वर्ष 2026 की शुरुआत भारतीय शेयर बाजार के लिए अपेक्षा के अनुरूप सकारात्मक नहीं रही है। जहां एक ओर निवेशक नए साल में नई ऊंचाइयों की उम्मीद कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बाजारों से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है।
भारतीय शेयर बाजार के लिए खतरे की घंटी या निवेश का अवसर?
दलाल स्ट्रीट पर पिछले दो हफ्तों से भारी अफरा-तफरी का माहौल है। आज, 18 जनवरी 2026 को सामने आए आंकड़ों ने बाजार विश्लेषकों और खुदरा निवेशकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 के पहले 15 दिनों में ही भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी दर्ज की गई है, जिसका कुल आंकड़ा 22,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। यह निकासी इतनी तीव्र और भारी है कि इसने सेंसेक्स और निफ्टी की चाल को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है और बाजार की धारणा (Market Sentiment) को नकारात्मक कर दिया है।
1. नए साल का झटका: जनवरी में बिकवाली की सुनामी
आमतौर पर, जनवरी के महीने को शेयर बाजार के लिए ‘एलोकेशन’ (Allocation) का महीना माना जाता है। वैश्विक फंड मैनेजर्स नए साल की शुरुआत में अपनी निवेश रणनीतियों को फिर से संतुलित करते हैं और उभरते बाजारों (Emerging Markets) में नया पैसा लगाते हैं। लेकिन 2026 की कहानी बिल्कुल उल्टी है। 1 जनवरी से 15 जनवरी के बीच, विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार में खरीदारी करने के बजाय आक्रामक तरीके से बिकवाली की है।
आंकड़ों की जुबानी: नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के मुताबिक, इक्विटी सेगमेंट से शुद्ध निकासी का आंकड़ा 22,000 करोड़ रुपये (लगभग 2.6 बिलियन डॉलर) को पार कर गया है। यह पिछले कई महीनों में किसी पखवाड़े में हुई सबसे बड़ी निकासी में से एक है। इस विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी का सीधा असर प्रमुख सूचकांकों पर पड़ा है। निफ्टी 50 अपने सर्वकालिक उच्च स्तर से काफी नीचे फिसल गया है और मिडकैप-स्मॉलकैप शेयरों में भी भारी गिरावट देखी गई है।
बाजार में यह गिरावट केवल एक या दो सत्रों तक सीमित नहीं थी, बल्कि पिछले 15 दिनों में विदेशी निवेशकों ने लगभग हर कारोबारी सत्र में नेट सेलिंग (शुद्ध बिकवाली) की है। जब विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) इतनी बड़ी मात्रा में शेयर बेचते हैं, तो बाजार में तरलता (Liquidity) का संकट पैदा हो जाता है और कीमतों पर नीचे की ओर दबाव बनता है।

2. अमेरिका का प्रभाव: बॉन्ड यील्ड और फेड की नीतियां
भारतीय बाजार से पैसा निकलने का सबसे बड़ा कारण अमेरिका में छिपा है। वैश्विक वित्त की दुनिया में एक पुरानी कहावत है—”जब अमेरिका छींकता है, तो पूरी दुनिया को जुकाम हो जाता है।” इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
यूएस बॉन्ड यील्ड में उछाल: जनवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिका की 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड (US 10-Year Bond Yield) में अचानक तेजी देखी गई है। जब अमेरिका में बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज (यील्ड) बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक जोखिम भरे बाजारों (जैसे भारत) से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड में लगाना पसंद करते हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे सुरक्षित अर्थव्यवस्था मानी जाती है, और अगर वहां बिना जोखिम के 4% या 5% का रिटर्न मिल रहा हो, तो कोई भी निवेशक भारत जैसे विकासशील बाजार में जोखिम क्यों उठाएगा? इस “रिस्क-ऑफ” (Risk-off) सेंटीमेंट के कारण ही विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी देखने को मिल रही है।
फेडरल रिजर्व की अनिश्चितता: अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेडरल रिजर्व) की ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है। बाजार उम्मीद कर रहा था कि 2026 में ब्याज दरों में तेजी से कटौती होगी, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मजबूत आंकड़ों और मुद्रास्फीति (Inflation) के दबाव ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। फेड के आक्रामक रुख की आशंका ने विदेशी निवेशकों को सतर्क कर दिया है, जिससे उन्होंने उभरते बाजारों से पैसा खींचना शुरू कर दिया है।
3. ‘महंगा’ भारत: क्या वैल्यूएशन चिंता का विषय है?
