लोकतंत्र में देश का शासन एक सुचारू और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में ‘राष्ट्रपति’ (President of India) राष्ट्र का प्रमुख और प्रथम नागरिक होता है। लेकिन, मानव जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। क्या होगा यदि पद पर रहते हुए अचानक राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाए? या वे गंभीर रूप से बीमार पड़ जाएं और अपना काम न कर सकें?
संविधान निर्माताओं ने इन अनिश्चितताओं का पूर्वानुमान लगा लिया था। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर एक पल के लिए भी ‘वैक्यूम’ (शून्यता) नहीं आ सकता। इसी शून्यता को भरने के लिए हमारे संविधान में एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था की गई है, जिसे हम भारतीय संविधान का अनुच्छेद 65 के नाम से जानते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 65 क्या है? (What is Article 65?)
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 65 मुख्य रूप से उन परिस्थितियों को स्पष्ट करता है जब भारत के उपराष्ट्रपति (Vice-President) को राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना होता है या उनके कार्यों का निर्वहन करना होता है।
संविधान के मूल पाठ के अनुसार, इस अनुच्छेद को तीन प्रमुख उपखंडों (Clauses) में बांटा गया है। आइए इन्हें सरल हिंदी में समझते हैं:
1. पद में आकस्मिक रिक्ति (Casual Vacancy)
अनुच्छेद 65(1) कहता है कि यदि राष्ट्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र (इस्तीफा), या पद से हटाए जाने (महाभियोग) के कारण राष्ट्रपति का पद खाली हो जाता है, तो उपराष्ट्रपति तब तक ‘राष्ट्रपति के रूप में कार्य’ (Act as President) करेगा, जब तक कि नए राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो जाता और वह अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता। (ध्यान दें: संविधान के अनुच्छेद 62 के अनुसार यह चुनाव पद खाली होने के 6 महीने के भीतर हो जाना चाहिए।)
2. अनुपस्थिति या बीमारी (Absence or Illness)
अनुच्छेद 65(2) के अनुसार, जब राष्ट्रपति बीमारी, विदेश यात्रा, या किसी अन्य कारण से अपने कार्यों को करने में असमर्थ होते हैं, तो उपराष्ट्रपति उनके ‘कार्यों का निर्वहन’ (Discharge the functions) करेगा। यह व्यवस्था तब तक लागू रहती है जब तक राष्ट्रपति ठीक होकर या वापस लौटकर अपना पदभार दोबारा नहीं संभाल लेते।
3. शक्तियां, वेतन और विशेषाधिकार (Powers, Immunities, and Salary)
अनुच्छेद 65(3) यह स्पष्ट करता है कि जिस अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा है या उनके कार्यों का निर्वहन कर रहा है, उस दौरान उसे:
- राष्ट्रपति की सभी शक्तियां और उन्मुक्तियां (Immunities) प्राप्त होंगी।
- राष्ट्रपति को मिलने वाला वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार प्राप्त होंगे (जो संसद द्वारा कानून बनाकर तय किए गए हैं)।
“कार्य करना” बनाम “कार्यों का निर्वहन करना”
संविधान की भाषा बहुत तकनीकी और सटीक होती है। एक विशेषज्ञ (Expertise) के नजरिए से देखें तो अनुच्छेद 65(1) और 65(2) के बीच एक बहुत बारीक लेकिन महत्वपूर्ण कानूनी अंतर है:
- राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना (Acting as President – Clause 1): यह तब होता है जब राष्ट्रपति का पद स्थायी रूप से खाली हो गया हो (मृत्यु, इस्तीफा)। इस स्थिति में उपराष्ट्रपति पूरी तरह से कार्यवाहक राष्ट्रपति बन जाता है। इस दौरान वह राज्यसभा के सभापति (Chairman of Rajya Sabha) के रूप में कार्य नहीं करता है और न ही उस पद का वेतन लेता है (अनुच्छेद 64)।
- कार्यों का निर्वहन करना (Discharging functions – Clause 2): यह तब होता है जब पद खाली नहीं हुआ है, बल्कि राष्ट्रपति केवल अस्थायी रूप से अनुपलब्ध हैं (बीमारी या छुट्टी)। यहाँ उपराष्ट्रपति ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ नहीं बनता, बल्कि केवल उनके हिस्से का काम करता है।

भारतीय इतिहास में अनुच्छेद 65 के वास्तविक उदाहरण (Historical Precedents)
भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब भारतीय संविधान का अनुच्छेद 65 को असल जिंदगी में लागू करना पड़ा। ये घटनाएं हमारे लोकतंत्र की मजबूती (Trustworthiness) को दर्शाती हैं।
