जब एक अनसुने राज्य की आवाज़ गूँजी वैश्विक मंच पर
“सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है; यह उन आवाज़ों और कहानियों को दुनिया तक पहुँचाने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है, जिन्हें अक्सर हाशिए पर धकेल दिया जाता है।”
22 फरवरी 2026 (रविवार) की रात भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसे स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है, जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा। लंदन के भव्य ‘रॉयल फेस्टिवल हॉल’ (Royal Festival Hall) में आयोजित 79वें ब्रिटिश एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन आर्ट्स (BAFTA 2026) अवार्ड्स में, भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर की एक बेहद संवेदनशील और खूबसूरत फिल्म ‘Boong’ (बूंग) ने इतिहास रच दिया है।
लक्ष्मणप्रिया देवी (Lakshmipriya Devi) द्वारा निर्देशित और फरहान अख्तर तथा रितेश सिधवानी (Excel Entertainment) द्वारा निर्मित इस मणिपुरी-भाषा की फिल्म ने ‘बेस्ट चिल्ड्रन्स एंड फैमिली फिल्म’ (Best Children’s & Family Film) का प्रतिष्ठित बाफ्टा (BAFTA) पुरस्कार अपने नाम किया है। यह कोई साधारण जीत नहीं है; यह पहली बार है जब किसी भारतीय फिल्म ने इस विशिष्ट श्रेणी में बाफ्टा का खिताब जीता है।
1. डेविड बनाम गोलियत (David vs Goliath): ‘Boong’ ने हॉलीवुड के किन दिग्गजों को दी मात?
जब बाफ्टा 2026 के नॉमिनेशन की घोषणा हुई थी, तो किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि एक स्वतंत्र (Independent) भारतीय क्षेत्रीय फिल्म हॉलीवुड के सबसे बड़े स्टूडियोज़ को चुनौती दे पाएगी। ‘Boong’ का मुकाबला उन फिल्मों से था जिनका बजट और मार्केटिंग भारत की किसी भी बड़ी ब्लॉकबस्टर से कई गुना ज्यादा था।
मुकाबले का तुलनात्मक विश्लेषण (The Nominees Analysis):
| फिल्म का नाम (Film) | देश / स्टूडियो | जोनर (Genre) | ‘Boong’ के सामने क्या थी चुनौती? |
| Zootopia 2 (ज़ूट्रोपोलिस 2) | अमेरिका (Disney) | एनिमेटेड कॉमेडी | यह $1.8 बिलियन (अरबों डॉलर) की कमाई करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी एनिमेटेड फ्रेंचाइजी में से एक है। |
| Lilo & Stitch (लिलो एंड स्टिच) | अमेरिका (Hollywood) | लाइव-एक्शन / एनिमेशन | डिज़्नी का एक बेहद लोकप्रिय और क्लासिक ग्लोबल ब्रांड, जिसे पूरी दुनिया के बच्चे जानते हैं। |
| Arco (आर्को) | फ्रांस (French Sci-fi) | एनिमेटेड साइंस फिक्शन | यूरोपीय सिनेमा का मास्टरपीस, जिसे स्थानीय ब्रिटिश और यूरोपीय जूरी का भारी समर्थन प्राप्त था। |
| Boong (बूंग) | भारत (मणिपुर) | लाइव-एक्शन ड्रामा | एक डेब्यू (पहली बार) निर्देशिका की फिल्म, गुमनाम चेहरे, और एक ऐसी भाषा (मणिपुरी) जिसे जूरी ने शायद ही पहले कभी सुना हो। |
इन सभी बॉक्स-ऑफिस ‘जायंट्स’ को पछाड़कर ‘Boong’ का बाफ्टा जीतना यह साबित करता है कि जब कहानी में ज़मीनी सच्चाई, मिट्टी की खुशबू और मानवीय संवेदनाएं (Human Emotions) होती हैं, तो वह अरबों डॉलर के वीएफएक्स (VFX) और एनिमेशन पर भारी पड़ जाती है।

2. कहानी का दिल: आखिर क्या है ‘Boong’ की कहानी? (The Plot)
‘Boong’ कोई काल्पनिक सुपरहीरो की कहानी नहीं है। यह एक ‘कमिंग-ऑफ़-एज’ (Coming-of-age) यानी बचपन से समझदारी की ओर बढ़ते कदमों की एक बेहद भावुक और यथार्थवादी कहानी है।
