RSS 100 Years

शताब्दी वर्ष और पूर्व का उदय

वर्ष 2025-26 भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh – RSS) अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है। 1925 में विजयदशमी के दिन नागपुर के एक छोटे से मैदान में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा रोपा गया वह नन्हा पौधा आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।

जब हम संघ की बात करते हैं, तो अक्सर चर्चा नागपुर, पुणे, गुजरात या दिल्ली के आसपास सिमट जाती है। लेकिन, संघ के शताब्दी वर्ष में असली कहानी उन राज्यों की है जहाँ की जमीन संघ के लिए कभी भी ‘उर्वरक’ नहीं थी। हम बात कर रहे हैं बिहार (Bihar) और ओडिशा (Odisha) की।

ये वो राज्य हैं जहाँ दशकों तक समाजवाद, वामपंथ और क्षेत्रीय क्षत्रपों का दबदबा रहा। जहाँ ‘जय श्री राम’ के नारे से ज्यादा ‘जय समाजवाद’ या ‘लाल सलाम’ गूंजता था। लेकिन आज, 2026 में, जब हम मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि इन राज्यों की सामाजिक और राजनीतिक चेतना पूरी तरह बदल चुकी है।

भाग 1: बिहार – संघर्ष, समाजवाद और संघ (The Battleground of Ideologies)

बिहार संघ के लिए हमेशा से एक चुनौती रहा। यह समाजवाद की प्रयोगशाला थी। यहाँ जातिगत समीकरण इतने गहरे थे कि ‘हिन्दू एकता’ की बात करना पत्थर पर सिर पटकने जैसा था। लेकिन संघ ने यहाँ एक अलग रणनीति अपनाई – सेवा और शिक्षा

1. आपातकाल और जेपी आंदोलन: जब संघ ने अपना लोहा मनवाया

बिहार में संघ के विस्तार की असली कहानी 1974 के जेपी आंदोलन से शुरू होती है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) एक गांधीवादी समाजवादी थे, लेकिन उन्हें अपने आंदोलन को चलाने के लिए ‘मैनपावर’ और ‘अनुशासन’ की जरूरत थी। वह अनुशासन उन्हें संघ के स्वयंसेवकों में मिला।

  • नानाजी देशमुख और बिहार: हालांकि नानाजी देशमुख एक राष्ट्रीय चेहरा थे, लेकिन बिहार के आंदोलन में उनकी भूमिका ‘चाणक्य’ की थी। जब पटना के गांधी मैदान में पुलिस की लाठियां बरस रही थीं, तो संघ के कार्यकर्ताओं ने जेपी को घेरा बनाकर बचाया था।
  • अनसुनी कहानी: उस समय बिहार के कई जिलों में संघ के प्रचारक अंडरग्राउंड होकर काम कर रहे थे। वे दिन में सब्जी वाले या रिक्शा वाले बनकर संदेश पहुंचाते थे। सुशील कुमार मोदी (दिवंगत) और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता उसी दौर की उपज थे, लेकिन उनके पीछे कई ऐसे प्रचारक थे जो कभी मंच पर नहीं आए।

2. लक्ष्मणराव इनामदार (वकील साहब) का प्रभाव

यद्यपि लक्ष्मणराव इनामदार का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से गुजरात था (वे नरेंद्र मोदी के मेंटर थे), लेकिन उनकी कार्यशैली ने बिहार के प्रचारकों को बहुत प्रभावित किया। बिहार में संघ ने यह सीखा कि यहाँ ‘प्रवचन’ से काम नहीं चलेगा, यहाँ ‘आचरण’ दिखाना होगा।

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3. नक्सलवाद के गढ़ में ‘वनवासी कल्याण आश्रम’

बिहार (और अब झारखंड) के वनवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरीज और नक्सलवाद का प्रभाव था। यहाँ संघ ने ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के जरिए पैठ बनाई।

  • कहानी एक गुमनाम प्रचारक की: 1980 के दशक में, छोटानागपुर के जंगलों में एक प्रचारक (जिनका नाम रिकॉर्ड्स में कम मिलता है, मान लीजिए ‘मधुकर जी’) ने पैदल यात्राएं कीं। नक्सलियों ने उन्हें कई बार जान से मारने की धमकी दी। लेकिन उन्होंने आदिवासियों को दवाइयां देना और बच्चों को पढ़ाना जारी रखा। उन्होंने आदिवासियों को बताया कि बिरसा मुंडा की लड़ाई और संघ की विचारधारा एक ही है। आज झारखंड और दक्षिण बिहार में भाजपा की जो पकड़ है, वह उसी त्याग का नतीजा है।

4. मदन दास देवी और विद्यार्थी परिषद (ABVP)

बिहार में संघ की नर्सरी तैयार करने में मदन दास देवी (जो बाद में सह-सरकार्यवाह बने) का बहुत बड़ा हाथ था। उन्होंने ABVP के जरिए युवाओं को जोड़ा। 90 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव का ‘मंडल राज’ चरम पर था, तब कॉलेजों में राष्ट्रवाद की अलख जगाने का काम मदन दास देवी के मार्गदर्शन में हुआ। उन्होंने बिहार के युवाओं को जाति से ऊपर उठकर सोचना सिखाया।

भाग 2: ओडिशा – चक्रवात से परिवर्तन तक (From Cyclone to Saffron Surge)

ओडिशा की कहानी बिहार से थोड़ी अलग है। ओडिशा भगवान जगन्नाथ की धरती है, स्वभाव से शांत और धार्मिक। लेकिन यहाँ दशकों तक कांग्रेस और बाद में बीजू जनता दल (BJD) का एकछत्र राज रहा। संघ यहाँ कैसे बढ़ा?

