24 फरवरी, 2026: जब एक परेशान माता-पिता अपने खांसते हुए बच्चे को राहत देने के लिए केमिस्ट की दुकान से कफ सिरप (Cough Syrup) खरीदते हैं, तो वे उस दवा की बोतल पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। लेकिन क्या हो अगर वह दवा राहत देने के बजाय एक धीमे जहर का काम कर रही हो? हाल ही में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) और राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) द्वारा किए गए राष्ट्रव्यापी औचक निरीक्षण (Surprise Inspections) में एक ऐसा दिल दहला देने वाला सच सामने आया है, जिसने भारत के पूरे फार्मास्युटिकल सेक्टर (Pharmaceutical Sector) में भूचाल ला दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में खांसी का सिरप बनाने वाली लगभग 90% दवा कंपनियों (मुख्य रूप से छोटे और मंझोले दर्जे के उद्योग – MSMEs) में ‘गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज’ (GMP) और गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) के नियमों की भारी कमी पाई गई है। यह खुलासा केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह लाखों बच्चों और मरीजों की जान के साथ हो रहे एक आपराधिक खिलवाड़ का पर्दाफाश करता है।
1. जांच रिपोर्ट का खौफनाक खुलासा: देशव्यापी छापेमारी में क्या मिला? (The Shocking Truth of the CDSCO Probe)
साल 2023-2024 में विदेशों में हुई त्रासदियों के बाद, भारत सरकार ने 2025 और 2026 की शुरुआत में देश भर की दवा निर्माता कंपनियों का जोखिम-आधारित निरीक्षण (Risk-based Inspection) शुरू किया। इस अभियान का मुख्य फोकस तरल दवाएं (Liquid Orals) और कफ सिरप बनाने वाली इकाइयां थीं।
निरीक्षण के मुख्य निष्कर्ष:
निरीक्षण दल जब हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, महाराष्ट्र और सिक्किम के फार्मा हब में स्थित फैक्टरियों में पहुंचे, तो वहां का नजारा किसी बुरे सपने से कम नहीं था।
- कच्चे माल की बिना जांच के उपयोग: 90% से अधिक कंपनियों में पाया गया कि वे प्रोपलीन ग्लाइकोल (Propylene Glycol) और ग्लिसरीन (Glycerin) जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल (Raw Materials) का उपयोग करने से पहले उनका रासायनिक परीक्षण (Chemical Testing) नहीं कर रही थीं।
- फर्जी क्वालिटी कंट्रोल रिपोर्ट: कई कंपनियों में गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) प्रयोगशालाएं या तो थीं ही नहीं, या फिर वे सिर्फ दिखावे के लिए थीं। दस्तावेजों (Batch Manufacturing Records) में फर्जी आंकड़े भरकर दवाओं को ‘पास’ कर दिया जा रहा था।
- माइक्रोबायोलॉजिकल संदूषण (Microbiological Contamination): सिरप बनाने वाले प्लांट में पानी की गुणवत्ता (Water System Validation) सबसे अहम होती है। जांच में कई प्लांट्स के पानी में घातक बैक्टीरिया पाए गए।
- अयोग्य स्टाफ (Unqualified Personnel): दवा निर्माण जैसे संवेदनशील काम के लिए जिन बी-फार्मा (B.Pharm) या एम-फार्मा (M.Pharm) डिग्री धारकों की आवश्यकता होती है, उनकी जगह कंपनियों ने 10वीं या 12वीं पास अकुशल मजदूरों को काम पर रखा हुआ था।
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि मुनाफे की अंधी दौड़ में लोगों की सेहत को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया है।

2. डायथाइलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG): सिरप में ‘मौत के रसायन’ कैसे पहुंचते हैं? (The Chemistry of Death)
कफ सिरप विवाद के केंद्र में दो बेहद घातक रसायन हैं— डायथाइलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG)। आखिर ये रसायन खांसी की दवा में कैसे और क्यों पहुंच जाते हैं? इसे समझना बेहद जरूरी है।
विलायक (Solvent) का विज्ञान
