Bangladesh Hindus Issue

सीमा के उस पार का सन्नाटा और दर्द

आज तारीख 11 फरवरी 2026 है। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन (अगस्त 2024) को अब डेढ़ साल से अधिक का समय हो चुका है। जब ढाका की सड़कों पर तथाकथित ‘क्रांति’ का जश्न मनाया जा रहा था, तब देश के सुदूर गांवों और शहरों में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू और उदारवादी मुस्लिम (Secular Muslims) अपने घरों में दुबके हुए थे। उन्हें उम्मीद थी कि यह अराजकता क्षणिक होगी और उनका सबसे बड़ा पड़ोसी और ऐतिहासिक मित्र—भारत—उनके रक्षक के रूप में खड़ा होगा।

लेकिन आज, 2026 में, वह उम्मीद निराशा में बदल चुकी है। Bangladesh Hindus Issue अब केवल मानवाधिकार का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह भारत की विदेश नीति और रणनीतिक धैर्य (Strategic Patience) पर उठे गंभीर सवालों का पुलिंदा बन गया है।

ढाका से लेकर चटगांव तक, और सिलहट से लेकर खुलना तक, हिंदू समुदाय और धर्मनिरपेक्ष आवाज़ें आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। उनकी शिकायत यह नहीं है कि भारत ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया, बल्कि शिकायत यह है कि भारत ने उस ‘नैतिक बल’ का प्रयोग क्यों नहीं किया जिसका वादा 1971 की मुक्ति वाहिनी के समय किया गया था।

भाग 1: अगस्त 2024 का वह दौर और टूटे हुए सपने (The Turning Point)

इस निराशा की जड़ें 5 अगस्त 2024 के उस दिन में हैं जब शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा था। वह केवल एक सरकार का गिरना नहीं था, बल्कि बांग्लादेश के उस ‘धर्मनिरपेक्ष ढांचे’ का ढ़हना था, जिसे भारत ने दशकों तक समर्थन दिया था।

हिंसा का तांडव और भारत की प्रतिक्रिया:

सरकार गिरने के तुरंत बाद, Minority Attacks in Bangladesh की एक बाढ़ आ गई थी। मंदिरों को जलाया गया, इस्कॉन (ISKCON) केंद्रों पर हमले हुए, और हिंदू व्यवसायों को निशाना बनाया गया। उस समय, पीड़ितों की निगाहें दिल्ली की ओर थीं।

  • अपेक्षा: उन्हें लगा था कि भारत सरकार तुरंत सख्त बयान जारी करेगी, सीमा पर दबाव बढ़ाएगी या अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को जवाबदेह ठहराएगी।
  • हकीकत: भारत ने बहुत ही नपा-तुला कूटनीतिक रुख अपनाया। भारत ने “चिंता” व्यक्त की, लेकिन संबंधों को पूरी तरह तोड़ने या सख्त आर्थिक नाकेबंदी करने से परहेज किया।

यह ‘संतुलित प्रतिक्रिया’ ही आज Bangladesh Hindus Issue में निराशा का सबसे बड़ा कारण बनी है। पीड़ितों को लगा कि भारत ने अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों (Strategic Interests) के लिए अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का सौदा कर लिया।

भाग 2: ‘उदारवादी वर्ग’ (Liberals) की हताशा – दोहरी मार

अक्सर हम केवल हिंदुओं की बात करते हैं, लेकिन बांग्लादेश में एक बड़ा वर्ग ‘उदारवादी मुसलमानों’ का है—लेखक, ब्लॉगर, कलाकार और 1971 के मूल्यों में विश्वास ऱखने वाले लोग। वे भी भारत से उतने ही निराश हैं।

जमात-ए-इस्लामी का पुनरुत्थान:

2026 में, हम देख रहे हैं कि बांग्लादेश की राजनीति में कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी और हिफाजत-ए-इस्लाम मुख्यधारा में आ चुके हैं।

  • उदारवादियों का कहना है कि भारत ने शेख हसीना के शासनकाल में केवल ‘एक व्यक्ति’ (हसीना) का समर्थन किया, न कि ‘संस्थानों’ का।
  • जब हसीना गिरीं, तो भारत के पास वहां के सिविल सोसाइटी या विपक्ष के साथ कोई संवाद का रास्ता (Channel) नहीं था।
  • आज, जब कट्टरपंथी इन उदारवादियों को ‘भारत का दलाल’ (Indian Agents) कहकर निशाना बना रहे हैं, तो भारत उन्हें कोई नैतिक समर्थन नहीं दे पा रहा है। वे अपने ही देश में विदेशी बन गए हैं और भारत ने उनसे मुंह फेर लिया है।

भाग 3: भारत की ‘रणनीतिक मजबूरी’ या ‘उदासीनता’? (India’s Dilemma)

अल्पसंख्यकों की निराशा को समझने के लिए हमें सिक्के के दूसरे पहलू—भारत की India-Bangladesh Relations की मजबूरियों—को भी समझना होगा। आखिर भारत चुप क्यों है?