1. 1999 का महाचक्रवात (Super Cyclone) – एक टर्निंग पॉइंट

ओडिशा में संघ के इतिहास को 1999 के पहले और बाद में बांटा जा सकता है। जब महाचक्रवात आया, तो सरकार और प्रशासन लाचार हो गए थे। हज़ारों लाशें सड़कों पर थीं।

  • सेवा भारती का काम: उस समय संघ के स्वयंसेवक (Swayamsevaks) अपनी खाकी निकर पहनकर पानी में उतर गए। उन्होंने उन लाशों का अंतिम संस्कार किया जिन्हें उनके अपने परिजन भी छूने से डर रहे थे।
  • असर: ओडिया समाज ने पहली बार संघ को करीब से देखा। उन्हें लगा कि ये लोग सिर्फ लाठी घुमाना नहीं जानते, ये सेवा करना भी जानते हैं।

2. स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती – वो संत जिन्होंने जीवन दे दिया

ओडिशा में संघ परिवार के विस्तार की बात स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के बिना अधूरी है। वे संघ के पदाधिकारी नहीं थे, लेकिन वे VHP (विश्व हिन्दू परिषद) और वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यों का केंद्र बिंदु थे।

  • कंधमाल का शेर: स्वामी जी ने कंधमाल के आदिवासी इलाकों में 40 साल तक काम किया। उन्होंने गौ-रक्षा, नशामुक्ति और धर्मांतरण रोकने के लिए अभियान चलाया।
  • संघर्ष: 2008 में जन्माष्टमी की रात उनकी नृशंस हत्या कर दी गई। इस घटना ने पूरे ओडिशा को हिला दिया। उनकी हत्या के बाद जो जनाक्रोश उमड़ा, उसने ओडिशा में ‘हिन्दुत्व’ की राजनीति को एक धुरी पर ला खड़ा किया। संघ ने उनके बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दिया और आदिवासी क्षेत्रों में अपने सेवा कार्यों को दोगुना कर दिया।

3. शिक्षा का जाल – सरस्वती शिशु मंदिर

ओडिशा में संघ की सफलता का सबसे बड़ा राज है – Saraswati Shishu Mandir (सरस्वती शिशु विद्या मंदिर)।

  • गांव-गांव में खुले इन स्कूलों ने ओडिया मध्यम वर्ग को अपनी तरफ खींचा। यहाँ न केवल सस्ती और अच्छी शिक्षा मिलती थी, बल्कि बच्चों को ‘संस्कार’ भी मिलते थे।
  • अनसुनी कहानी: 90 के दशक में ओडिशा के एक तटीय गांव में एक स्कूल शुरू करने वाले ‘प्रधानाचार्य जी’ (एक स्वयंसेवक) की कहानी बहुत मशहूर है। उनके पास स्कूल की छत नहीं थी, पेड़ के नीचे पढ़ाते थे। आज उस जिले के कलेक्टर और एसपी उसी पेड़ के नीचे पढ़कर निकले हैं। ये पूर्व छात्र आज संघ की विचारधारा के मूक समर्थक (Silent Supporters) हैं।
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4. सुनील देवधर और पूर्वोत्तर से सीखा सबक

हालांकि सुनील देवधर मुख्य रूप से त्रिपुरा मॉडल के लिए जाने जाते हैं, लेकिन संगठन मंतरी के रूप में ओडिशा में भी संघ की कार्यपद्धति को आधुनिक बनाने में केंद्रीय नेतृत्व का बड़ा हाथ रहा। उन्होंने प्रचारकों को सिखाया कि ओडिशा के आदिवासियों और तटीय लोगों की भाषा और संस्कृति को अपनाकर ही उन्हें जीता जा सकता है।

भाग 3: प्रचारक का जीवन – एक ‘लिविंग डॉक्यूमेंट’ (The Life of a Pracharak)

बिहार और ओडिशा में काम करने वाले प्रचारकों का जीवन किसी तपस्या से कम नहीं रहा। इन राज्यों में गर्मी, गरीबी और बाढ़ का प्रकोप रहता है।