वैश्विक कारकों के अलावा, घरेलू कारक भी इस बिकवाली के लिए जिम्मेदार हैं। कई विदेशी ब्रोकरेज हाउस और विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय बाजार का मूल्यांकन (Valuation) अब बहुत महंगा हो गया है।
प्रीमियम वैल्यूएशन का दबाव: भारत हमेशा से ही अन्य उभरते बाजारों (जैसे चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) की तुलना में ‘प्रीमियम’ पर कारोबार करता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों की लगातार तेजी के बाद, निफ्टी का पीई रेश्यो (Price to Earnings Ratio) अपने ऐतिहासिक औसत से काफी ऊपर चला गया है। जब बाजार महंगा होता है, तो निवेशकों के लिए मुनाफावसूली (Profit Booking) करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। विदेशी निवेशकों ने देखा कि भारतीय बाजार ने पिछले साल शानदार रिटर्न दिया है, इसलिए वे अब अपनी टेबल से पैसा हटा रहे हैं और मुनाफा घर ले जा रहे हैं। विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए—यह भारत पर अविश्वास नहीं, बल्कि मुनाफा सुरक्षित करने की रणनीति है।
आय वृद्धि (Earnings Growth) पर संशय: तिमाही नतीजों का मौसम शुरू हो चुका है। कुछ बड़ी आईटी और बैंकिंग कंपनियों के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे हैं या उन्होंने भविष्य के लिए सतर्कता बरती है। अगर कंपनियों की आय (Earnings) शेयर की कीमतों के अनुपात में नहीं बढ़ती है, तो महंगा वैल्यूएशन टिक नहीं पाता। एफपीआई (FPI) इसी बात से आशंकित हैं कि क्या भारतीय कंपनियां अपनी आय में वह वृद्धि दिखा पाएंगी जो उनकी शेयर कीमतों को सही ठहरा सके।
4. चीन की वापसी: सस्ता बाजार खींच रहा है पैसा
वित्तीय बाजारों में पैसा हमेशा वहां जाता है जहां उसे सबसे अच्छा अवसर दिखता है। जनवरी 2026 में एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिल रहा है—भारत से पैसा निकलकर चीन की ओर जा रहा है।
चीन का सस्ता बाजार: चीन का शेयर बाजार पिछले कुछ समय से दबाव में था, जिसके कारण वहां के शेयर्स बहुत सस्ते दाम (Cheap Valuation) पर मिल रहे हैं। दूसरी तरफ, भारत का बाजार बहुत महंगा है। विदेशी निवेशक “महंगा बेचो, सस्ता खरीदो” की रणनीति अपना रहे हैं। चीन की सरकार ने हाल ही में अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कई प्रोत्साहन पैकेजों (Stimulus Packages) की घोषणा की है, जिससे निवेशकों का भरोसा वहां लौट रहा है। इसे वित्तीय भाषा में ‘रोटेशन’ (Rotation) कहते हैं। विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी का एक बड़ा हिस्सा चीन या अन्य सस्ते एशियाई बाजारों में जा रहा है। यह एक सामरिक कदम है जो फंड मैनेजर्स अपने पोर्टफोलियो को संतुलित करने के लिए उठाते हैं।
5. बैंकिंग और फाइनेंशियल सेक्टर पर सबसे बड़ी मार
इस बिकवाली का सबसे ज्यादा असर किस सेक्टर पर पड़ा है? उत्तर है—बैंकिंग और वित्तीय सेवाएं। विदेशी निवेशकों के पोर्टफोलियो में सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय बैंकों (जैसे एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक) का होता है। ये शेयर बाजार में सबसे अधिक लिक्विड (आसानी से खरीदे-बेचे जा सकने वाले) होते हैं। इसलिए, जब भी एफपीआई को भारत से पैसा निकालना होता है, वे सबसे पहले बैंकों के शेयर बेचते हैं।