1. “चिकन नेक” और पूर्वोत्तर की सुरक्षा:

भारत का सिलीगुड़ी कॉरिडोर (Chicken’s Neck) सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। यदि भारत बांग्लादेश की नई सरकार (चाहे वह यूनुस के नेतृत्व में हो या बीएनपी के) के साथ पूर्ण शत्रुता मोल ले लेता, तो पाकिस्तान की आईएसआई (ISI) और चीन वहां अपनी जड़ें और गहरी कर लेते। भारत नहीं चाहता था कि उसका पूर्वी पड़ोसी पूरी तरह से चीन की गोद में चला जाए।

2. ‘हस्तक्षेप’ का टैग:

बांग्लादेश में भारत विरोधी भावना (Anti-India Sentiment) 2024 के बाद चरम पर थी। “India Out” अभियान चलाए जा रहे थे। यदि भारत हिंदुओं के पक्ष में खुलकर हस्तक्षेप करता, तो कट्टरपंथियों को यह प्रचारિત करने का मौका मिल जाता कि हिंदू “भारत के जासूस” हैं। भारत की चुप्पी का एक तर्क यह था कि वह अल्पसंख्यकों को और अधिक खतरे में नहीं डालना चाहता था।

लेकिन, जमीन पर मार खा रहे हिंदू के लिए यह Geopolitical Strategy कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए यह भारत का ‘विश्वासघात’ है।

भाग 4: वीजा संकट – जब अपने ही दरवाजे बंद हो गए

निराशा का एक सबसे बड़ा और व्यावहारिक कारण है—वीजा (Visa)। तख्तापलट के बाद, भारत ने सुरक्षा कारणों से बांग्लादेशी नागरिकों के लिए वीजा जारी करना लगभग बंद कर दिया या अत्यंत सीमित कर दिया।

  • चिकित्सा और शरण: हजारों बांग्लादेशी हिंदू और उदारवादी, जो जान बचाकर या इलाज के लिए भारत आना चाहते थे, वे सीमा पर फंस गए।
  • संदेश: इस कदम ने बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों को यह संदेश दिया कि “भारत केवल बातों में हमारा है, संकट के समय उसने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं।”
  • 2026 में भी, वीजा प्रक्रिया सामान्य नहीं हुई है। यह Visa Crisis भावनात्मक रूप से समुदाय को तोड़ रहा है। उन्हें लगता है कि सीएए (CAA) जैसे कानूनों की बातें केवल भारतीय चुनावों के लिए थीं, वास्तविकता में उन्हें शरण देने की कोई मंशा नहीं है।

भाग 5: चिन्मय कृष्ण दास और इस्कॉन का मुद्दा

2024 के अंत में इस्कॉन के पूर्व नेता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी और उन पर लगाए गए राजद्रोह के आरोपों ने Hindu Persecution की आग में घी का काम किया। जब उन्हें गिरफ्तार किया गया और उनकी जमानत नामंजूर की गई, तब बांग्लादेशी हिंदू सड़कों पर उतरे। वे उम्मीद कर रहे थे कि भारत सरकार इस पर ‘अंतर्राष्ट्रीय दबाव’ बनाएगी।

  • हालांकि भारत ने बयान जारी किया, लेकिन बांग्लादेशी हिंदुओं को लगा कि यह प्रतिक्रिया बहुत “નરમ” (Mild) थी।
  • वे चाहते थे कि भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ मिलकर बांग्लादेश पर आर्थिक प्रतिबंधों (Sanctions) की धमकी दे। जब ऐसा नहीं हुआ, तो यह धारणा प्रबल हो गई कि भारत अब बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में “हस्तक्षेप न करने” की नीति पर चल पड़ा है, चाहे उसकी कीमत हिंदुओं को चुकानी पड़े।