खांसी के सिरप में पेरासिटामोल (Paracetamol), डेक्सट्रोमेथोर्फन (Dextromethorphan) या सेट्रीजीन (Cetirizine) जैसे सक्रिय तत्व (Active Pharmaceutical Ingredients – API) होते हैं। ये तत्व सीधे पानी में नहीं घुलते। इन्हें घोलने के लिए एक ‘विलायक’ (Solvent) की आवश्यकता होती है। फार्मास्यूटिकल उद्योग में इसके लिए प्रोपलीन ग्लाइकोल (PG) और ग्लिसरीन का उपयोग किया जाता है, जो इंसानों के लिए सुरक्षित (Non-toxic) होते हैं।
मिलावट का खूनी खेल
प्रोपलीन ग्लाइकोल और ग्लिसरीन महंगे होते हैं। पैसे बचाने के लिए, अनैतिक आपूर्तिकर्ता (Suppliers) या लालची दवा निर्माता इन सुरक्षित सॉल्वेंट्स में इंडस्ट्रियल-ग्रेड (औद्योगिक उपयोग वाले) ‘डायथाइलीन ग्लाइकोल’ (DEG) और ‘एथिलीन ग्लाइकोल’ (EG) मिला देते हैं। DEG और EG का उपयोग मुख्य रूप से कारों के एंटीफ्ऱीज़ (Antifreeze), ब्रेक फ्लुइड और पेंट उद्योग में होता है। ये रसायन स्वाद में मीठे होते हैं, इसलिए सिरप में इनकी मिलावट का पता सामान्य तरीके से नहीं चलता।
शरीर पर DEG/EG का जानलेवा प्रभाव (Toxicology)
जब कोई बच्चा इस मिलावटी सिरप को पीता है, तो उसका शरीर इन रसायनों को तोड़कर ‘ऑक्सालिक एसिड’ (Oxalic acid) और ‘ग्लाइकोलिक एसिड’ बनाता है।
- एक्यूट किडनी इंजरी (Acute Kidney Injury – AKI): ये एसिड सीधे गुर्दे (Kidneys) पर हमला करते हैं, जिससे किडनी काम करना बंद कर देती है।
- न्यूरोलॉजिकल डैमेज (Neurological Damage): बच्चों को उल्टी, पेट दर्द और पेशाब का रुक जाना जैसी शिकायतें होती हैं।
- मृत्यु: यदि समय पर डायलिसिस (Dialysis) न हो, तो कुछ ही दिनों के भीतर बच्चे का तंत्रिका तंत्र (Nervous system) और मल्टी-ऑर्गन फेल हो जाते हैं, जिससे तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है।
3. गैस क्रोमैटोग्राफी (Gas Chromatography): वह जीवनरक्षक टेस्ट जिसे 90% कंपनियों ने नजरअंदाज किया
भारतीय फार्माकोपिया (Indian Pharmacopoeia – IP) के अनुसार, किसी भी कफ सिरप का बैच बाजार में उतारने से पहले यह जांचना अनिवार्य है कि उसमें DEG और EG की मात्रा सुरक्षित सीमा (0.1% से कम) के भीतर है या नहीं।
इस परीक्षण के लिए एक विशेष और महंगी मशीन का उपयोग किया जाता है जिसे गैस क्रोमैटोग्राफ (Gas Chromatograph – GC) कहते हैं।
- कमी का कारण: 90% एमएसएमई (MSME) फार्मा कंपनियों ने जांच दल को बताया कि उनके पास GC मशीन खरीदने (जिसकी कीमत 15 से 30 लाख रुपये होती है) का बजट नहीं है।
- थर्ड-पार्टी टेस्टिंग का धोखा: जो कंपनियां थर्ड-पार्टी लैब से टेस्टिंग का दावा करती थीं, उनके पास मौजूद टेस्टिंग रिपोर्ट फर्जी पाई गईं। कई प्राइवेट लैब्स बिना सैंपल जांचे ही ‘ऑल क्लियर’ (All Clear) का सर्टिफिकेट बेच रही थीं।
यह सीधे तौर पर नियामक एजेंसियों (Regulatory Bodies) की नाक के नीचे चल रहे एक बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।

4. ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ की साख पर लगा गहरा बट्टा (Global Impact on India’s Pharmaceutical Image)
भारत को दुनिया भर में ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ (Pharmacy of the World) कहा जाता है। दुनिया में बिकने वाली हर तीसरी जेनेरिक दवा और 60% वैश्विक वैक्सीन (Vaccines) भारत में बनती हैं। लेकिन कफ सिरप के इन लगातार सामने आ रहे घोटालों ने 2026 में भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को मिट्टी में मिला दिया है।
विदेशी बाज़ारों का रिएक्शन
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अलर्ट: डब्ल्यूएचओ ने भारतीय कफ सिरप को लेकर कई मेडिकल प्रोडक्ट अलर्ट (Medical Product Alerts) जारी किए हैं।
- निर्यात में गिरावट: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया (South East Asia) के कई देशों ने भारतीय तरल दवाओं के आयात पर रोक लगा दी है या उनके परीक्षण के नियम इतने सख्त कर दिए हैं कि छोटे निर्यातकों (Exporters) का व्यापार ठप हो गया है।