- मुख्य पात्र और पृष्ठभूमि: कहानी मणिपुर की घाटी (Valley) में रहने वाले एक छोटे से स्कूली बच्चे ‘बूंग’ (जिसका किरदार नवोदित बाल कलाकार गुगुन किपगेन – Gugun Kipgen ने निभाया है) के इर्द-गिर्द घूमती है। बूंग अपनी सिंगल मदर (अकेली माँ) ‘मंदाकिनी’ (मणिपुरी अभिनेत्री बाला हिज़म – Bala Hijam) के साथ रहता है।
- कथानक (The Quest): बूंग अपनी माँ को उनके जन्मदिन पर दुनिया का सबसे अच्छा ‘सरप्राइज गिफ्ट’ देना चाहता है। उसके बाल-मन को लगता है कि अगर वह अपने गायब हो चुके पिता ‘जयकुमार’ को वापस घर ले आए, तो यह उसकी माँ के लिए सबसे बड़ा तोहफा होगा। अपने पिता की तलाश में, बूंग अपने सबसे अच्छे दोस्त ‘राजू अग्रवाल’ (एक मारवाड़ी लड़का जिसे मणिपुर में ‘बाहरी’ माना जाता है, किरदार – अंगोम सनामतुम) के साथ एक लंबी और खतरनाक यात्रा पर निकल पड़ता है।
- मोरेह (Moreh) सीमा का सफर: इन बच्चों की यह यात्रा उन्हें मणिपुर के दूरदराज़ इलाकों से होते हुए म्यांमार (Myanmar) की सीमा पर स्थित ‘मोरेह’ शहर तक ले जाती है। इस सफर के दौरान, बच्चों का मासूम नज़रिया राज्य में दबे हुए नस्लीय तनाव (Racial tensions), ज़ेनोफोबिया (Xenophobia), और सीमा-पार की जटिल राजनीतिक वास्तविकताओं से टकराता है।
यह फिल्म दर्शकों को हंसाती है, रुलाती है और बिना किसी लाउड मेलोड्रामा (Melodrama) के एक बहुत गहरा संदेश दे जाती है।
3. ‘द मास्टरमाइंड’: निर्देशिका लक्ष्मप्रिया देवी का विज़न और संघर्ष
किसी भी महान फिल्म के पीछे एक ऐसे निर्देशक का दिमाग होता है जो उस कहानी को अपनी आत्मा से जीता है। लक्ष्मप्रिया देवी (Lakshmipriya Devi) के लिए ‘Boong’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि उनके बचपन की ‘खट्टी-मीठी यादों’ (Bittersweet memories) का एक दस्तावेज है।
- बॉलीवुड से हॉलीवुड तक का सफर: लक्ष्मप्रिया देवी कोई नौसिखिया नहीं हैं। एक निर्देशक के रूप में यह उनकी पहली फीचर फिल्म ज़रूर है, लेकिन इससे पहले उन्होंने ‘लक्ष्य’ (Lakshya), आमिर खान की ‘पीके’ (PK), ‘तलाश’ और मीरा नायर की प्रतिष्ठित सीरीज़ ‘ए सूटेबल बॉय’ (A Suitable Boy) में फर्स्ट असिस्टेंट डायरेक्टर (First AD) के रूप में काम किया है।
- एक विडंबना (The Irony of Casting): फिल्म में ‘बूंग’ एक मैतेई (Meitei) समुदाय का लड़का है, लेकिन वास्तविक जीवन में इस किरदार को निभाने वाला बच्चा ‘गुगुन किपगेन’ कुकी-ज़ो (Kuki-Zo) समुदाय से आता है। आज जब मणिपुर इन दोनों समुदायों के बीच जातीय हिंसा की आग में जल रहा है, तब इस फिल्म की कास्टिंग इंसानियत और कला का एक ऐसा उदाहरण पेश करती है जो हर राजनीतिक नफरत से ऊपर है।
- मोरेह का आखिरी दस्तावेज़: लक्ष्मप्रिया ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने यह फिल्म मई 2023 में जातीय हिंसा भड़कने से ठीक पहले शूट की थी। जिस ‘मोरेह’ शहर को फिल्म में दिखाया गया है, वह अब हिंसा में पूरी तरह तबाह हो चुका है। ‘Boong’ उस शांत और खूबसूरत मोरेह का आखिरी विज़ुअल डॉक्यूमेंट (अंतिम दस्तावेज़) बन गई है।
4. बाफ्टा का मंच और वह रुला देने वाली स्पीच (The Emotional Acceptance Speech)
जब ‘पैडिंगटन द म्यूजिकल’ के मशहूर किरदार ‘पैडिंगटन बियर’ (Paddington Bear) ने ‘Boong’ को विजेता घोषित किया, तो पूरा रॉयल फेस्टिवल हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने वहां मौजूद हर हॉलीवुड और ब्रिटिश दिग्गज की आँखें नम कर दीं।
लक्ष्मप्रिया देवी ने मंच पर आकर अपनी मातृभाषा मणिपुरी में “खुरुमजरी!” (Khurumjari – नमस्कार) कहकर अपने भाषण की शुरुआत की।