भाग 6: मीडिया नैरेटिव बनाम जमीनी हकीकत

भारत और बांग्लादेश के बीच मीडिया कवरेज ने भी इस निराशा को बढ़ाया है।

  • भारतीय मीडिया: भारत के कुछ न्यूज़ चैनलों ने बांग्लादेश की घटनाओं को बहुत ही आक्रामक और कभी-कभी अतिશયોક્તિपूर्ण (Hyper-nationalist) तरीके से दिखाया। इससे बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं के प्रति बहुसंख्यक वर्ग का गुस्सा और ભડક गया।
  • जमीनी हकीकत: बांग्लादेशी हिंदुओं का कहना है कि “भारतीय मीडिया हमें खतरे में डालता है, और भारत सरकार हमें बचाने नहीं आती।” यह विरोधाभास (Contradiction) उनकी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।

भाग 7: अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी और भारत की भूमिका

बांग्लादेशी हिंदू और उदारवादी वर्ग केवल भारत से ही नहीं, बल्कि विश्व समुदाय से भी निराश है, लेकिन उनकी मुख्य शिकायत भारत से है क्योंकि वे भारत को अपना स्वाभाविक मित्र मानते हैं।

  • Global Silence: अमेरिका और पश्चिमी देश, जो मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं, उन्होंने बांग्लादेश के नए शासन के साथ अपने “रणनीतिक संबंधों” को प्राथमिकता दी।
  • भारत की विफलता? आलोचकों का मानना है कि भारत, ‘ग्લોबल साउथ’ का नेता होने के नाते, बांग्लादेश में हो रहे Human Rights Violations को वैश्विक मंच पर उस तरह नहीं उठा पाया जैसे उसे उठाना चाहिए था। भारत ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में भी बहुत सधे हुए कदम उठाए, जिससे पीड़ितों को लगा कि उनकी आवाज़ को ‘कूटनीतिक शिष्टाचार’ के शोर में દબા दिया गया।

भाग 8: 2026 में जनसांख्यिकीय बदलाव का डर (Demographic Fear)

डेढ़ साल के निरंतर तनाव और असुरक्षा के कारण, 2026 में हम बांग्लादेश से एक ‘मौन पलायन’ (Silent Exodus) देख रहे हैं।

  • जो संपन्न हिंदू परिवार थे, वे यूरोप, अमेरिका या कनाडा चले गए।
  • जो मध्यमवर्गीय और गरीब थे, वे अवैध तरीकों से सीमा पार करने की कोशिश कर रहे हैं या डर के साये में जी रहे हैं।

उदारवादियों का कहना है कि भारत की निष्क्रियता के कारण बांग्लादेश धीरे-धीरे “दूसरा पाकिस्तान” बनने की राह पर है, जहाँ अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। यह Demographic Shift भारत की सुरक्षा के लिए भी भविष्य में बड़ा खतरा बनेगा, लेकिन भारत सरकार इसे अभी ‘आंतरिक मामला’ मानकर टाल रही है।

भाग 9: आर्थिक नाकेबंदी की मांग और भारत का इनकार

बांग्लादेशी हिंदू संगठनों ने कई बार मांग की थी कि भारत को बांग्लादेश पर दबाव बनाने के लिए आवश्यक वस्तुओं (प्याज, बिजली, डीजल) की आपूर्ति रोक देनी चाहिए या उस पर कड़े Economic Sanctions लगाने चाहिए।

  • भारत का तर्क: भारत का मानना है कि आर्थिक नाकेबंदी से आम बांग्लादेशी (जिसमें हिंदू भी शामिल हैं) प्रभावित होंगे और भारत विरोधी भावनाएं और ભડકેંગી। साथ ही, इससे बांग्लादेश चीन पर पूरी तरह निर्भर हो जाएगा।
  • निराशा: पीड़ित वर्ग को यह तर्क “बહાનેબાજી” लगता है। उनका मानना है कि जब तक पेट पर लात नहीं पड़ेगी, तब तक कट्टरपंथी तत्व काबू में नहीं आएंगे। भारत का व्यापार जारी रखना उन्हें अपनी पीड़ा का अपमान लगता है।

भाग 10: सीएए (CAA) का विरोधाभास

भारत में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर बहुत शोर मचा था। बांग्लादेशी हिंदुओं को लगा था कि यह कानून उनके लिए एक सुरक्षा कवच है।

