अंकिता भंडारी केस

देवभूमि में आक्रोश की ज्वाला

उत्तराखंड, जिसे हम ‘देवभूमि’ के नाम से जानते हैं, जो अपनी शांति, आध्यात्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है, आज एक अलग ही वजह से चर्चा में है। यहाँ की वादियों में आज मंत्रोच्चार या पर्यटकों का शोर नहीं, बल्कि न्याय की मांग करते हजारों कंठों का आक्रोश गूंज रहा है। आज, ८ फरवरी २०२६ को देहरादून की सड़कों पर जो जनसैलाब उमड़ा है, वह महज एक भीड़ नहीं है; वह एक सिस्टम के खिलाफ खड़ा हुआ समाज है जो अपनी बेटी के लिए इंसाफ मांग रहा है।

हम बात कर रहे हैं उस दिल दहला देने वाले Ankita Bhandari Case की, जिसने न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। एक 19 साल की रिसेप्शनिस्ट, जिसके सपनों को एक रिसॉर्ट की काली दीवारों के पीछे कुचल दिया गया। आज सालों बीत जाने के बाद भी, उसके माता-पिता और उत्तराखंड की जनता संतुष्ट नहीं है।

आज देहरादून के ऐतिहासिक गांधी पार्क और परेड ग्राउंड में एक विशाल Dehradun Mahapanchayat का आयोजन किया गया है। इस महापंचायत का मुख्य उद्देश्य सरकार और प्रशासन को कुंभकर्णी नींद से जगाना है। सबसे बड़ा सवाल जो आज हर जुबान पर है, वह यह है कि आखिर सरकार CBI Investigation से क्यों डर रही है? वह कौन सा ‘वीआईपी’ (VIP Guest) है जिसे बचाने के लिए सबूतों पर बुलडोजर चला दिया गया?

भाग 1: महापंचायत का आँखों देखा हाल – जब सड़क पर उतरा उत्तराखंड (The Scene at Dehradun)

आज सुबह से ही देहरादून की फिजाओं में तनाव और आक्रोश महसूस किया जा सकता था। राज्य के कोने-कोने से – गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक – लोग बसों, ट्रकों और निजी वाहनों में भरकर राजधानी पहुंचे हैं।

जनसैलाब और नारे:

परेड ग्राउंड खचाखच भरा हुआ है। हाथों में तख्तियां लिए महिलाएं, युवा छात्र और बुजुर्ग एक ही सुर में नारा लगा रहे हैं – “अंकिता हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं” और “CBI Investigation लेकर रहेंगे”। यह भीड़ किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा बुलाई गई भीड़ नहीं है। इसमें कोई लालच नहीं है, बस एक दर्द है।

इस Dehradun Mahapanchayat की सबसे खास बात इसमें महिलाओं की भागीदारी है। पहाड़ की महिलाएं, जो अपनी सहनशीलता के लिए जानी जाती हैं, आज ‘रणचंडी’ का रूप धारण कर चुकी हैं। उनका कहना है कि अगर आज अंकिता को न्याय नहीं मिला, तो कल उनकी बेटियों के साथ भी यही हो सकता है।

मंच पर अंकिता के माता-पिता:

जब अंकिता के पिता वीरेंद्र भंडारी और मां मंच पर आए, तो पूरा मैदान भावुक हो गया। उनकी आँखों के आंसू सूख चुके हैं, लेकिन उनकी आवाज में एक दृढ़ संकल्प है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “हमें पुलिस की SIT जांच पर भरोसा नहीं है। जब तक Ankita Bhandari Case की जांच सीबीआई को नहीं सौंपी जाती, हम पीछे नहीं हटने वाले।”

भाग 2: अंकिता भंडारी केस – एक फ्लैशबैक (Case Background)

जिन पाठकों को इस केस की पूरी पृष्ठभूमि याद नहीं है, उनके लिए एक संक्षिप्त पुनरावृत्ति आवश्यक है। यह जानना जरूरी है कि आखिर यह गुस्सा क्यों उबल रहा है।

सितंबर 2022 में, पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली 19 वर्षीय अंकिता भंडारी ऋषिकेश के पास वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करने गई थी। कुछ ही दिनों बाद वह लापता हो गई। जब पुलिस ने जांच शुरू की, तो रिसॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य (जो एक पूर्व राज्य मंत्री का बेटा था) और उसके दो साथियों को गिरफ्तार किया गया।

