मार्च 2026 की शुरुआत दुनिया के लिए एक खौफनाक बुरे सपने जैसी रही है। मध्य पूर्व (Middle East) एक बार फिर से बारूद के ढेर पर बैठा है, लेकिन इस बार यह कोई आम सीमा विवाद या छोटी-मोटी झड़प नहीं है। अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ एक सर्वव्यापी युद्ध (All-out War) छेड़ दिया है। इस महायुद्ध ने न सिर्फ खाड़ी देशों की शांति को भंग कर दिया है, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति (Geopolitics) को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से वापसी बेहद मुश्किल नजर आ रही है।
ईरान के सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अयातुल्ला अली खमेनेई की मौत, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पर रोक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की आसमान छूती कीमतें, और अमेरिका के भीतर राजनीतिक घमासान—यह सब महज एक हफ्ते के भीतर हुआ है।
1. युद्ध का बिगुल: ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और ‘लायंस रोर’ (The Onset of War)
इस भयानक युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी 2026 की सुबह हुई, जब अमेरिका और इजरायली सेनाओं ने ईरान के रणनीतिक और सैन्य ठिकानों पर एक अभूतपूर्व और बड़े पैमाने पर हमला किया। इजरायल ने इस हमले को ‘ऑपरेशन लायंस रोर’ (Operation Lion’s Roar) का नाम दिया है, जबकि अमेरिकी सैन्य अभियान को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) कहा जा रहा है।
हमले के मुख्य कारण और लक्ष्य: अमेरिकी रक्षा मंत्री (Secretary of Defense) पीट हेगसेथ (Pete Hegseth) और विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) के बयानों के अनुसार, यह एक ‘प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक’ (Pre-emptive strike) थी। अमेरिका और इजरायल को खुफिया जानकारी मिली थी कि ईरान इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर बड़े हमले की योजना बना रहा है। इसे रोकने और ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद करने के लिए यह भीषण कदम उठाया गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ (Truth Social) पर इस हमले की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेनाएं ईरान की नौसेना और वायुसेना को “पूरी तरह से तबाह” कर रही हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, इस युद्ध के चार मुख्य लक्ष्य हैं:
- ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को नष्ट करना।
- ईरानी नौसेना का पूर्ण खात्मा।
- यह सुनिश्चित करना कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके।
- मध्य पूर्व में आतंकवादी संगठनों (जैसे हिजबुल्लाह और हूती) को ईरान से मिलने वाली फंडिंग और हथियारों की सप्लाई को काटना।
ईरान को सबसे बड़ा झटका: अयातुल्ला खमेनेई की मौत इस युद्ध का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब अमेरिकी-इजरायली हवाई हमलों में तेहरान स्थित ईरान के 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनेई के मारे जाने की पुष्टि हुई। खमेनेई के साथ-साथ ईरान की सेना के चीफ ऑफ स्टाफ सैयद अब्दोलरहीम मौसवी, रक्षा मंत्री अजीज नासिरजादेह और ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के कई शीर्ष कमांडर भी मारे गए। खमेनेई की मौत ने ईरान के राजनीतिक और सैन्य ढांचे को झकझोर कर रख दिया है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इस हमले का कड़ा बदला लेने की कसम खाई है।

2. ईरान का पलटवार और बहु-मोर्चे वाला युद्ध (Iran’s Retaliation and The Multi-Front War)
सर्वोच्च नेता की मौत के बाद, ईरान शांत नहीं बैठा। ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4’ (Operation True Promise 4) के तहत ईरान के IRGC ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा पलटवार शुरू कर दिया है।
- इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बारिश: ईरान ने तेल अवीव (Tel Aviv) और उत्तरी इजरायल के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए हाइपरसोनिक और बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं। हालांकि इजरायल के ‘आयरन डोम’ और ‘एरो’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम ने कई मिसाइलों को मार गिराया है, लेकिन नुकसान का स्तर लगातार बढ़ रहा है।
- खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमला: ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर (अल-उदेद बेस), बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को अपना निशाना बनाया है। कतर के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि अल-उदेद सैन्य बेस पर एक बैलिस्टिक मिसाइल गिरी है। इसके अलावा, दुबई में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास (US Consulate) और रियाद में अमेरिकी दूतावास के पास भी ड्रोन हमले हुए हैं।
- लेबनान का मोर्चा (Hezbollah’s Involvement): इजरायल सिर्फ ईरान से नहीं लड़ रहा है। लेबनान में ईरान-समर्थित हिजबुल्लाह (Hezbollah) ने भी उत्तरी इजरायल पर रॉकेट दागने शुरू कर दिए हैं। इसके जवाब में इजरायल ने बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में हिजबुल्लाह के कमांड सेंटरों पर भारी बमबारी की है, जिससे लेबनान में भी सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है।
- अज़रबैजान पर हमला: इस युद्ध ने एक नया मोर्चा तब खोल दिया जब ईरान के ड्रोन ने ईरान-अज़रबैजान सीमा के पास नखचिवान (Nakhchivan) में एक एयरपोर्ट को निशाना बनाया। अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने इसे “आतंक और आक्रामकता का कृत्य” बताया है और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है।
इस संघर्ष के कारण पूरे मध्य पूर्व में 17,500 से अधिक अमेरिकी नागरिकों को रातों-रात सुरक्षित निकाला गया है। कई दूतावास बंद कर दिए गए हैं और विमानन कंपनियों (जैसे एयर इंडिया, एमिरेट्स) ने अपनी कई उड़ानें रद्द या डाइवर्ट कर दी हैं।
3. होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक तेल संकट और आर्थिक सुनामी (The Strait of Hormuz Crisis)
इस युद्ध का सबसे भयावह आर्थिक प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में देखने को मिल रहा है। यह समुद्री रास्ता दुनिया के तेल व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण ‘चोकपॉइंट’ है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल (Crude Oil) और 15% लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) इसी रास्ते से होकर गुजरती है।
ईरान की ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (IRGC) ने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य अमेरिका, इजरायल और यूरोपीय देशों के व्यापारिक जहाजों के लिए बंद कर दिया गया है। जो भी जहाज यहां से गुजरने की कोशिश करेगा, उसे आग के हवाले कर दिया जाएगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:
- तेल की कीमतों में आग: इस तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 15% से अधिक का उछाल आया है। फ्रेट रेट्स (जहाजों का किराया) एक ही हफ्ते में दोगुना हो गया है।
- जहाजों का जाम: वर्तमान में इराक, सऊदी अरब और कतर के तटों के पास 200 से अधिक तेल और कार्गो जहाज फंसे हुए हैं। वे आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
- सोने की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल: बाजार में डर के माहौल के कारण निवेशक सोने की तरफ भाग रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत 5,100 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गई है।
- राष्ट्रपति ट्रंप का ऐलान: ऊर्जा संकट को टालने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया है कि अमेरिकी नौसेना (US Navy) जल्द ही मध्य पूर्व से तेल ले जाने वाले व्यापारिक जहाजों को ‘नेवल एस्कॉर्ट’ (नौसैनिक सुरक्षा) और बीमा प्रदान करेगी। अमेरिका का कहना है कि वह ऊर्जा के वैश्विक प्रवाह को रुकने नहीं देगा।
4. समुद्र में महासंग्राम: श्रीलंकाई तट पर ईरान का युद्धपोत तबाह (The Naval Warfare and Sinking of IRIS Dena)