- चीन और बांग्लादेश का फायदा: भारत की इस विफलता का सीधा फायदा चीन और बांग्लादेश के फार्मा उद्योगों को मिल रहा है, जो तेजी से अफ्रीकी बाजारों (African Markets) में भारत की जगह ले रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत ने तुरंत अपने गुणवत्ता मानकों (Quality Standards) में सुधार नहीं किया, तो 50 बिलियन डॉलर (लगभग 4 लाख करोड़ रुपये) का भारतीय फार्मा निर्यात उद्योग बुरी तरह ढह जाएगा।
5. एमएसएमई (MSME) फार्मा सेक्टर का संकट: ‘सर्वाइवल बनाम क्वालिटी’ (The Crisis of Small Pharma Industries)
जब हम 90% कंपनियों की बात करते हैं, तो इनमें सिप्ला (Cipla), सन फार्मा (Sun Pharma) या मैनकाइंड (Mankind) जैसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां शामिल नहीं हैं। ये मुख्य रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में चल रही छोटी और मझोली (MSME) इकाइयां हैं।
इन एमएसएमई इकाइयों के सामने एक बड़ा व्यावहारिक संकट भी है:
- प्राइस कंट्रोल (Price Control): भारत में दवाओं की कीमतें ‘नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी’ (NPPA) द्वारा तय की जाती हैं। कच्चे माल और पैकेजिंग की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन दवाओं के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़ रहे।
- टेंडर का खेल: सरकारी अस्पतालों की खरीद प्रक्रिया (Procurement Process) में ‘L1’ (सबसे कम बोली लगाने वाले) को टेंडर मिलता है। सबसे कम कीमत पर दवा देने के लिए ये छोटी कंपनियां कच्चे माल की गुणवत्ता से समझौता करती हैं और टेस्टिंग को नजरअंदाज करती हैं।
हालांकि, आर्थिक मजबूरी किसी भी रूप में इंसानी जान से खेलने का लाइसेंस नहीं हो सकती। गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।
6. सरकार और CDSCO का ‘ऑपरेशन क्लीन-अप’: नए और सख्त नियम (Government Interventions and New Regulations)
इन डरावने निष्कर्षों के बाद, स्वास्थ्य मंत्रालय (Ministry of Health and Family Welfare) और CDSCO ने 2026 में कई बड़े और सख्त फैसले लिए हैं:
- अनुज्ञप्ति (License) रद्द करना: नियमों का उल्लंघन करने वाली 150 से अधिक कंपनियों के विनिर्माण लाइसेंस (Manufacturing Licenses) तुरंत प्रभाव से निलंबित या रद्द कर दिए गए हैं।
- निर्यात से पहले अनिवार्य परीक्षण (Mandatory Testing for Export): अब भारत से बाहर जाने वाले कफ सिरप के हर बैच को सरकारी प्रयोगशालाओं (Government Labs) में जांच से गुजरना होगा। बिना ‘सर्टिफिकेट ऑफ एनालिसिस’ (CoA) के कोई भी कफ सिरप देश के बाहर नहीं जा सकता।
- शिड्यूल एम (Schedule M) का अपग्रेडेशन: सरकार ने ‘ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट’ के शिड्यूल M (जो गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस से जुड़ा है) को संशोधित कर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO-GMP) के मानकों के बराबर कर दिया है। अब छोटी कंपनियों को भी अनिवार्य रूप से उच्च गुणवत्ता वाले साफ-सुथरे कमरों (Cleanrooms) और इन-हाउस टेस्टिंग लैब का निर्माण करना होगा।
- बारकोडिंग और ट्रैसेबिलिटी (Barcoding and Traceability): बाजार में बिकने वाली हर सिरप की बोतल पर एक विशेष ‘क्यूआर कोड’ (QR Code) लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। इसे स्कैन करके उपभोक्ता यह जान सकेंगे कि दवा कब, कहां और किन कच्चे मालों से बनी है।

7. क्या आयुर्वेद और होम्योपैथी कफ सिरप सुरक्षित विकल्प हैं? (The Shift to Ayush Alternatives)
एलोपैथिक कफ सिरप (Allopathic Cough Syrups) से जुड़े इस खौफ के कारण, 2026 में भारतीय उपभोक्ता तेजी से आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक (Ayush) विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। हनी (शहद), तुलसी, मुलेठी और अदरक (Ginger) से बने सिरप की मांग बाज़ारों में तीन गुना बढ़ गई है।
लेकिन क्या ये प्राकृतिक विकल्प 100% सुरक्षित हैं?