बैंक निफ्टी में गिरावट: जनवरी के पहले 15 दिनों में बैंक निफ्टी में निफ्टी 50 की तुलना में ज्यादा गिरावट देखी गई है। एचडीएफसी बैंक जैसे दिग्गजों के शेयर दबाव में हैं। चूंकि वित्तीय क्षेत्र का सूचकांकों में सबसे अधिक वजन (Weightage) है, इसलिए जब बैंक गिरते हैं, तो पूरा बाजार नीचे आता है। विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी ने वित्तीय शेयरों को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई है, जिससे खुदरा निवेशकों का पोर्टफोलियो लाल निशान में आ गया है।
6. बजट 2026 से पहले की घबराहट
1 फरवरी 2026 को भारत की वित्त मंत्री केंद्रीय बजट पेश करेंगी। बजट से पहले बाजार में अक्सर अनिश्चितता और सतर्कता का माहौल रहता है।
कैपिटल गेन्स टैक्स का डर: बाजार में अफवाहें और अटकलें हैं कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए इक्विटी पर कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) में बदलाव कर सकती है या कोई नया टैक्स लगा सकती है। विदेशी निवेशक कर नीतियों में किसी भी बदलाव को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं। वे बजट में किसी भी नकारात्मक आश्चर्य से बचने के लिए पहले ही अपनी पोजीशन हल्की कर रहे हैं। राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को लेकर सरकार क्या कदम उठाएगी, इस पर भी सबकी नजर है। यह अनिश्चितता भी विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी को बढ़ावा दे रही है।
7. घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs): रक्षक की भूमिका में
क्या 22,000 करोड़ की निकासी के बाद बाजार को क्रैश नहीं हो जाना चाहिए था? अगर यह 10 साल पहले हुआ होता, तो बाजार ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता। लेकिन 2026 का भारत अलग है। यहां घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) यानी म्यूचुअल फंड्स और बीमा कंपनियां एक दीवार बनकर खड़ी हैं।

सिप (SIP) की ताकत: भारत का आम निवेशक अब समझदार हो गया है। हर महीने हजारों करोड़ रुपये सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए बाजार में आ रहे हैं। जब विदेशी निवेशक शेयर बेचते हैं, तो हमारे घरेलू फंड मैनेजर्स उन शेयरों को खरीद लेते हैं। यही कारण है कि विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी के बावजूद बाजार में गिरावट तो आई है, लेकिन कोई बड़ा क्रैश (Crash) नहीं हुआ है। यह ‘आत्मनिर्भर बाजार’ की निशानी है। एफपीआई अब बाजार की दिशा तय तो कर सकते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह बर्बाद नहीं कर सकते।
8. रुपये पर दबाव: मुद्रा बाज़ार में हलचल
शेयर बाजार और मुद्रा बाजार आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। जब विदेशी निवेशक शेयर बेचते हैं, तो उन्हें रुपये मिलते हैं। इस रुपये को अपने देश ले जाने के लिए वे इसे डॉलर में बदलते हैं (रुपया बेचते हैं, डॉलर खरीदते हैं)। इससे भारतीय रुपये पर दबाव पड़ता है।
महंगा डॉलर: जनवरी के पहले 15 दिनों में रुपये में कमजोरी देखी गई है। रुपया डॉलर के मुकाबले अपने निचले स्तरों के करीब पहुंच रहा है। कमजोर रुपया भारत के लिए अच्छा नहीं है क्योंकि इससे हमारा आयात (विशेषकर कच्चा तेल) महंगा हो जाता है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है और रुपये को स्थिर रखने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रहा है। विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी का यह एक साइड इफेक्ट है जो पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