अमेरिका इस युद्ध में केवल हवा से ही नहीं, बल्कि समुद्र के भीतर से भी वार कर रहा है। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत अमेरिकी सेना ने अब तक 1,700 से अधिक ठिकानों और 17 ईरानी समुद्री बेड़ों (जिसमें पनडुब्बियां भी शामिल हैं) को नष्ट किया है।
इस युद्ध की सबसे चौंकाने वाली घटना श्रीलंका के तट के पास घटी। एक अमेरिकी पनडुब्बी ने बिना किसी चेतावनी के ईरान के युद्धपोत ‘IRIS Dena’ पर टॉरपीडो दाग दिया। यह जहाज भारतीय नौसेना के ‘मिलन’ (MILAN) अभ्यास और विशाखापत्तनम में इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में भाग लेने के बाद वापस ईरान लौट रहा था।
इस भीषण हमले में 87 ईरानी नौसैनिक मारे गए। हमले के तुरंत बाद भारतीय नौसेना (Indian Navy) हरकत में आई। भारतीय नौसेना ने लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान P8I और अपने जहाजों को श्रीलंका के नेतृत्व में चल रहे सर्च एंड रेस्क्यू (Search and Rescue) ऑपरेशन में मदद के लिए भेजा। इस घटना ने युद्ध के दायरे को मध्य पूर्व से बाहर निकालकर हिंद महासागर तक फैला दिया है। ईरान ने इस हमले को लेकर अमेरिका पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन बताया है।

5. भारत पर असर: कूटनीतिक संतुलन, तेल की राजनीति और ‘रशियन वेवर’ (The Indian Perspective and Political Row)
भारत के लिए यह युद्ध एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक चुनौती लेकर आया है। एक तरफ भारत के अमेरिका और इजरायल के साथ गहरे रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ ईरान भी भारत का एक महत्वपूर्ण भागीदार (चाबहार बंदरगाह के जरिए) रहा है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में लगभग 1 करोड़ भारतीय नागरिक रहते और काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा इस समय भारत सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
मोदी सरकार की प्रतिक्रिया: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कि “कोई भी मुद्दा सैन्य संघर्ष के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता।” भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर सभी पक्षों से संयम बरतने, बातचीत के रास्ते पर लौटने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है। दूतावासों ने ‘रेस्क्यू ऑपरेशंस’ के तहत अपने नागरिकों को निकालना शुरू कर दिया है।
अमेरिका का 30-दिन का ‘रशियन ऑयल वेवर’ (Russian Oil Waiver): इस संकट के बीच, वैश्विक तेल आपूर्ति को स्थिर रखने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी विभाग (US Treasury Department) ने भारत को एक बड़ी छूट (Waiver) दी है। अमेरिका ने भारत को अगले 30 दिनों के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदने की अनुमति दी है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट (Scott Bessent) ने कहा कि “तेल को वैश्विक बाजार में बहते रहने देने के लिए” यह कदम उठाया गया है, हालांकि उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि भविष्य में भारत अमेरिका से अधिक ऊर्जा का आयात करेगा।
घरेलू राजनीति में उबाल: कांग्रेस का हमला: इस ‘वेवर’ ने भारतीय घरेलू राजनीति में भूचाल ला दिया है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा: “ट्रंप का नया खेल, दिल्ली दोस्त को कहा, पुतिन से ले सकते हो तेल, कब तक चलेगा ये अमेरिकी ब्लैकमेल?” वहीं वरिष्ठ कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने सरकार की संप्रभुता पर सवाल उठाते हुए कहा, “30-दिन का वेवर जारी करना नव-साम्राज्यवादी अहंकार को दर्शाता है। क्या हम कोई ‘बनाना रिपब्लिक’ (Banana Republic) हैं जिन्हें अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका की अनुमति की आवश्यकता है? एक अमूमन बातूनी सरकार की यह चुप्पी चौंकाने वाली है।”
यह विवाद दर्शाता है कि भू-राजनीतिक उथल-पुथल का असर देश की आंतरिक राजनीति पर कितनी जल्दी और गहराई से पड़ता है।
6. वॉशिंगटन का राजनीतिक परिदृश्य: ट्रंप की ‘वॉर पावर्स’ और घरेलू विरोध (Washington’s Inner Turmoil)