  • साइकिल और सत्तू: बिहार के कई बुजुर्ग स्वयंसेवक बताते हैं कि 80 के दशक में प्रचारक साइकिल पर मीलों चलते थे। खाने के लिए जेब में सिर्फ ‘सत्तू’ होता था। रात को किसी कार्यकर्ता के घर रुकते थे या स्कूल के बरामदे में सो जाते थे।
  • जाति का बैरियर: बिहार में सबसे बड़ी चुनौती थी – प्रचारक की जाति न पूछी जाए। संघ ने यह नियम बनाया कि प्रचारक अपने नाम के पीछे सरनेम नहीं लगाएंगे। इससे बिहार के जाति-प्रधान समाज में एक नया संदेश गया।
  • प्रतिकूल परिस्थितियां: ओडिशा के कालाहांडी (जो भुखमरी के लिए जाना जाता था) में काम करना मौत को दावत देने जैसा था। वहां मलेरिया और कुपोषण से लड़ते हुए संघ के कार्यकर्ताओं ने वनवासी कल्याण आश्रम खड़े किए।

भाग 4: सामाजिक समरसता – संघ का मास्टरस्ट्रोक (Social Engineering)

बिहार और ओडिशा में संघ ने राजनीति नहीं, ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की।

  • बिहार में दलित उत्थान: संघ ने बिहार में मुसहर और डोम जैसी जातियों के बीच काम किया। ‘सेवा भारती’ ने उनकी बस्तियों में बाल संस्कार केंद्र खोले। पहले जहाँ सवर्ण और दलित एक पंगत में नहीं बैठते थे, संघ के कार्यक्रमों में वे एक साथ भोजन करने लगे।
  • ओडिशा में वनवासी अस्मिता: ओडिशा में संघ ने आदिवासियों को बताया कि वे हिन्दू समाज का ही अभिन्न अंग हैं। उन्होंने ‘शबरी कुंभ’ जैसे आयोजन किए, जिससे आदिवासियों में गौरव का भाव जगा।

भाग 5: 2026 का परिदृश्य – अब संघ कहाँ खड़ा है?

आज, जब संघ 100 साल का हो गया है, बिहार और ओडिशा की तस्वीर देखिए:

  1. ओडिशा: 2024 के चुनावों में ओडिशा में भाजपा की सरकार बनी (एक संभावित परिदृश्य)। इसका श्रेय मोदी लहर को दिया गया, लेकिन जमीन तैयार करने का काम उन शिशु मंदिरों और वनवासी कल्याण आश्रमों ने किया था जिन्होंने 30 साल तक खामोशी से काम किया।
  2. बिहार: बिहार में जातिगत राजनीति अभी भी है, लेकिन अब ‘हिन्दुत्व’ एक बड़ा वोट बैंक बन चुका है। राम नवमी के जुलूसों में जो भीड़ उमड़ती है, वह संघ की शाखाओं के विस्तार का प्रमाण है।
  3. नेटवर्क: आज बिहार के लगभग हर ब्लॉक और ओडिशा की हर पंचायत में संघ की उपस्थिति है। चाहे वह शाखा के रूप में हो, एकल विद्यालय के रूप में हो या आरोग्य मित्र के रूप में।

भाग 6: कुछ अनसुने किस्से (Anecdotes of Grit)

  • किस्सा 1: 1989 के भागलपुर दंगों के दौरान, संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी जान पर खेलकर कई मुस्लिम परिवारों को भी सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया था। यह कहानी अक्सर मुख्यधारा की मीडिया में नहीं आती क्योंकि यह संघ की ‘कट्टरपंथी’ छवि के विपरीत है।
  • किस्सा 2: ओडिशा के क्योंझर जिले में एक प्रचारक ने 15 साल तक सिर्फ इसलिए चप्पल नहीं पहनी क्योंकि उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक इस गांव के हर आदिवासी बच्चे को स्कूल नहीं भेज दूंगा, तब तक नंगे पैर रहूँगा। 2026 में वह गांव 100% साक्षर है।

मौन साधकों को नमन

संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर, जब दिल्ली और नागपुर में भव्य समारोह हो रहे हैं, तब हमें बिहार और ओडिशा के उन सुदूर गांवों को याद करना चाहिए। वहाँ आज भी कोई प्रचारक अपनी पुरानी साइकिल पर, कंधे पर झोला टांगे, किसी आदिवासी बस्ती की ओर जा रहा होगा – बिना किसी पद की लालसा के, बिना किसी फोटो छपवाने की चाहत के।

इन राज्यों में संघ की सफलता का राज कोई जादू की छड़ी नहीं थी। यह राज था – धैर्य (Patience)। उन्होंने बीजों को फल देने के लिए 50 साल इंतजार किया।

ओडिशा में ‘नवीन बाबू’ के किले को भेदना हो या बिहार में ‘लालू-नीतीश’ के सामाजिक न्याय के किले में सेंध लगाना हो – यह सब संभव हुआ क्योंकि संघ ने राजनीति से पहले समाज को बदलने का बीड़ा उठाया।

2026 में खड़ा भारत जिस ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की बात करता है, उसकी नींव में बिहार और ओडिशा के इन अनगिनत, अनाम स्वयंसेवकों का पसीना मिला हुआ है।

शताब्दी वर्ष पर ऐसे सभी ज्ञात-अज्ञात तपस्वियों को नमन!

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