आरोपियों ने कबूला कि उन्होंने अंकिता को चिल्ला नहर में धक्का दे दिया था। वजह? अंकिता ने रिसॉर्ट में आने वाले एक VIP Guest को ‘स्पेशल सर्विस’ (वैश्यावृत्ति) देने से मना कर दिया था। अंकिता ने अपने स्वाभिमान से समझौता करने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अंकिता का शव मिलने से पहले ही, प्रशासन ने रातों-रात उस रिसॉर्ट पर बुलडोजर चलवा दिया। तर्क दिया गया कि यह अवैध निर्माण था। लेकिन जनता का सवाल था – “क्राइम सीन पर बुलडोजर क्यों? क्या सबूत मिटाने की कोशिश की गई?” यहीं से Ankita Bhandari Case में शक की सुई और गहरी हो गई।

अंकिता भंडारी केस

भाग 3: SIT vs CBI – जांच पर क्यों है अविश्वास? (The Investigation Debate)

सरकार ने दावा किया कि उसने SIT (विशेष जांच दल) का गठन किया और त्वरित कार्रवाई की। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, आरोपियों को जेल भेजा गया। फिर भी, आज २०२६ में भी Dehradun Mahapanchayat में CBI Investigation की मांग क्यों हो रही है?

1. सबूतों का नष्ट होना:

SIT की सबसे बड़ी आलोचना इस बात को लेकर है कि उसने रिसॉर्ट के ध्वस्तीकरण को क्यों नहीं रोका? जिस कमरे में अंकिता रहती थी, उसे तोड़ दिया गया। फोरेंसिक सबूत, उंगलियों के निशान, या डायरी – सब कुछ मलबे में दब गया। जनता का मानना है कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि एक साजिश थी।

2. ‘वीआईपी’ का नाम:

चार्जशीट में सब कुछ है, लेकिन उस VIP Guest का नाम नहीं है जिसके लिए अंकिता पर दबाव बनाया जा रहा था। SIT का कहना है कि ऐसा कोई वीआईपी वहां आया ही नहीं था। लेकिन अंकिता के व्हाट्सएप चैट्स में साफ तौर पर “वो वीआईपी आ रहे हैं” का जिक्र था। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर वह कौन सा प्रभावशाली व्यक्ति है जिसे पूरा सिस्टम बचा रहा है?

3. पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल:

अंकिता के परिवार ने शुरुआत से ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि अंकिता के साथ दुष्कर्म या मारपीट की पुष्टि को छिपाया गया हो सकता है।

यही कारण है कि अंकिता के माता-पिता और उत्तराखंड की जनता को लगता है कि राज्य पुलिस राजनीतिक दबाव में काम कर रही है और केवल एक स्वतंत्र एजेंसी यानी CBI Investigation ही सच को सामने ला सकती है।

भाग 4: वह रहस्यमयी ‘वीआईपी’ कौन है? (Who is the VIP Guest?)

Ankita Bhandari Case का सबसे बड़ा रहस्य वह ‘वीआईपी’ है। आज की महापंचायत में वक्ताओं ने बार-बार इस मुद्दे को उठाया।

अगर वह वीआईपी कोई सामान्य व्यक्ति होता, तो अब तक उसका नाम सामने आ चुका होता। लेकिन जिस तरह से इस नाम को छिपाया गया है, उससे यह आशंका प्रबल होती है कि वह कोई बड़ा राजनेता, नौकरशाह या प्रभावशाली उद्योगपति हो सकता है।

जनता का तर्क सीधा है:

  • अंकिता ने अपने दोस्त को मैसेज किया था कि उस पर VIP Guest को ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ देने का दबाव है।
  • रिसॉर्ट मालिक पुलकित आर्य का राजनीतिक रसूख था।
  • जिस रात हत्या हुई, क्या वह वीआईपी वहां मौजूद था या आने वाला था?

जब तक इस वीआईपी का चेहरा बेनकाब नहीं होता, तब तक अंकिता को पूरा न्याय नहीं मिल सकता। आज देहरादून की सड़कों पर गूंज रहे नारों में एक ही सवाल है – “वीआईपी का नाम बताओ!”

भाग 5: सरकार का रुख और राजनीतिक समीकरण (Government’s Stance)

उत्तराखंड सरकार के लिए यह Dehradun Mahapanchayat एक बड़ी चुनौती बन गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कई बार आश्वासन दिया है कि उनकी सरकार पीड़ित परिवार के साथ है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।

अंकिता भंडारी केस

सरकार के तर्क:

  1. त्वरित गिरफ्तारी: पुलिस ने घटना के 24 घंटे के भीतर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था।
  2. सख्त धाराएं: आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट और अन्य सख्त धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है।
  3. फास्ट ट्रैक कोर्ट: मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रही है।
  4. CBI की जरूरत नहीं: सरकार का कहना है कि SIT ने पेशेवर तरीके से जांच की है और चार्जशीट में पर्याप्त सबूत हैं जो आरोपियों को फांसी दिलाने के लिए काफी हैं। CBI जांच से केवल समय बर्बाद होगा।