उन्होंने जो कहा, वह केवल एक फिल्म मेकर की खुशी नहीं थी, बल्कि एक जलते हुए राज्य की बेटी की पुकार थी:
“यहाँ तक चलकर आना ऐसा लग रहा है जैसे हम किसी ऐसे पहाड़ की चोटी तक पहुँच गए हैं, जिसकी चढ़ाई के बारे में हमें खुद भी मालूम नहीं था। मैं बाफ्टा और जूरी को धन्यवाद देती हूँ कि उन्होंने हमारी एक छोटी सी फिल्म को इतना बड़ा प्यार दिया। यह फिल्म एक ऐसी जगह से जुड़ी है जो बहुत अशांत है, जिसे बहुत नज़रअंदाज़ किया गया है और जिसका भारत में कोई खास प्रतिनिधित्व नहीं है—मेरी मातृभूमि, मणिपुर।”
शांति की अपील (Plea for Peace): उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “मैं इस वैश्विक मंच का उपयोग करते हुए यह प्रार्थना करना चाहती हूँ कि मेरे मणिपुर में शांति वापस लौटे। हम प्रार्थना करते हैं कि फिल्म के इन बाल कलाकारों सहित वो सभी बच्चे जो हिंसा के कारण अपने घरों से विस्थापित (Internally displaced) हुए हैं, उनकी खुशियां, उनकी मासूमियत और उनके सपने उन्हें वापस मिल जाएं। हम प्रार्थना करते हैं कि कोई भी संघर्ष (Conflict) इतना ताकतवर न हो कि वह इंसानों की सबसे बड़ी सुपरपावर—यानी ‘क्षमा’ (Forgiveness)—को नष्ट कर सके।”
उनका यह भाषण कला जगत में इस बात का परिचायक बन गया कि सिनेमा कैसे राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों के बीच शांति का एक पुल बन सकता है।
5. क्षेत्रीय सिनेमा पर बॉलीवुड का दांव: एक्सेल एंटरटेनमेंट का अहम योगदान (The Production Support)
अगर ‘Boong’ जैसी ज़मीनी कहानी को सही आर्थिक और डिस्ट्रीब्यूशन सपोर्ट न मिलता, तो शायद यह दुनिया तक कभी नहीं पहुँच पाती।

- बॉलीवुड के दिग्गज फिल्म निर्माता फरहान अख्तर (Farhan Akhtar) और रितेश सिधवानी (Ritesh Sidhwani) के प्रोडक्शन हाउस ‘एक्सेल एंटरटेनमेंट’ (Excel Entertainment) और विकेश भूटानी के ‘चॉकबोर्ड एंटरटेनमेंट’ (Chalkboard Entertainment) ने इस फिल्म पर पैसा लगाया।
- आमतौर पर बॉलीवुड के बड़े स्टूडियोज़ कमर्शियल हिंदी मसाला फिल्मों पर दांव लगाते हैं। लेकिन फरहान अख्तर का एक मणिपुरी भाषा की फिल्म को सपोर्ट करना यह दर्शाता है कि भारतीय फिल्म उद्योग (Indian Film Industry) अब क्षेत्रीय कहानियों (Regional Stories) की वैश्विक क्षमता को पहचान रहा है। इस जीत से भविष्य में पूर्वोत्तर भारत (Northeast India) के फिल्म मेकर्स के लिए फंडिंग और प्लेटफॉर्म के नए दरवाज़े खुलेंगे।
6. एक विरोधाभास: जिस राज्य में हिंदी फिल्में बैन हैं, वहां की फिल्म ने देश का मान बढ़ाया (The Socio-Political Context)
‘Boong’ की इस बाफ्टा जीत का 360-डिग्री विश्लेषण तब तक अधूरा है, जब तक हम मणिपुर की ज़मीनी राजनीतिक सच्चाई को नहीं समझते।
- हिंदी फिल्मों पर प्रतिबंध (Ban on Hindi Films): यह एक बहुत बड़ी विडंबना है कि जिस भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए ‘Boong’ ने लंदन में तिरंगा फहराया है, उसी मणिपुर में पिछले कई दशकों (लगभग 2000 के दशक की शुरुआत) से विद्रोही गुटों के फरमान के कारण सिनेमाघरों में ‘हिंदी फिल्मों’ का प्रदर्शन बैन (प्रतिबंधित) है।
- जातीय हिंसा और AFSPA: मई 2023 से मैतेई और कुकी समुदायों के बीच भड़की हिंसा में अब तक 250 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और हज़ारों बेघर हैं। इसके अलावा दशकों से वहां लागू ‘AFSPA’ (सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून) ने हमेशा राज्य को एक सैन्य छावनी में तब्दील रखा है।
