भारतीय आध्यात्म और सनातन धर्म के प्रचारकों में सबसे चर्चित नाम, पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जिन्हें दुनिया बागेश्वर धाम सरकार के नाम से जानती है, एक बार फिर अपनी बेबाक और आक्रामक शैली के कारण सुर्खियों में हैं। अपने बयानों से अक्सर हलचल मचाने वाले धीरेंद्र शास्त्री ने मध्य प्रदेश के सागर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दौरान एक ऐसा बयान दिया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट्स तक बहस का नया मोर्चा खोल दिया है। आधुनिक शिक्षा पद्धति, कॉन्वेंट स्कूलों की संस्कृति और सनातन धर्म के संरक्षण पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि हिंदू माता-पिता ने अपने बच्चों को बचपन से वेदों और पुराणों का ज्ञान नहीं दिया, तो उनका भविष्य खतरे में पड़ सकता है। उनका यह वाक्य कि ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’, अब एक नारा और विवाद दोनों बन चुका है।
सनातन संस्कृति, शिक्षा और धर्मांतरण पर छिड़ी नई बहस का महाविश्लेषण
1. सागर की कथा और वह विवादित बयान: मंच से उठी ललकार
मध्य प्रदेश का सागर जिला, जहां पिछले कुछ दिनों से भक्ति की बयार बह रही है। लाखों की संख्या में श्रद्धालु पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा सुनने के लिए एकत्रित हुए हैं। इसी दौरान, कथा के एक सत्र में, धीरेंद्र शास्त्री ने वर्तमान सामाजिक परिदृश्य और हिंदू परिवारों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों और कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाने की होड़ में लगे हैं। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा फर्राटेदार अंग्रेजी बोले और बड़ी नौकरी पाए। लेकिन इस दौड़ में वे अपने मूल, अपनी संस्कृति और अपने धर्म को पीछे छोड़ रहे हैं। शास्त्री जी ने मंच से गरजते हुए कहा कि अंग्रेजी सीखना गलत नहीं है, लेकिन केवल अंग्रेजी सीखकर अपनी जड़ों को भूल जाना विनाशकारी है।
इसी संदर्भ में उन्होंने वह बयान दिया जो अब हर जगह चर्चा का विषय है। उन्होंने कहा, “अपने बच्चों को बचपन से ही सनातन धर्म के संस्कार दो। उन्हें गीता, रामायण और वेदों का पाठ पढ़ाओ। अगर आज उन्होंने ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’। फिर मत कहना कि हमारा बच्चा हमारे हाथ से निकल गया या हमारी बेटी लव जिहाद का शिकार हो गई।”
इस बयान के गहरे निहितार्थ हैं। यह केवल शिक्षा पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह धर्मांतरण, सांस्कृतिक पहचान के नुकसान और अंतर-धार्मिक विवाहों (जिसे वे अक्सर लव जिहाद के संदर्भ में देखते हैं) की ओर इशारा करता है। उनके समर्थकों के लिए यह एक ‘वेक-अप कॉल’ (जागने का समय) है, जबकि आलोचकों के लिए यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास है।
2. ‘जावेद-नावेद’ का रूपक: आखिर इसका क्या अर्थ है?