  • लेकिन 2024-2026 के संकट काल में, सीएए के तहत नियमों की जटिलता और सीमा पर कड़ાઈ ने यह साबित कर दिया कि यह कानून राजनीतिक बयानबाजी ज्यादा था और व्यावहारिक समाधान कम।
  • जो लोग भारत आए, वे आज भी नागरिकता के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। इसे देखकर बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं का भारत की व्यवस्था से मोहभंग हो गया है।

भाग 11: क्या भारत के पास कोई विकल्प था? (Strategic Analysis)

एक निष्पक्ष विश्लेषक के रूप में, हमें यह भी देखना होगा कि क्या भारत वाकई कुछ अलग कर सकता था? इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत ने नेपाल या श्रीलंका में सख्त हस्तक्षेप (Hard Intervention) किया, तब-तब उसे दीर्घकालिक नुकसान उठाना पड़ा।

  • Bangladesh Crisis में सैन्य हस्तक्षेप असंभव था।
  • पूर्ण बहिष्कार से भारत अपने पड़ोस में एक शत्रु राष्ट्र खड़ा कर लेता।

भारत ने “एंगेજમેન્ટ” (Engagement) का रास्ता चुना—यानी नई सरकार के साथ बातचीत जारी रखना ताकि हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। लेकिन समस्या यह है कि यह ‘धीमी दवा’ है, और मरीज (अल्पसंख्यक) आईसीयू में है। कूटनीति का समय और पीड़ित का समय अलग-अलग चलता है। यही Trust Deficit का मुख्य कारण है।

भाग 12: भविष्य की राह – क्या भरोसा फिर कायम होगा?

आज 11 फरवरी 2026 को स्थिति यह है कि बांग्लादेशी हिंदू समाज भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देखना छोड़कर अब ‘आत्मरक्षा’ और ‘अंतर्राष्ट्रीय लॉबिंग’ की ओर बढ़ रहा है।

भविષ્ય के संकेत:

  1. स्वतंत्र आवाज़: बांग्लादेशी हिंदू अब भारत के माध्यम से नहीं, बल्कि सीधे यूएन और मानवाधिकार संगठनों के पास जा रहे हैं।
  2. भारत की नीति में बदलाव: भारत को यह समझना होगा कि केवल “सरकार से सरकार” (Govt-to-Govt) रिश्ते काफी नहीं हैं। उसे “लोगों से लोगों” (People-to-People) के रिश्ते सुधारने होंगे, विशेषकर अपने नैसर्गिक मित्र—अल्पसंख्यकों और उदारवादियों—के साथ।

एक ऐतिहासिक रिश्ते का दर्दनाक अध्याय

अंत में, Bangladesh Hindus Issue पर हिंदुओं और उदारवादियों की निराशा अકારણ नहीं है। यह उस वादे के टूटने का दर्द है जो 1971 के रक्तरंजित संघर्ष में किया गया था—एक धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बांग्लादेश का वादा।

भारत अपनी भू-राजनीतिक मजबूरियों में बंधा हो सकता है, लेकिन एक सभ्यतागत राष्ट्र (Civilizational State) के रूप में, अपनी ही सीमाओं के पास अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक संतानों को मिटते हुए देखना उसकी नैतिक विफलता मानी जाएगी।

उदारवादी और अल्पसंख्यक वर्ग आज भारत से सेना नहीं मांग रहा, वे केवल एक “मजबूत, स्पष्ट और परिणाम-उन्मुख” कूटनीतिक ढाल मांग रहे हैं। जब तक भारत अपनी ‘चुप्पी’ और ‘रणनीति’ के बीच का अंतर स्पष्ट नहीं करता, तब तक यह ऐतिहासिक खाई और चौड़ी होती जाएगी।

2026 का साल भारत की विदेश नीति के लिए एक लिटमस टेस्ट है—क्या वह अपने रणनीतिक हितों को साधते हुए अपने मानवीय दायित्वों को निभा पाएगा? फिलहाल, बांग्लादेश की गलियों में गूंजती खामोशी इसका नकारात्मक उत्तर दे रही है।

By Vivan Verma

विवान तेज खबरी (Tez Khabri) के समाचार रिपोर्टर हैं, जो ब्रेकिंग न्यूज़ और राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को कवर करते हैं। विवान तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और तेज अपडेट के लिए जाने जाते हैं और प्रशासनिक व जनहित से जुड़े मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।

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