- ऐसे तनावपूर्ण और दर्दनाक माहौल के बीच से निकलकर एक फिल्म का ‘प्यार, मासूमियत और क्षमा’ का संदेश पूरी दुनिया को देना, कला की उस ताकत को दर्शाता है जिसे कोई बंदूक नहीं मार सकती। मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने भी इस जीत को ‘आशा की जीत’ (Triumph of Hope) करार दिया है।
7. बाफ्टा की रात में भारतीय ग्लैमर: आलिया भट्ट की चमक (Indian Presence at BAFTA)
‘Boong’ की टीम के अलावा, इस बार बाफ्टा में भारत की उपस्थिति अन्य कारणों से भी मजबूत रही। बॉलीवुड की सुपरस्टार आलिया भट्ट (Alia Bhatt) ने इस भव्य समारोह में एक ‘प्रेजेंटर’ (Presenter) के तौर पर हिस्सा लिया।
- गुच्ची (Gucci) के शानदार सिल्वर सेक्विन गाउन और वाइट फर स्टोल (White fur stole) में रेड कार्पेट पर उतरीं आलिया भट्ट ने भारत के ग्लैमर को प्रदर्शित किया।
- आलिया ने ‘बेस्ट फिल्म नॉट इन द इंग्लिश लैंग्वेज’ (Best Film Not in the English Language) का पुरस्कार नॉर्वेजियन फिल्म मेकर जोआचिम ट्रायर की फिल्म ‘सेंटिमेंटल वैल्यू’ को प्रदान किया। एक ही रात में आलिया भट्ट का ग्लैमर और लक्ष्मप्रिया देवी का ज़मीनी यथार्थ—भारत के सिनेमाई स्पेक्ट्रम की एक संपूर्ण तस्वीर पेश कर रहा था।
8. टोरंटो से लंदन तक: ‘Boong’ का वैश्विक सफर (The Global Festival Journey)
बाफ्टा की ट्रॉफी कोई रातों-रात मिला सम्मान नहीं है। इस फिल्म ने वैश्विक पटल पर खुद को बार-बार साबित किया है:
- TIFF 2024: फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर सितंबर 2024 में प्रतिष्ठित ‘टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ (Toronto International Film Festival) के डिस्कवरी सेक्शन में हुआ था, जहां इसे स्टैंडिंग ओवेशन मिला।
- IFFM 2025: इसे ‘इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ मेलबर्न’ में स्पॉटलाइट फिल्म के रूप में चुना गया।
- अन्य सम्मान: कनाडा के अंतर्राष्ट्रीय दक्षिण एशियाई फिल्म महोत्सव में ‘सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म’ और गोवा के बुलबुल चिल्ड्रन्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में लक्ष्मप्रिया को ‘सर्वश्रेष्ठ निर्देशक’ का पुरस्कार पहले ही मिल चुका था।
इन तमाम फेस्टिवल्स में अपनी धाक जमाने के बाद, बाफ्टा की जीत इस फिल्म की यात्रा का सबसे बड़ा ‘क्राउनिंग मोमेंट’ (Crowning Moment) है।
भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के लिए एक ‘वाटरशेड मोमेंट’ (A Watershed Moment)
मणिपुरी फिल्म ‘Boong’ की बाफ्टा 2026 में ऐतिहासिक जीत केवल एक फिल्म यूनिट की सफलता नहीं है; यह भारत के उस ‘पूर्वोत्तर’ (Northeast) हिस्से की जीत है जो मुख्यधारा (Mainstream) के नैरेटिव से हमेशा गायब रहता है। जब एक छोटा सा मणिपुरी बच्चा ‘बूंग’ पर्दे पर अपने टूटे हुए परिवार को जोड़ने के लिए निकलता है, तो अनजाने में ही वह एक टूटे हुए समाज और एक बंटी हुई दुनिया को जोड़ने का संदेश दे जाता है।
लक्ष्मप्रिया देवी ने यह साबित कर दिया है कि अगर कहानी में ईमानदारी है, तो उसे समझने के लिए दर्शकों को भाषा जानने की ज़रूरत नहीं होती—भावनाएं सब-टाइटल्स (Subtitles) की मोहताज नहीं होतीं। यह बाफ्टा अवार्ड इस बात की गारंटी है कि भविष्य में भारतीय सिनेमा का अर्थ केवल ‘बॉलीवुड’ या ‘टॉलीवुड’ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के हर दूर-दराज़ गाँव की लोककथाएं अब ऑस्कर और बाफ्टा के रेड कार्पेट का सफर तय करने का हौसला रखेंगी।
