Reema Das Berlin Film Festival

भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक गौरव

सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है; यह एक ऐसा दर्पण है जो समाज की सबसे सूक्ष्म, सबसे कोमल और सबसे अनकही भावनाओं को दुनिया के सामने रखता है। जब कोई भारतीय फिल्म अंतरराष्ट्रीय मंच पर सराही जाती है, तो वह केवल एक निर्देशक की जीत नहीं होती, बल्कि वह भारत की मिट्टी से जुड़ी कहानियों की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रतीक होती है। 76वें बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (Berlinale 2026) में भारत की प्रख्यात स्वतंत्र (Indie) फिल्म निर्माता रीमा दास (Rima Das) ने अपनी नवीनतम फिल्म ‘नॉट ए हीरो’ (Not A Hero) के साथ ठीक ऐसा ही इतिहास रचा है।

शनिवार, 21 फरवरी 2026 को आयोजित पुरस्कार समारोह में, ‘नॉट ए हीरो’ ने प्रतिष्ठित ‘जेनरेशन के-प्लस’ (Generation Kplus) श्रेणी में क्रिस्टल बियर स्पेशल मेंशन (Crystal Bear Special Mention) का पुरस्कार जीता है। असम की सुरम्य लेकिन यथार्थवादी पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म एक इंडो-सिंगापुरियन (Indo-Singaporean) सह-निर्माण है, जो बाल मनोविज्ञान, पहचान की खोज और मासूमियत की एक बेहद मार्मिक यात्रा को पर्दे पर उतारती है।

1. बर्लिनाले 2026: ‘नॉट ए हीरो’ की ऐतिहासिक जीत का महत्व

बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, जिसे ‘बर्लिनाले’ (Berlinale) के नाम से जाना जाता है, कान (Cannes) और वेनिस (Venice) के साथ दुनिया के “बिग थ्री” (Big Three) फिल्म समारोहों में गिना जाता है। यहाँ किसी फिल्म का चयनित होना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, और पुरस्कार जीतना तो किसी भी फिल्म निर्माता के लिए एक सपने के सच होने जैसा है।

रीमा दास के लिए यह बर्लिन का कोई पहला सफर नहीं था। इससे पहले उनकी फिल्म ‘बुलबुल कैन सिंग’ (2019) ने जेनरेशन 14प्लस सेक्शन में स्पेशल मेंशन जीता था, और ‘विलेज रॉकस्टार्स 2’ (2025) भी यहाँ प्रदर्शित हो चुकी है। लेकिन ‘नॉट ए हीरो’ की जीत विशेष है क्योंकि यह 11 साल के एक छोटे बच्चे के मानसिक अंतर्द्वंद्व को दुनिया के सामने रखती है।

यह फिल्म असमिया, हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं का एक सुंदर मिश्रण है, जो इसे एक ही समय में ‘स्थानीय’ (Local) और ‘वैश्विक’ (Global) दोनों बनाती है।

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2. रीमा दास: ‘वन-वुमन आर्मी’ और उनका सिनेमाई सफर

भारतीय सिनेमा में रीमा दास का नाम एक प्रेरणा बन चुका है। वह एक ‘वन-वुमन आर्मी’ (One-Woman Army) के रूप में जानी जाती हैं, जो अपनी फिल्मों को खुद लिखती हैं, निर्देशित करती हैं, शूट करती हैं (Cinematography) और एडिट भी खुद ही करती हैं।

  • स्व-शिक्षित (Self-Taught) फिल्म निर्माता: बिना किसी औपचारिक फिल्म स्कूल की डिग्री के, रीमा दास ने अपने जुनून और ऑब्जर्वेशन (अवलोकन) से सिनेमा की बारीकियां सीखीं।
  • विलेज रॉकस्टार्स की विरासत: उनकी 2017 की फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’, जो मात्र 10 लाख रुपये के बजट में बनी थी, ने 91वें अकादमी पुरस्कारों (Oscars) में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि बनकर इतिहास रच दिया था। उस फिल्म ने असम में बॉक्स ऑफिस पर अपने बजट से 10 गुना अधिक कमाई की और सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता।
  • कहानी कहने का तरीका: रीमा दास की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे ‘नॉन-प्रोफेशनल’ (गैर-पेशेवर) स्थानीय कलाकारों को अपनी फिल्मों में लेती हैं। वे कोई सेट नहीं बनातीं, बल्कि प्रकृति की वास्तविक रोशनी (Natural light) और असली घरों में शूटिंग करती हैं, जिससे उनकी फिल्मों में एक ‘डॉक्यूमेंट्री’ जैसी सजीवता आ जाती है।