- नियमों की शिथिलता: आयुर्वेदिक दवाओं के लिए गुणवत्ता परीक्षण के नियम एलोपैथी की तुलना में काफी शिथिल (Relaxed) हैं।
- संदूषण का खतरा: जड़ी-बूटियों से बने सिरप में भारी धातुओं (Heavy Metals) या फंगल इन्फेक्शन (Fungal infection) का खतरा रहता है यदि उनका निर्माण साफ-सुथरे वातावरण में न किया गया हो।
इसलिए, उपभोक्ताओं को यह समझना चाहिए कि ‘प्राकृतिक’ (Natural) होने का मतलब हमेशा ‘सुरक्षित’ (Safe) होना नहीं होता। आयुर्वेदिक कफ सिरप भी हमेशा ‘GMP सर्टिफाइड’ और प्रतिष्ठित ब्रांड्स के ही खरीदने चाहिए।
8. एक जागरूक उपभोक्ता के रूप में आप खुद को कैसे बचाएं? (Consumer Action Plan: How to Protect Your Family)
जब नियामक व्यवस्था (Regulatory System) में इतनी बड़ी खामियां हों, तो अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अंततः आप पर ही आ जाती है। 2026 के इस अनिश्चित माहौल में दवा खरीदते और इस्तेमाल करते समय इन बातों का कड़ाई से पालन करें:
- सेल्फ-मेडिकेशन (Self-Medication) से बचें: बच्चे को हल्की खांसी होने पर सीधे मेडिकल स्टोर से कोई भी रैंडम कफ सिरप न खरीदें। बच्चों के गुर्दे और लीवर बहुत संवेदनशील होते हैं। हमेशा एक योग्य बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) की सलाह लें।
- ब्रांड और निर्माता की जांच (Check the Manufacturer): हमेशा प्रतिष्ठित और जानी-मानी दवा कंपनियों के सिरप ही खरीदें। यदि डॉक्टर ने कोई ऐसी दवा लिखी है जिसका ब्रांड अनजान है, तो केमिस्ट से उसे किसी अच्छे ब्रांड की दवा (Substitute) से बदलने का आग्रह करें।
- लेबल को ध्यान से पढ़ें: बोतल के पीछे यह जांचें कि क्या उस पर ‘Marketed By’ (मार्केटिंग करने वाली कंपनी) और ‘Manufactured By’ (बनाने वाली कंपनी) दोनों का नाम स्पष्ट रूप से लिखा है। कई बार बड़ी कंपनियां थर्ड-पार्टी से दवा बनवाती हैं।
- QR कोड स्कैन करें: नई बोतलों पर दिए गए ‘क्यूआर कोड’ को अपने स्मार्टफोन से स्कैन करें। यदि कोड काम नहीं कर रहा है या विवरण संदिग्ध है, तो उस दवा का उपयोग कतई न करें।
- लक्षणों पर नज़र रखें: यदि कफ सिरप पीने के बाद बच्चे को उल्टियां होने लगें, उसके पेशाब की मात्रा कम हो जाए या वह अत्यधिक सुस्त (Lethargic) महसूस करे, तो तुरंत सिरप देना बंद करें और बिना समय गंवाए अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में संपर्क करें।
9. आगे की राह: क्या भारत इस दाग को धो पाएगा? (The Road Ahead for 2026 and Beyond)
90% कंपनियों में नियमों की कमी की यह रिपोर्ट भारतीय दवा उद्योग के लिए एक ‘ब्लैक स्वान’ (Black Swan) इवेंट है। इसने उस व्यवस्था की पोल खोल दी है जो बरसों से ‘जुगाड़’ और ‘भ्रष्टाचार’ के सहारे चल रही थी।
दवा एक ऐसा उत्पाद है जिसे उपभोक्ता चख कर या देख कर उसकी गुणवत्ता का पता नहीं लगा सकता; यह पूरी तरह से ‘विश्वास’ (Trust) पर आधारित उद्योग है। जब वह विश्वास टूटता है, तो केवल एक कंपनी नहीं, बल्कि पूरे देश का चिकित्सा तंत्र सवालों के घेरे में आ जाता है।
अब समय आ गया है कि भारत सरकार ‘ड्रग इंस्पेक्टरों’ (Drug Inspectors) की संख्या बढ़ाए, भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाए और नकली या घटिया दवा बनाने वालों के खिलाफ उम्रकैद (Life Imprisonment) जैसे सख्त कानून लागू करे।
2026 का यह साल भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए एक अग्निपरीक्षा है। अगर हमने आज अपने सिस्टम की इस सड़ांध को जड़ से खत्म नहीं किया, तो ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ का हमारा गर्व, ‘कब्रिस्तान ऑफ द वर्ल्ड’ के खौफनाक ताने में बदलते देर नहीं लगेगी।