युद्ध के मोर्चे पर जो हो रहा है, उसकी गूंज अमेरिकी संसद (Capitol Hill) में भी साफ सुनाई दे रही है। अमेरिका का एक बड़ा धड़ा राष्ट्रपति ट्रंप के इस एकतरफा फैसले का विरोध कर रहा है।
वॉर पावर्स रेजोल्यूशन (War Powers Resolution): डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने मिलकर सीनेट (Senate) और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (House of Representatives) में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति ट्रंप की सैन्य शक्तियों को सीमित करना था। उनका तर्क है कि अमेरिकी संविधान के तहत युद्ध की घोषणा करने का अधिकार केवल कांग्रेस (संसद) के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास। वे नहीं चाहते कि अमेरिका एक और ‘अंतहीन युद्ध’ (Endless War – जैसे इराक या अफगानिस्तान) में फंसे।
हालांकि, यह प्रस्ताव सीनेट में 53-47 के अंतर से और हाउस में 212-219 के अंतर से गिर गया। इसका मतलब है कि राष्ट्रपति ट्रंप को फिलहाल ईरान के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को जारी रखने की राजनीतिक हरी झंडी मिल गई है।
प्रतिनिधि ग्रेगरी मीक्स (Gregory Meeks) ने स्पष्ट कहा, “डोनाल्ड ट्रंप कोई राजा नहीं हैं। अगर वह मानते हैं कि ईरान के साथ युद्ध हमारे राष्ट्रीय हित में है, तो उन्हें कांग्रेस के सामने आकर यह साबित करना होगा।” इस बीच, ट्रंप के यूरोपीय सहयोगी भी बंटे हुए हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ (Friedrich Merz) ने इस ऑपरेशन का समर्थन किया है, लेकिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर (Keir Starmer) और स्पेन की सरकार की प्रतिक्रिया से ट्रंप नाखुश दिखे। ट्रंप ने स्पेन के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने तक की धमकी दे डाली है।
7. आगे क्या? (What Lies Ahead in this Chaos?)
यह युद्ध अब एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गया है जहां से किसी भी पक्ष का पीछे हटना उनकी राजनीतिक हार मानी जाएगी।
- ईरान के लिए करो या मरो: अयातुल्ला खमेनेई की मौत के बाद, ईरान का नेतृत्व एक बड़े अस्तित्व के संकट (Existential Crisis) से गुजर रहा है। उनके लिए अब सवाल सिर्फ सैन्य ताकत दिखाने का नहीं है, बल्कि देश के भीतर सत्ता और शासन को बनाए रखने का है।
- अमेरिका का नया लक्ष्य: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ कर दिया है कि “सबसे कड़े प्रहार अभी बाकी हैं।” अमेरिका की योजना न केवल ईरान की सैन्य शक्ति को खत्म करने की है, बल्कि वहां ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) की संभावनाओं पर भी दुनिया की नजर टिकी है। ईरान के निर्वासित शाही परिवार के सदस्य रज़ा पहलवी ने भी इस हमले का समर्थन करते हुए इसे ईरानी अवाम की आजादी का मौका बताया है।
- ग्लोबल इन्फ्लेशन (वैश्विक महंगाई): अगर होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है, तो पूरी दुनिया को एक भयंकर मंदी और महंगाई का सामना करना पड़ेगा। माल ढुलाई के वैकल्पिक रास्ते (जैसे तुर्की के रास्ते) बहुत महंगे हैं और रसद श्रृंखला (Supply Chain) बुरी तरह प्रभावित होगी।
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा यह युद्ध मात्र मध्य पूर्व का क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है। इसके तार श्रीलंका के तटों से लेकर भारतीय तेल बाजार और यूरोपीय राजधानियों तक फैले हुए हैं। हर गुजरते दिन के साथ मिसाइलों की गिनती, हताहतों का आंकड़ा और तेल की कीमतें बढ़ती जा रही हैं।
कूटनीति (Diplomacy) ने पूरी तरह से हथियारों के सामने घुटने टेक दिए हैं। भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह समय बहुत ही संभलकर चलने का है, जहां ऊर्जा सुरक्षा, नागरिकों की सलामती और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन एक ही समय में साधना बेहद जरूरी है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ईरान दबाव के सामने टूट जाएगा, या यह युद्ध पूरी दुनिया को एक तीसरे विश्व युद्ध की विनाशकारी आग में धकेल देगा।