3. ‘नॉट ए हीरो’ की कहानी: मासूमियत और आत्म-खोज का सफर

‘नॉट ए हीरो’ की कहानी 11 वर्षीय लड़के मिवान (Mivan) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार बाल कलाकार भुमन भार्गव दास ने निभाया है।

कथानक (The Plot): यह कहानी शहरी जीवन की आपाधापी से शुरू होकर असम के एक शांत और दूरदराज के पैतृक गांव तक की यात्रा है। मिवान, जो शहर की सुख-सुविधाओं का आदी है, कुछ परिस्थितियों के कारण अपने गांव आता है। यह उसके लिए एक बिल्कुल ही ‘अनजानी दुनिया’ (Unfamiliar world) है।

  • नई चुनौतियां: गांव में उसका सामना अपनी एक सख्त और कड़वाहट से भरी बुआ से होता है। उसे वहां के तौर-तरीके, पुरुषार्थ (Masculinity) के स्थानीय मापदंड और खुद की पहचान को लेकर कई मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • प्रकृति और दोस्ती: इसी दौरान वह एक घोड़े के साथ एक अनोखा और भावनात्मक रिश्ता बनाता है। वह गांव के अन्य बच्चों के साथ मिलकर जंगलों और खेतों में बेधड़क रोमांचक यात्राओं पर निकलता है।
  • बदलाव: ये अनुभव उसे न केवल जीवन की सुंदरता से परिचित कराते हैं, बल्कि उसके भीतर छिपे उस ‘साहस’ (Courage) को भी जगाते हैं जिसके बारे में वह खुद अनजान था। फिल्म यह संदेश देती है कि ‘हीरो’ बनने के लिए दुनिया जीतना जरूरी नहीं है; खुद की कमजोरियों को स्वीकार कर लेना भी एक बड़ी बहादुरी है।

4. बाल मनोविज्ञान और ‘बिना फिल्टर’ की दुनिया का चित्रण

इस फिल्म को जिस गहराई के साथ सराहा गया है, उसका मुख्य कारण इसका बाल मनोविज्ञान (Child Psychology) का सटीक और संवेदनशील चित्रण है।

“बच्चे दुनिया को बिना किसी फिल्टर के अनुभव करते हैं। मिवान के माध्यम से, मैं देखने के एक ऐसे तरीके की ओर आकर्षित हुई जहाँ भ्रम (Confusion), प्रतिरोध (Resistance), और कोमलता (Tenderness) स्वाभाविक रूप से एक साथ मौजूद हैं। वह अपनी भावनाओं का विश्लेषण नहीं करता, वह उन्हें जीता है। मिवान एक तारणहार (Savior) के रूप में नहीं आता है, न ही वह अपनी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करता है। उसकी यात्रा बहुत शांत है, जो सुनने, असफल होने, प्रतीक्षा करने और ठहरना सीखने से आकार लेती है।” — रीमा दास (वैराइटी मैगजीन से बातचीत में)

यह दृष्टिकोण बताता है कि रीमा दास बच्चों को ‘वयस्कों के नजरिए’ से नहीं देखतीं, बल्कि वे बच्चों की दुनिया में प्रवेश करके कैमरे को उनकी आंखों के स्तर पर रख देती हैं।

5. जनरेशन के-प्लस जूरी का नज़रिया और क्रिस्टल बियर का महत्व

बर्लिनाले का ‘जेनरेशन’ (Generation) सेक्शन दुनिया भर के उन युवा और बाल दर्शकों के लिए समर्पित है, जो सिनेमा को अपनी उम्र के चश्मे से देखते हैं। इसकी जूरी में भी बच्चे और युवा ही शामिल होते हैं।

इस वर्ष चिल्ड्रन जूरी (जिसमें वाल्टर मोरित्ज़ अर्न्स्ट, गुस्ताव अर्नज़, थाबानी दाबुलमांज़ी आदि शामिल थे) ने ‘नॉट ए हीरो’ को स्पेशल मेंशन देते हुए इसे एक उत्कृष्ट कृति बताया।