लेकिन जनता इन तर्कों से संतुष्ट नहीं है। उनका मानना है कि सरकार ‘अपनों’ को बचा रही है। यह मुद्दा अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक भी बन चुका है। विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की साजिश करार दे रहा है।

भाग 6: महापंचायत की प्रमुख मांगें (Key Demands)

आज गांधी पार्क में आयोजित इस ऐतिहासिक Dehradun Mahapanchayat में एक मांग पत्र (Memorandum) तैयार किया गया है, जिसे राज्यपाल को सौंपा जाएगा। इसकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

  1. तत्काल CBI जांच: केस को उत्तराखंड पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपा जाए ताकि वीआईपी का पता चल सके।
  2. वीआईपी का नाम उजागर हो: सरकार श्वेत पत्र जारी करे कि उस दिन रिसॉर्ट में कौन आने वाला था।
  3. फास्ट ट्रैक कोर्ट की गति बढ़े: २०२६ आ गया है, लेकिन अभी तक अंतिम फैसला नहीं आया। तारीख पर तारीख के सिलसिले को खत्म कर दोषियों को फांसी दी जाए।
  4. माता-पिता की सुरक्षा: अंकिता के परिवार को धमकियां मिल रही हैं, उन्हें स्थायी सुरक्षा मुहैया कराई जाए।
  5. रिसॉर्ट ध्वस्तीकरण की जांच: जिस अधिकारी ने सबूत मिटाने के लिए बुलडोजर चलवाया, उस पर भी आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।

भाग 7: सोशल मीडिया और युवाओं की भूमिका (Role of Youth)

Ankita Bhandari Case को जिंदा रखने में उत्तराखंड के युवाओं और सोशल मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है। जब मेनस्ट्रीम मीडिया इस मुद्दे से हट गया, तब भी यूट्यूबर्स, ब्लॉगर्स और सोशल एक्टिविस्ट ने #JusticeForAnkita हैशटैग को ट्रेंड में बनाए रखा।

आज की महापंचायत में बड़ी संख्या में यूथ शामिल है। वे कह रहे हैं कि यह लड़ाई सिर्फ अंकिता की नहीं, बल्कि ‘देवभूमि’ की अस्मिता की है। उत्तराखंड के युवा अब सवाल पूछना सीख गए हैं। वे जानते हैं कि पर्यटन के नाम पर पहाड़ों में जो ‘अय्याशी के अड्डे’ (Illicit Resorts) खुल रहे हैं, वे उनकी संस्कृति और सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

भाग 8: बुलडोजर संस्कृति पर सवाल (Questioning the Bulldozer)

उत्तर प्रदेश में अपराधियों के घरों पर बुलडोजर चलना एक ‘न्याय’ का प्रतीक माना जाता है। लेकिन Ankita Bhandari Case में बुलडोजर का इस्तेमाल ‘न्याय’ के लिए हुआ या ‘अन्याय’ को छिपाने के लिए? यह एक बड़ा विडंबनापूर्ण प्रश्न है।

कानून के जानकारों का कहना है कि किसी भी अपराध स्थल (Crime Scene) को सील करना चाहिए, न कि उसे तोड़ना चाहिए। रिसॉर्ट के उस कमरे को तोड़ना जहां अंकिता रहती थी, सीधे तौर पर ‘Destruction of Evidence’ (सबूत मिटाना) की श्रेणी में आता है। आज की महापंचायत में वकीलों के एक समूह ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और कहा कि बुलडोजर चलाने का आदेश देने वाले अधिकारी को भी सह-आरोपी बनाया जाना चाहिए।

भाग 9: एक पिता का दर्द और संघर्ष (Father’s Struggle)

वीरेंद्र भंडारी (अंकिता के पिता) पिछले कई सालों से कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। एक साधारण पहाड़ी व्यक्ति, जिसने अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा था, आज वह सिस्टम से लड़ रहा है।

उनके शब्द दिल को चीर देते हैं: “मेरी बेटी ने अपनी इज्जत बचाने के लिए जान दे दी। उसने गलत काम करने से मना कर दिया। मुझे अपनी बेटी पर गर्व है, लेकिन मुझे इस सिस्टम पर शर्म आती है जो उसके हत्यारों और उस VIP Guest को बचा रहा है। जब तक मेरी सांस है, मैं लड़ूंगा।”

आज की Dehradun Mahapanchayat उसी पिता के संघर्ष को समर्थन देने के लिए बुलाई गई है। यह भीड़ उन्हें यह बताने आई है कि वे अकेले नहीं हैं।

भाग 10: क्या CBI जांच से सब साफ हो जाएगा?

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या CBI Investigation हर मर्ज की दवा है?