पंडित धीरेंद्र शास्त्री की भाषा शैली बुंदेलखंडी और ठेठ देसी होती है, लेकिन उनके शब्दों का चयन बहुत सोच-समझकर किया जाता है। जब वे कहते हैं कि ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’, तो वे किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि एक विचारधारा और सांस्कृतिक बदलाव पर प्रहार कर रहे होते हैं।
क. सांस्कृतिक विचलन का डर: शास्त्री जी का मानना है कि जब एक हिंदू बच्चा अपने धर्म ग्रंथों को नहीं पढ़ता, तो वह मानसिक रूप से कमजोर होता है। उसे अपने धर्म की महानता, अपने इतिहास और अपने पूर्वजों के त्याग का पता नहीं होता। ऐसे में, जब वह बाहरी दुनिया के संपर्क में आता है या विधर्मी विचारधाराओं से टकराता है, तो वह आसानी से भ्रमित हो जाता है। ‘जावेद-नावेद’ यहां प्रतीकात्मक रूप से उस पहचान के खोने का डर है जो एक सनातनी के पास होनी चाहिए।
ख. कॉन्वेंट संस्कृति बनाम सनातन संस्कृति: धीरेंद्र शास्त्री लंबे समय से लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के आलोचक रहे हैं। उनका मानना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली केवल ‘नौकर’ (क्लर्क) पैदा करने के लिए बनाई गई थी, न कि ‘मालिक’ या संस्कारवान मनुष्य बनाने के लिए। उनका तर्क है कि कॉन्वेंट स्कूलों में बच्चों को ‘संडे’ को चर्च जाना तो सिखाया जा सकता है या क्रिसमस मनाना सिखाया जाता है, लेकिन उन्हें मंदिर जाना या तिलक लगाना ‘पिछड़ापन’ लगता है। इसी हीन भावना को वे ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’ वाले बयान से जोड़ते हैं, जिसका अर्थ है कि बच्चा अपनी संस्कृति से कटकर दूसरे धर्मों की ओर आकर्षित हो सकता है।
ग. धर्मांतरण और लव जिहाद का मुद्दा: अप्रत्यक्ष रूप से, यह बयान हिंदू लड़कियों की सुरक्षा को लेकर उनकी चिंताओं को भी दर्शाता है। उनकी कथाओं में अक्सर वे माता-पिता से कहते हैं कि अपनी बेटियों को रानी लक्ष्मीबाई और माता सीता के चरित्र के बारे में बताएं। उनका मानना है कि धार्मिक शिक्षा के अभाव में युवा पीढ़ी अपने धर्म के प्रति निष्ठा नहीं रखती और आसानी से दूसरे धर्मों में विवाह या धर्मांतरण के जाल में फंस जाती है।
3. बागेश्वर धाम में गुरुकुल का ऐलान: एक नई क्रांति की शुरुआत
सिर्फ समस्या गिनाना ही नहीं, बल्कि उसका समाधान देना भी धीरेंद्र शास्त्री की शैली रही है। सागर की उसी कथा में, उन्होंने एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने ऐलान किया कि वे जल्द ही बागेश्वर धाम (छतरपुर) में एक विशाल और भव्य गुरुकुल की स्थापना करने जा रहे हैं।

गुरुकुल की रूपरेखा:
- उद्देश्य: इस गुरुकुल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को वेदों, उपनिषदों, पुराणों और संस्कृत भाषा का गहन ज्ञान देना होगा। यहां केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दी जाएगी।
- निःशुल्क शिक्षा: शास्त्री जी ने घोषणा की है कि इस गुरुकुल में शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क होगी या नाममात्र के शुल्क पर होगी, ताकि गरीब से गरीब सनातनी का बच्चा भी यहां पढ़ सके।
- आधुनिकता और परंपरा का संगम: हालांकि जोर वेदों पर होगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वहां विज्ञान या गणित नहीं पढ़ाया जाएगा। योजना यह है कि आधुनिक विषयों के साथ-साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान विज्ञान को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
- संस्कारों का निर्माण: यहां दिनचर्या ब्रह्म मुहूर्त में उठने, योग करने, गौ सेवा करने और संध्या वंदन करने से शुरू होगी। उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है जो डॉक्टर-इंजीनियर बनें तो भी उनके माथे पर तिलक और जुबान पर राम का नाम हो।
पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने कथा में मौजूद लाखों लोगों से अपील की कि वे इस गुरुकुल निर्माण में तन, मन और धन से सहयोग करें। उन्होंने कहा कि यह गुरुकुल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सनातन समाज का होगा। उनका सपना है कि यहां से निकलने वाला हर बच्चा इतना मजबूत हो कि भविष्य में ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’ वाली नौबत ही न आए।
4. मैकाले शिक्षा पद्धति पर प्रहार: “हम कॉन्वेंट के खिलाफ नहीं, संस्कारों के पक्ष में हैं”
धीरेंद्र शास्त्री के भाषणों में अक्सर ‘लॉर्ड मैकाले’ का जिक्र आता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो थॉमस बैबिंगटन मैकाले वह व्यक्ति थे जिन्होंने 1835 में भारत में अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम लागू किया था। मैकाले का उद्देश्य एक ऐसा वर्ग तैयार करना था जो “रक्त और रंग में भारतीय हो, लेकिन रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हो।”
शास्त्री जी का तर्क है कि हम आज भी उसी गुलामी की मानसिकता में जी रहे हैं।
- हम बच्चों को ‘ए फॉर एप्पल’ तो रटाते हैं, लेकिन ‘क से कृष्ण’ नहीं पढ़ाते।
- हम बच्चों को ‘हैप्पी बर्थडे’ पर केक काटना और मोमबत्ती बुझाना सिखाते हैं (जो भारतीय संस्कृति में अशुभ माना जाता है), जबकि दीपक जलाना नहीं सिखाते।
- हम माता-पिता को ‘मम्मी-डैडी’ कहलवाते हैं, जबकि ‘माता-पिता’ या ‘मातृदेवो भव’ के संस्कार भूल गए हैं।
उन्होंने कहा कि जब बच्चा बचपन से ही अपनी संस्कृति को हीन भावना से देखेगा, तो बड़ा होकर वह अपने धर्म का सम्मान कैसे करेगा? इसीलिए उन्होंने चेतावनी दी कि ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’। यह एक कटाक्ष है उस समाज पर जो अपनी विरासत को छोड़कर पश्चिम की नकल कर रहा है।
5. माता-पिता की जिम्मेदारी: “मोबाइल नहीं, माला दो”
अपनी कथा में धीरेंद्र शास्त्री ने माता-पिता, विशेषकर माताओं को भी कड़े शब्दों में फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि आजकल माताएं अपने बच्चों को चुप कराने के लिए या अपना पीछा छुड़ाने के लिए उनके हाथ में मोबाइल थमा देती हैं। उन्होंने कहा, “तुमने बच्चे के हाथ में मोबाइल दिया, तो वह रील (Reels) देखेगा, और रील देखकर उसका दिमाग खराब होगा। अगर तुम उसके हाथ में माला (जप माला) या गीता दोगे, तो उसका चरित्र बनेगा।”
उनका मानना है कि घर ही प्रथम पाठशाला है। अगर घर में रामायण का पाठ नहीं होता, अगर घर में सात्विक वातावरण नहीं है, तो गुरुकुल या स्कूल भी कुछ नहीं कर सकते। उन्होंने श्रोताओं से संकल्प लिया कि वे अपने बच्चों को रोज कम से कम 5 मिनट भगवान के नाम का जप करवाएंगे और उन्हें अपने धर्म के नायकों की कहानियां सुनाएंगे।
6. सोशल मीडिया पर तूफान: समर्थन और विरोध के स्वर
जैसे ही ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’ वाला वीडियो क्लिप वायरल हुआ, इंटरनेट पर बहस छिड़ गई। 16 जनवरी 2026 का सोशल मीडिया ट्रेंड पूरी तरह से इसी बयान के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
समर्थन में तर्क: लाखों लोग, जो बागेश्वर धाम के अनुयायी हैं या हिंदुत्व विचारधारा रखते हैं, उन्होंने शास्त्री जी का खुलकर समर्थन किया है।
- उनका कहना है कि यह कड़वा सच है।
- केरल और अन्य राज्यों की घटनाओं (जैसे द केरल स्टोरी फिल्म में दिखाया गया) का हवाला देकर लोग कह रहे हैं कि धर्मांतरण का खतरा वास्तविक है और धार्मिक शिक्षा ही एकमात्र कवच है।
- लोग कह रहे हैं कि हर धर्म अपने बच्चों को अपनी धार्मिक शिक्षा देता है (जैसे मदरसों में कुरान या संडे स्कूल में बाइबिल), तो हिंदुओं को अपने वेदों को पढ़ाने में शर्म क्यों आनी चाहिए?