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जूरी की टिप्पणियां:

  • जूरी ने इसे “शानदार कलाकारों वाली एक मजेदार फिल्म” कहा।
  • उन्होंने फिल्म के भावनात्मक जुड़ाव (Emotional depth) और इसके हल्के-फुल्के हास्य (Humor) की जमकर तारीफ की।
  • जूरी का मानना था कि मिवान की यह ‘भावनात्मक यात्रा’ (Emotional adventure) दर्शकों को सीधे उनके बचपन के दिनों और उससे जुड़े संघर्षों से जोड़ देती है।

क्रिस्टल बियर स्पेशल मेंशन का यह पुरस्कार इस बात की मुहर है कि फिल्म की कहानी केवल असम या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि जर्मनी में बैठे एक बच्चे को भी मिवान का दर्द और उसकी खुशी अपनी सी लगती है।

6. कलाकारों के अनुभव: भुमन भार्गव दास और सुकन्या बरुआ की जुबानी

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसके गैर-पेशेवर लेकिन बेहद प्रतिभाशाली बाल कलाकार हैं। मिवान की भूमिका निभाने वाले भुमन भार्गव दास (जो इससे पहले रीमा दास की फिल्म ‘तोराज़ हस्बैंड’ 2022 में भी नजर आ चुके हैं) और नवोदित अभिनेत्री सुकन्या बरुआ ने अपने अभिनय से अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

“मैं जीतकर बहुत खुश हूँ। हमारी स्क्रीनिंग बहुत शानदार रही और मेरे जैसे बहुत से बच्चे भी इसे देखने आए थे। वे अपने विचार साझा कर रहे थे और फिल्म की सराहना कर रहे थे। कुछ लोग ऑटोग्राफ लेने और तस्वीरें खिंचवाने आए! मैंने पहली बार इतना बड़ा थिएटर देखा था। यह जीत बहुत खूबसूरत लगती है क्योंकि इसका मतलब है कि लोग मेरे जैसे बच्चों की बात सुन रहे हैं और हम जो महसूस करते हैं, उसकी परवाह कर रहे हैं।” — भुमन भार्गव दास (बाल अभिनेता)

“यह मेरी पहली फिल्म और मेरा पहला बर्लिनाले है, और यह अभी भी एक सपने जैसा लगता है। ‘नॉट ए हीरो’ का हिस्सा बनना एक अद्भुत यात्रा रही है। फिल्म में काम करने से मुझे वास्तविक रूप से सुनने, देखने और बच्चों से जुड़ने के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला। इस अनुभव को मैं हमेशा याद रखूंगी।” — सुकन्या बरुआ (अभिनेत्री)

इन कलाकारों के बयान यह दर्शाते हैं कि रीमा दास का सेट केवल एक शूटिंग लोकेशन नहीं होता, बल्कि वह एक स्कूल की तरह होता है जहाँ जीवन के मूल्य सीखे जाते हैं।

7. सह-निर्माण और भाषाई विविधता: एक ‘ग्लोबल-लोकल’ अपील

सिनेमा अब सीमाओं में नहीं बंधा है। ‘नॉट ए हीरो’ का निर्माण रीमा दास के अपने बैनर ‘फ्लाइंग रिवर फिल्म्स’ (Flying River Films) और सिंगापुर स्थित ‘अकांगा फिल्म एशिया’ (Akanga Film Asia) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया है। ट्रेनट्रिपर फिल्म्स (TrainTripper Films) भी इससे जुड़ी है, और इसका वर्ल्ड सेल्स पेरिस स्थित ‘एमएमएम सेल्स’ संभाल रहा है।

यह अंतर्राष्ट्रीय सह-निर्माण (Co-production) इस बात का प्रमाण है कि यदि आपकी कहानी में ‘लोकल फ्लेवर’ (स्थानीय रस) है, तो उसे ‘ग्लोबल फंडिंग’ और मंच आसानी से मिल सकता है। फिल्म में असमिया, हिंदी और अंग्रेजी का सहज उपयोग इसे भारत के भाषाई यथार्थ के बेहद करीब ले जाता है।

8. भारतीय क्षेत्रीय और स्वतंत्र (Indie) सिनेमा के लिए इस जीत के मायने

रीमा दास की यह सफलता केवल उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के इंडिपेंडेंट (Indie) फिल्म निर्माताओं के लिए एक केस स्टडी है।

