब और उबड़-खाबड़ मैदानों पर खेले जाते हैं। ऐसी पिचों पर ‘पासिंग फुटबॉल’ (Possession-based football) खेलना असंभव है, जिसके कारण खिलाड़ी केवल लंबी गेंदें (Long balls) खेलने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
- लाइसेंस प्राप्त कोच की कमी: भारत में एएफसी (AFC) ‘प्रो’ या ‘ए’ लाइसेंस प्राप्त कोचों की संख्या जनसंख्या के अनुपात में नगण्य है। जब तक स्कूलों और स्थानीय क्लबों में उच्च गुणवत्ता वाले कोच नहीं होंगे, तब तक बच्चों को कम उम्र में सही तकनीक नहीं सिखाई जा सकेगी।
7. एशियाई दिग्गजों से भारत क्या सीख सकता है? (Lessons from Japan and South Korea)
जियानी इन्फेंटिनो की अपील का एक निहित अर्थ यह भी है कि भारत को उन देशों से सीखना चाहिए जिन्होंने अपने फुटबॉल मॉडल को सफलतापूर्वक बदला है।
जापान का उदाहरण (The Japanese Model)
1990 के दशक की शुरुआत में जापान की स्थिति भी लगभग भारत जैसी ही थी। लेकिन उन्होंने ‘जे-लीग’ (J-League) की शुरुआत के साथ-साथ ‘100 साल का विजन’ लागू किया। उन्होंने हर स्कूल को फुटबॉल क्लब से जोड़ा, विदेशी कोचों को तकनीक सिखाने के लिए बुलाया और ‘ब्लू लॉक’ (Blue Lock) जैसी अवधारणाओं के जरिए युवा प्रतिभाओं को तराशा। आज जापान विश्व कप में स्पेन और जर्मनी जैसी टीमों को हराने की क्षमता रखता है।
भारत के लिए सबक
भारत को तुरंत एक ‘स्कूली फुटबॉल संस्कृति’ विकसित करने की आवश्यकता है। खेल मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और AIFF को मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाना होगा जहां फुटबॉल स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा हो और हर जिले में कम से कम एक सिंथेटिक टर्फ (Artificial Turf) मौजूद हो।
8. महिला फुटबॉल: एक छिपा हुआ अवसर (Women’s Football: The Untapped Potential)
भारतीय फुटबॉल की चर्चा अक्सर केवल पुरुष टीम तक सीमित रह जाती है। लेकिन अगर भारत को फीफा रैंकिंग में तेजी से छलांग लगानी है, तो महिला फुटबॉल पर निवेश करना सबसे ‘स्मार्ट’ कदम हो सकता है।
- भारतीय महिला टीम (Blue Tigresses) ने कई मौकों पर पुरुष टीम से बेहतर क्षमता दिखाई है।
- फीफा महिला फुटबॉल को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दे रहा है और इसके लिए विशेष अनुदान (Grants) भी उपलब्ध हैं।
- इंडियन विमेंस लीग (IWL) को ISL के स्तर पर लाना और महिला खिलाड़ियों को व्यावसायिक अनुबंध (Professional Contracts) देना इस दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
9. 2026 और भविष्य की राह: तत्काल उठाए जाने वाले कदम (The Road Ahead)
जियानी इन्फेंटिनो के बयान को केवल एक आलोचना नहीं, बल्कि एक रचनात्मक मार्गदर्शन (Constructive Guidance) के रूप में लिया जाना चाहिए। 2026 में भारतीय फुटबॉल को पटरी पर लाने के लिए निम्नलिखित कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए:
- कैलेंडर का विस्तार: ISL, I-League, डूरंड कप और सुपर कप को मिलाकर एक ऐसा 9-10 महीने का निर्बाध कैलेंडर बनाया जाए, ताकि खिलाड़ियों को साल भर मैच खेलने का मौका मिले।
- विदेशी खिलाड़ियों का कोटा कम करना: ISL और I-League में विदेशी खिलाड़ियों की संख्या को धीरे-धीरे कम किया जाए ताकि भारतीय युवाओं (विशेषकर स्ट्राइकर्स) को खेलने का भरपूर मौका मिले।
- स्टेट लेवल लीग्स का पुनरुद्धार: कलकत्ता फुटबॉल लीग, केरल प्रीमियर लीग और गोवा प्रो लीग जैसी स्थानीय लीग्स को फिर से जीवंत किया जाए और उनका सीधा प्रसारण सुनिश्चित किया जाए।
- बेबी लीग्स (Baby Leagues): 6 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए हर शहर और गांव में ‘गोल्डन बेबी लीग्स’ का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाए।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: AIFF को फीफा से मिलने वाले फंड का पाई-पाई का हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए और हर प्रोजेक्ट का त्रैमासिक ऑडिट (Quarterly Audit) होना चाहिए।
क्या जागेगा ‘स्लीपिंग जायंट’?
फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो की अपील इस बात का प्रमाण है कि विश्व बिरादरी भारत को फुटबॉल के नक्शे पर एक शक्ति के रूप में देखना चाहती है। भारत के पास बाजार है, दर्शक हैं, और जुनून है। बस कमी है तो एक ईमानदार, दूरदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन की, जो प्रतिभा को पहचान कर उसे सही मंच दे सके।
हम अब ‘स्लीपिंग जायंट’ के टैग के पीछे छिप नहीं सकते। 2026 का यह साल भारतीय फुटबॉल के लिए ‘करो या मरो’ का साल है। अगर हम आज नहीं जागे, तो हम हमेशा के लिए केवल क्रिकेट का देश बनकर रह जाएंगे और विश्व कप खेलने का 1.4 अरब लोगों का सपना एक सपना ही रह जाएगा। गेंद अब एआईएफएफ (AIFF) और खेल मंत्रालय के पाले में है; देखना यह है कि वे इस ‘पास’ को कैसे गोल में तब्दील करते हैं।