इतिहास गवाह है कि कई मामलों में सीबीआई भी निर्णायक सबूत नहीं जुटा पाई (जैसे आरुषि तलवार केस)। समय बहुत बीत चुका है। सबूत (रिसॉर्ट) नष्ट हो चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य शायद डिलीट किए जा चुके हैं। ऐसे में सीबीआई के लिए भी केस को नए सिरे से खड़ा करना आसान नहीं होगा।

लेकिन, CBI Investigation का महत्व ‘भरोसे’ का है। जनता को राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं रहा। सीबीआई एक केंद्रीय एजेंसी है, इसलिए माना जाता है कि उस पर स्थानीय नेताओं का दबाव नहीं होगा। अगर सीबीआई जांच होती है, तो कम से कम यह तसल्ली रहेगी कि न्याय की हर संभव कोशिश की गई।

भाग 11: महिला सुरक्षा और पहाड़ का भविष्य

Ankita Bhandari Case ने उत्तराखंड में महिला सुरक्षा की पोल खोलकर रख दी है। पहाड़ की लड़कियां अक्सर रोजगार की तलाश में शहरों या रिसॉर्ट्स में काम करने जाती हैं। लेकिन अगर कार्यस्थल पर उनका शोषण होगा, तो वे कहां जाएंगी?

आज की महापंचायत में एक मांग यह भी उठी है कि राज्य में सभी रिसॉर्ट्स और होटलों के लिए सख्त नियम बनाए जाएं। वहां काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा ऑडिट हो। पहाड़ को ‘पर्यटन’ चाहिए, लेकिन अपनी बेटियों की ‘बलि’ देकर नहीं।

भाग 12: आगे की राह (The Way Forward)

आज शाम तक यह Dehradun Mahapanchayat संपन्न हो जाएगी। लोग अपने घरों को लौट जाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार उनकी सुनेगी?

अगर सरकार ने CBI Investigation की मांग नहीं मानी, तो आंदोलन और उग्र हो सकता है। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर एक महीने के भीतर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वे ‘सचिवालय घेराव’ और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करेंगे।

न्यायपालिका की भूमिका भी यहाँ महत्वपूर्ण है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर इस मामले की निगरानी करनी चाहिए। न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है (Justice Delayed is Justice Denied)। अंकिता के मामले में यह कहावत पूरी तरह सच साबित हो रही है।

न्याय की मशाल जलती रहनी चाहिए

अंत में, Ankita Bhandari Case सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। यह सत्ता, रसूख और एक आम आदमी के बीच की लड़ाई है। आज देहरादून की सड़कों पर जो जनसैलाब है, वह भारत के लोकतंत्र की ताकत है।

एक 19 साल की लड़की, जिसने “ना” कहने की हिम्मत दिखाई, वह आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन उसकी आवाज आज लाखों लोगों के गले से निकल रही है। हम उम्मीद करते हैं कि यह Dehradun Mahapanchayat सरकार के कानों तक पहुंचेगी। उस VIP Guest का चेहरा बेनकाब होगा और अंकिता की आत्मा को शांति मिलेगी।

सच्चाई को परेशान किया जा सकता है, लेकिन पराजित नहीं। अंकिता हम तुम्हें भूले नहीं हैं, और न ही भूलेंगे।

अतिरिक्त विश्लेषण: अन्य हाई-प्रोफाइल केसों से तुलना

इस केस की तुलना अक्सर निर्भया कांड या हाथरस कांड से की जाती है। हर बार पैटर्न एक जैसा होता है – पहले अपराध, फिर लीपापोती, फिर जनाक्रोश और अंत में लंबी कानूनी लड़ाई।

  • हाथरस: वहां भी रातों-रात अंतिम संस्कार कर दिया गया था (सबूत मिटाने जैसा)।
  • अंकिता केस: यहां रातों-रात बुलडोजर चला दिया गया।

यह दर्शाता है कि सिस्टम कैसे काम करता है। लेकिन जनता की याददाश्त अब कमजोर नहीं है। २०२६ में भी अगर लोग सड़कों पर हैं, तो इसका मतलब है कि घाव अभी भरा नहीं है।

सरकार के लिए सुझाव: सिर्फ आश्वासन से काम नहीं चलेगा। पारदर्शिता (Transparency) जरूरी है। SIT ने अब तक क्या किया, वीआईपी एंगल पर जांच क्यों रुकी, इसका सार्वजनिक जवाब देना होगा। अगर छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो CBI Investigation की सिफारिश करने में हर्ज क्या है?

यह लड़ाई लंबी है, लेकिन सत्य की जीत सुनिश्चित है।

By Isha Patel

Isha Patel Tez Khabri के साथ जुड़ी एक समाचार रिपोर्टर हैं। वे भारत और राज्यों से जुड़ी ताज़ा, ब्रेकिंग और जनहित से संबंधित खबरों को कवर करती हैं। Isha Patel शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर सत्यापित व तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करती हैं।

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