  1. बजट बनाम दृष्टि (Budget vs. Vision): अक्सर यह माना जाता है कि एक अच्छी फिल्म बनाने के लिए करोड़ों रुपये और बड़े स्टूडियो का समर्थन चाहिए। लेकिन रीमा दास ने बार-बार यह साबित किया है कि अगर आपके पास ‘दृष्टि’ (Vision) है, तो एक साधारण कैमरे और गांव के लोगों के साथ भी विश्वस्तरीय सिनेमा रचा जा सकता है।
  2. क्षेत्रीय सिनेमा का उदय: बॉलीवुड की चकाचौंध के बीच, असमिया, मलयालम, मराठी और बंगाली सिनेमा ने बार-बार भारत को विश्व स्तर पर गौरवान्वित किया है। ‘नॉट ए हीरो’ पूर्वोत्तर भारत (North-East India) के उस अनछुए सांस्कृतिक और भौगोलिक सौंदर्य को दुनिया के सामने रखती है, जिसे मुख्यधारा के सिनेमा ने अक्सर नजरअंदाज किया है।
  3. सिनेमा में ‘सच्चाई’ की वापसी: दर्शक अब नकली सेट और ओवर-द-टॉप (OTT) एक्शन से ऊब रहे हैं। उन्हें असली कहानियां, असली चेहरे और असली भावनाएं चाहिए। यही कारण है कि बर्लिन जैसे फिल्म फेस्टिवल ऐसी फिल्मों को हाथों-हाथ ले रहे हैं।

9. हॉलीवुड/बॉलीवुड की चकाचौंध बनाम रीमा दास की ‘रूटेड’ (Rooted) कहानी

आज के समय में जब हम बॉक्स ऑफिस पर 1000 करोड़ रुपये कमाने वाली ‘लार्जर दैन लाइफ’ (Larger than life) फिल्मों को ही सिनेमा की अंतिम सफलता मान लेते हैं, तब रीमा दास की फिल्में हमें रुकने और सोचने पर मजबूर करती हैं।

  • मुख्यधारा का सिनेमा (Mainstream Cinema): इसमें ‘हीरो’ वह होता है जो 100 गुंडों को मार गिराता है, जो कभी हारता नहीं है, और जो हर परिस्थिति को अपने नियंत्रण में कर लेता है।
  • रीमा दास का सिनेमा: यहाँ ‘हीरो’ वह 11 साल का बच्चा है जो अपनी बुआ की डांट से डरता है, जो एक घोड़े से बात करके सुकून पाता है, और जो यह स्वीकार करता है कि उसे सब कुछ नहीं आता।

फिल्म का शीर्षक ‘नॉट ए हीरो’ (Not A Hero) अपने आप में उस स्थापित ‘हीरोइज्म’ (Heroism) के मिथक को तोड़ता है और कहता है कि साधारण इंसान होना, और अपनी कमियों के साथ खुश रहना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

एक शांत लेकिन शक्तिशाली सिनेमाई क्रांति

बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2026 में रीमा दास की ‘नॉट ए हीरो’ द्वारा जीता गया क्रिस्टल बियर स्पेशल मेंशन भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक और सुनहरा पन्ना जोड़ता है। यह उन तमाम बच्चों के अधिकारों, उनकी मासूमियत और उनकी पसंद की जीत है जिसे अक्सर बड़े लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं के तले दबा देते हैं।

रीमा दास ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब आप अपनी जड़ों (Roots) से जुड़कर, अत्यंत सादगी और सत्यनिष्ठा के साथ कोई कहानी कहते हैं, तो दुनिया की कोई भी भाषा या सरहद उस कहानी को दिलों तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। मिवान की यह शांत यात्रा भारतीय सिनेमा के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है, जो आने वाले युवा फिल्म निर्माताओं को बिना किसी भारी-भरकम संसाधनों के अपने सपने सच करने की प्रेरणा देती रहेगी।

By Vivan Verma

विवान तेज खबरी (Tez Khabri) के समाचार रिपोर्टर हैं, जो ब्रेकिंग न्यूज़ और राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को कवर करते हैं। विवान तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और तेज अपडेट के लिए जाने जाते हैं और प्रशासनिक व जनहित से जुड़े मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।

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