1. डॉ. जाकिर हुसैन का निधन (1969)
मई 1969 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन का पद पर रहते हुए अचानक निधन हो गया। देश में पहली बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी। अनुच्छेद 65(1) के तहत तुरंत तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि (V.V. Giri) ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला।
एक रोचक ऐतिहासिक तथ्य: जब नए राष्ट्रपति के चुनाव की घोषणा हुई, तो वी.वी. गिरि ने खुद चुनाव लड़ने का फैसला किया। चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने उपराष्ट्रपति पद (और कार्यवाहक राष्ट्रपति के पद) से इस्तीफा दे दिया। अब देश के सामने एक नया संकट था: राष्ट्रपति भी नहीं हैं और उपराष्ट्रपति भी नहीं हैं! तब संसद ने ‘राष्ट्रपति (कार्यों का निर्वहन) अधिनियम, 1969’ पारित किया, जिसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) एम. हिदायतुल्लाह ने 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया।
2. फखरुद्दीन अली अहमद का निधन (1977)
फरवरी 1977 में एक बार फिर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का पद पर रहते हुए निधन हो गया। इस बार उपराष्ट्रपति बी.डी. जत्ती (B.D. Jatti) ने अनुच्छेद 65 के तहत कार्यवाहक राष्ट्रपति का पद संभाला और नीलम संजीव रेड्डी के नए राष्ट्रपति चुने जाने तक इस जिम्मेदारी को निभाया।
भारत बनाम अमेरिका: उपराष्ट्रपति की शक्तियों में बड़ा अंतर
जब हम संवैधानिक कानूनों (Constitutional Law) का अध्ययन करते हैं, तो तुलनात्मक विश्लेषण बहुत जरूरी है। भारत और अमेरिका दोनों में लोकतांत्रिक गणराज्य है, लेकिन ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ के मामले में बड़ा अंतर है:
| तुलना का आधार | भारत (Indian Constitution – Article 65) | संयुक्त राज्य अमेरिका (US Constitution) |
| कार्यकाल की अवधि | भारत में उपराष्ट्रपति केवल अधिकतम 6 महीने तक कार्यवाहक राष्ट्रपति रह सकता है (जब तक नए चुनाव न हों)। | अमेरिका में यदि राष्ट्रपति का पद खाली होता है, तो उपराष्ट्रपति बचे हुए पूरे कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति बन जाता है। |
| नया चुनाव | भारत में 6 महीने के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव अनिवार्य है। | अमेरिका में अगला चुनाव अपने तय समय (4 साल पूरे होने पर) ही होता है। |
| उदाहरण | वी.वी. गिरि केवल कुछ महीनों के लिए कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। | 1963 में जॉन एफ कैनेडी की हत्या के बाद लिंडन बी. जॉनसन बचे हुए कार्यकाल के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए थे। |
यह दर्शाता है कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने यह सुनिश्चित किया कि देश का स्थायी मुखिया ‘सीधे या परोक्ष रूप से चुना हुआ’ व्यक्ति ही हो, न कि कोई ऐसा व्यक्ति जो केवल उत्तराधिकार के कारण लंबे समय तक पद पर बना रहे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 65 हमारे लोकतंत्र के ‘सेफ्टी वाल्व’ (Safety Valve) की तरह काम करता है। यह सुनिश्चित करता है कि चाहे कैसी भी राष्ट्रीय आपदा, व्यक्तिगत त्रासदी या स्वास्थ्य संकट आ जाए, भारतीय गणराज्य का शीर्ष पद कभी भी खाली नहीं रहेगा।
उपराष्ट्रपति की भूमिका भारत में बहुत ही रणनीतिक है। सामान्य दिनों में वे राज्यसभा का सुचारू संचालन करते हैं, लेकिन संकट के समय वे देश के सर्वोच्च कमांडर और प्रथम नागरिक की भूमिका निभाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर और संविधान सभा की यह दूरदर्शिता ही है जो आज भी 140 करोड़ भारतीयों के देश को बिना किसी संवैधानिक संकट के चला रही है।

भावेश Tez Khabri के सह-संस्थापक और प्रबंध संपादक हैं। अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के बाद, अब वे पत्रकारिता के माध्यम से समाज में पारदर्शिता लाने का प्रयास कर रहे हैं। भावेश जी मुख्य रूप से राजनीति, क्राइम और शिक्षा से जुड़ी खबरों का नेतृत्व करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि हर खबर पूरी तरह से सत्यापित (Verified) हो।