विरोध में तर्क: उदारवादी और सेक्युलर विचारधारा के लोगों ने इस बयान की आलोचना की है।
- उनका कहना है कि शिक्षा को धर्म के चश्मे से नहीं देखना चाहिए।
- ‘जावेद-नावेद’ जैसे नामों का इस्तेमाल करना एक समुदाय विशेष के प्रति नफरत फैलाने जैसा है।
- आलोचकों का कहना है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और बच्चों को वैज्ञानिक सोच वाला बनाना चाहिए, न कि उन्हें धार्मिक कट्टरता सिखाना चाहिए।
लेकिन धीरेंद्र शास्त्री इन आलोचनाओं से बेपरवाह हैं। वे बार-बार कहते हैं, “मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं, मैं बस अपने सनातनियों को जगाने आया हूं।”
7. गुरुकुल परंपरा की वापसी: क्या यह समय की मांग है?
धीरेंद्र शास्त्री अकेले नहीं हैं जो गुरुकुल खोलने की बात कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में, भारत में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का पुनरुद्धार देखा गया है। पतंजलि (बाबा रामदेव) से लेकर इस्कॉन और श्री श्री रविशंकर तक, कई संस्थाएं गुरुकुल चला रही हैं।
क्यों बढ़ रहा है गुरुकुल का क्रेज?
- मूल्यों का पतन: आधुनिक स्कूलों में नशा, अनुशासनहीनता और मानसिक तनाव की बढ़ती घटनाओं ने अभिभावकों को चिंतित कर दिया है।
- सर्वांगीण विकास: गुरुकुल में केवल रट्टा मारना नहीं सिखाया जाता, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति पर भी जोर दिया जाता है।
- संस्कृत का महत्व: नासा और दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने माना है कि संस्कृत कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के लिए सबसे उपयुक्त भाषा हो सकती है। शास्त्री जी के गुरुकुल में संस्कृत अनिवार्य होगी।
बागेश्वर धाम का प्रस्तावित गुरुकुल इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है क्योंकि धीरेंद्र शास्त्री की अपील का असर बहुत व्यापक है। जब वे कहते हैं कि ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’, तो वे अभिभावकों के मन में एक असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं, जो उन्हें गुरुकुल की ओर आकर्षित करती है।
8. क्या वेद पढ़ने से रोजगार मिलेगा? एक बड़ा सवाल
शास्त्री जी के आलोचक अक्सर यह सवाल पूछते हैं कि क्या वेद पढ़ने से बच्चों को 21वीं सदी में नौकरी मिलेगी? क्या वे डॉक्टर या इंजीनियर बन पाएंगे? इस पर धीरेंद्र शास्त्री का तर्क बहुत स्पष्ट है। वे कहते हैं, “पेट भरने के लिए शिक्षा जरूरी है, लेकिन जीवन जीने के लिए विद्या जरूरी है।” वे कहते हैं कि वेदों में विज्ञान, खगोल शास्त्र, गणित और चिकित्सा (आयुर्वेद) का अपार भंडार है। उनका कहना है कि एक बच्चा अंग्रेजी पढ़कर बड़ा अधिकारी तो बन सकता है, लेकिन अगर उसमें संस्कार नहीं हैं, तो वह अपने बूढ़े मां-बाप को वृद्धाश्रम छोड़ आएगा। लेकिन वेद पढ़ने वाला बच्चा श्रवण कुमार बनेगा। वे चरित्र निर्माण को रोजगार से ऊपर रखते हैं। साथ ही, प्रस्तावित गुरुकुल में आधुनिक विषयों का समावेश इस बात का संकेत है कि वे छात्रों को दुनिया से काटने के बजाय उन्हें दुनिया का सामना करने के लिए ‘भारतीय दृष्टिकोण’ से तैयार करना चाहते हैं।
9. राजनीतिक निहितार्थ: हिंदू राष्ट्र का एजेंडा
पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री कभी भी अपनी ‘हिंदू राष्ट्र’ की मांग को नहीं छुपाते। उनका हर बयान, हर कथा और हर अभियान अंततः इसी लक्ष्य की ओर केंद्रित होता है। ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’ वाला बयान भी इसी राजनीतिक और सामाजिक एजेंडे का हिस्सा है। वे एक ऐसे वोट बैंक और युवा वर्ग को तैयार करना चाहते हैं जो अपनी धार्मिक पहचान के प्रति सजग और आक्रामक हो। मध्य प्रदेश और केंद्र की राजनीति में उनका प्रभाव किसी से छुपा नहीं है। राजनेता भी उनके मंच पर हाजिरी लगाते हैं। ऐसे में, गुरुकुल के माध्यम से वे एक नई पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं जो उनकी विचारधारा की संवाहक बनेगी।
10. अन्य धर्मों की शिक्षा व्यवस्था से तुलना
धीरेंद्र शास्त्री अक्सर अपनी कथाओं में मदरसों का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय के बच्चे बचपन से ही मदरसों में जाकर अपनी धार्मिक तालीम लेते हैं, इसलिए वे अपने धर्म के प्रति कट्टर होते हैं। ईसाई मिशनरी स्कूलों में प्रार्थनाएं ईसा मसीह की होती हैं। उनका सवाल हिंदुओं से यही है: “तुम्हारे पास अपनी शिक्षण संस्थाएं कहां हैं? तुम्हारे मंदिरों का पैसा सरकार ले लेती है, और तुम अपने बच्चों को उन स्कूलों में भेजते हो जहां हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया जाता है।” यही तुलनात्मक भाव उनके समर्थकों में आक्रोश और उत्साह दोनों भरता है। गुरुकुल खोलने का ऐलान इसी ‘इकोसिस्टम’ को संतुलित करने का प्रयास है।
11. जागृति या ध्रुवीकरण?
अंत में, 16 जनवरी 2026 को दिया गया पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का यह बयान और गुरुकुल का ऐलान भारतीय समाज में चल रहे मंथन का प्रतीक है। जब वे कहते हैं ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’, तो वे एक चेतावनी दे रहे हैं। इसे कुछ लोग नफरत भरा भाषण मान सकते हैं, तो कुछ लोग इसे अस्तित्व रक्षा की पुकार।
सच्चाई यह है कि भारत अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहता है। वैश्वीकरण (Globalization) की आंधी में कहीं न कहीं भारतीय समाज को यह महसूस हो रहा है कि हम अपनी पहचान खो रहे हैं। धीरेंद्र शास्त्री इसी नब्ज को पकड़ते हैं। वे युवाओं को आईफोन और इंस्टाग्राम की दुनिया से निकालकर वेद और उपनिषद की दुनिया में ले जाना चाहते हैं।
उनका गुरुकुल कैसा होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन उनकी बातों ने हर हिंदू परिवार के डाइनिंग टेबल पर एक बहस जरूर छेड़ दी है—क्या हम अपने बच्चों को सही शिक्षा दे रहे हैं? क्या सिर्फ डिग्री काफी है या दीक्षा भी जरूरी है?
चाहे आप उनके शब्दों से सहमत हों या न हों, लेकिन उनकी इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता कि संस्कारों के बिना शिक्षा अधूरी है। अब यह समाज और माता-पिता को तय करना है कि वे अपने बच्चों का भविष्य कैसा देखना चाहते हैं। क्या वे उन्हें केवल ‘करियर ओरिएंटेड’ रोबोट बनाना चाहते हैं, या एक ऐसा मनुष्य जो अपनी संस्कृति पर गर्व कर सके?
बागेश्वर धाम सरकार की यह ललकार आने वाले समय में भारतीय शिक्षा और सामाजिक ढांचे में क्या बदलाव लाती है, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल तो, ‘वेद नहीं पढ़े तो जावेद-नावेद बनेंगे बच्चे’ का नारा फिजाओं में गूंज रहा है।
