क्या आप सात समंदर पार विदेश में रहते हैं और सोचते हैं कि आप सुरक्षित हैं? तो दोबारा सोचिए। साइबर अपराधियों ने ठगी का एक ऐसा तरीका निकाल लिया है, जिसमें न गोली चलती है, न कोई घर आता है, लेकिन इंसान अपने ही घर में ‘कैद’ होकर अपनी जीवनभर की कमाई लुटा देता है। इसे कहते हैं—‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest)।
ताजा मामला ऑस्ट्रेलिया से सामने आया है, जहाँ एक गुजराती NRI (अनिवासी भारतीय) को साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट करके ₹48 लाख का चूना लगा दिया।
इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि आखिर यह ठगी कैसे हुई, ‘डिजिटल अरेस्ट’ क्या बला है और आप या आपके विदेश में रहने वाले रिश्तेदार इससे कैसे बच सकते हैं।

1. क्या है पूरा मामला? (ऑस्ट्रेलिया में ‘डिजिटल हथकड़ी’)
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मूल रूप से गुजरात के रहने वाले और वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया में बसे एक व्यक्ति को एक अनजान नंबर से फोन आया।
- शुरुआत: ठगों ने खुद को एक कूरियर कंपनी (FedEx/Blue Dart) और मुंबई कस्टम विभाग का अधिकारी बताया।
- डर: पीड़ित को कहा गया कि उनके नाम से एक पार्सल बुक हुआ है जिसमें ड्रग्स (MDMA), फर्जी पासपोर्ट और क्रेडिट कार्ड्स मिले हैं।
- धमकी: ठगों ने कहा कि उनका आधार कार्ड और बैंक खाते ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ और आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल हुए हैं।
- वीडियो कॉल: इसके बाद स्काइप (Skype) या व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर वर्दी पहने हुए नकली पुलिसवाले सामने आए। पीछे पुलिस स्टेशन जैसा सेटअप था।
- डिजिटल अरेस्ट: पीड़ित को डराया गया कि अगर उन्होंने फोन काटा तो उन्हें तुरंत डिपोर्ट (Deport) कर दिया जाएगा और भारत में जेल होगी। उन्हें कैमरे के सामने लगातार बैठे रहने को कहा गया—इसे ही ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा गया।
- ठगी: ‘फंड वेरिफिकेशन’ और जांच के नाम पर पीड़ित से अलग-अलग खातों में ₹48 लाख ट्रांसफर करवा लिए गए। जब तक पीड़ित को एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

2. क्या होता है ‘डिजिटल अरेस्ट’? (What is Digital Arrest?)
सबसे पहले यह जान लें: भारतीय कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई प्रावधान नहीं है।
यह एक मनोवैज्ञानिक खेल (Psychological Game) है।
- इसमें ठग वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित पर नजर रखते हैं।
- वे पीड़ित को सोने नहीं देते, किसी से बात नहीं करने देते और घर से बाहर नहीं निकलने देते।
- पीड़ित को लगता है कि वह सचमुચ पुलिस की हिरासत में है, जबकि वह अपने ही घर में बैठा होता है।
3. ठगों का ‘Modus Operandi’: कैसे फंसाते हैं जाल में?
यह गिरोह बहुत ही शातिर तरीके से काम करता है। इनके स्टेप्स कुछ इस प्रकार होते हैं:
- कूरियर या टेलीकॉम का बहाना: कॉल करके बोलेंगे कि आपका पार्सल पकड़ा गया है या आपका सिम कार्ड अवैध गतिविधियों में लिप्त है।
- CBI/NCB का नाम: कॉल को तथाकथित ‘नार्कोटिक्स विभाग’ या ‘CBI’ को ट्रांसफर किया जाता है।
- नकली माहौल: वीडियो कॉल पर नकली पुलिस स्टेशन, वर्दी, वॉकी-टॉकी की आवाजें और सरकारी लोगो (Logo) का इस्तेमाल कर भरोसा जीता जाता है।
- वीज़ा का डर (NRIs के लिए): विदेश में रहने वालों को सबसे ज्यादा डर ‘वीज़ा रद्द’ होने का होता है। ठग इसी नब्ज को पकड़ते हैं।
- सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट: वे कहते हैं कि “आपकी संपत्ति की जांच होगी, पैसा हमारे सरकारी खाते में भेजो, जांच के बाद वापस मिल जाएगा।” लेकिन वो पैसा कभी वापस नहीं आता।
4. NRI और गुजराती ही क्यों निशाने पर?
साइबर ठग विशेष रूप से गुजरातियों और NRIs को निशाना बना रहे हैं क्योंकि:
- आर्थिक स्थिति: ठग जानते हैं कि NRIs और गुजरातियों के पास अच्छी बचत (Savings) होती है।
- कानून का डर: देश से दूर रहने के कारण उन्हें भारत के कानूनों की जमीनी हकीकत कम पता होती है और वे कानूनी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते।
- परिवार की चिंता: ठग अक्सर भारत में रह रहे उनके माता-पिता को भी केस में घसीटने की धमकी देते हैं।

5. बचाव के उपाय: ‘रहो सावधान, बनो सुरक्षित’
अगर आपको या आपके किसी रिश्तेदार को ऐसा कॉल आए, तो ये 5 बातें गांठ बांध लें:
- तुरंत फोन काट दें: कोई भी सरकारी एजेंसी (पुलिस, CBI, ED) वीडियो कॉल पर पूछताछ नहीं करती और न ही पैसे मांगती है।
- डरें नहीं: अगर आपने कुछ गलत नहीं किया है, तो कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ‘डिजिटल अरेस्ट’ पूरी तरह फर्जी है।
- स्क्रीन शेयर न करें: कभी भी स्काइप या जूम पर अपनी स्क्रीन शेयर न करें, इससे वे आपका OTP देख सकते हैं।
- परिवार से बात करें: ठग कहेंगे कि “किसी को मत बताना, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।” यह झूठ है। तुरंत अपने परिवार या दोस्तों को बताएं।
- शिकायत दर्ज करें:
- तुरंत भारत सरकार के साइबर क्राइम पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत करें।
- हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें।
- ऑस्ट्रेलिया में हैं तो वहां की स्थानीय पुलिस और भारतीय दूतावास (Indian Embassy) को सूचित करें।
₹48 लाख की यह ठगी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक परिवार की मेहनत की कमाई है। टेक्नोलॉजी जितनी सुविधा दे रही है, अपराधी उतने ही हाई-टेक हो रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया में बैठे हमारे गुजराती भाई के साथ जो हुआ, वह किसी के साथ भी हो सकता है। इसलिए, सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।