9. खुदरा निवेशकों (Retail Investors) का डर और रणनीति
बाजार में आई इस गिरावट ने उन नए निवेशकों को डरा दिया है जिन्होंने पिछले एक-दो साल में बाजार में प्रवेश किया है। उन्होंने अब तक केवल तेजी देखी थी, मंदी नहीं। पोर्टफोलियो को लाल देखकर पैनिक सेलिंग (Panic Selling) करना उनकी सबसे बड़ी गलती हो सकती है।
क्या करें निवेशक? विशेषज्ञों की राय है कि यह गिरावट घबराने का नहीं, बल्कि अच्छे शेयरों को जमा करने का मौका है। विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी एक अल्पकालिक (Short Term) घटना है। भारत की दीर्घकालिक (Long Term) विकास गाथा अभी भी बरकरार है।
- लंबी अवधि का नजरिया: अगर आपका नजरिया 5-10 साल का है, तो एफपीआई की बिक्री से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए।
- क्वालिटी स्टॉक्स: उन कंपनियों पर ध्यान दें जिनके फंडामेंटल मजबूत हैं, लेकिन एफपीआई की बिक्री के कारण उनके शेयर सस्ते हो गए हैं।
- सिप जारी रखें: अपनी एसआईपी को किसी भी हाल में न रोकें। गिरावट के दौरान आपको उसी पैसे में ज्यादा यूनिट्स मिलती हैं, जो भविष्य में बड़ा मुनाफा देती हैं।
10. वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions)
रूस-यूक्रेन संघर्ष, मध्य पूर्व में तनाव और लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर हमले—ये सभी मुद्दे 2026 में भी किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। भू-राजनीतिक तनाव कच्चे तेल की कीमतों को अस्थिर करता है और वैश्विक व्यापार को बाधित करता है। विदेशी निवेशक जोखिम से बचते हैं। जब दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो वे अपनी पूंजी को सुरक्षित ठिकानों पर ले जाते हैं। भारत, तेल का एक बड़ा आयातक होने के नाते, तेल की बढ़ती कीमतों के प्रति संवेदनशील है। यह जोखिम भी एफपीआई को भारत से पैसा निकालने के लिए मजबूर कर रहा है।
11. मिडकैप और स्मॉलकैप में बुलबुला फूटने का डर
जहां निफ्टी और सेंसेक्स में गिरावट का कारण मुख्य रूप से एफपीआई की बिक्री है, वहीं मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में गिरावट का कारण ‘अत्यधिक वैल्यूएशन’ है। सेबी (SEBI) और म्यूचुअल फंड्स ने पहले ही इन सेगमेंट्स में ‘फ्रॉथ’ (झाग या बुलबुला) की चेतावनी दी थी। विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी ने ट्रिगर का काम किया है। जब बड़े शेयर गिरते हैं, तो उसका मनोवैज्ञानिक असर छोटे शेयरों पर भी पड़ता है। निवेशक जोखिम कम करने के लिए स्मॉलकैप से पैसा निकालते हैं, जिससे वहां गिरावट ज्यादा तेज होती है।
12. आईटी सेक्टर की सुस्ती
अमेरिका और यूरोप में मंदी की आशंका के कारण भारतीय आईटी सेक्टर (IT Sector) दबाव में है। एफपीआई के पास आईटी कंपनियों के बहुत शेयर होते हैं। चूंकि आईटी कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता है, और वहां की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं हैं, इसलिए एफपीआई आईटी शेयरों में अपनी हिस्सेदारी कम कर रहे हैं। विप्रो, इंफोसिस और टीसीएस जैसी कंपनियों के शेयरों में जनवरी में दबाव देखा गया है। यह सेक्टर निफ्टी का एक प्रमुख अंग है, इसलिए इसकी कमजोरी पूरे सूचकांक को नीचे खींच रही है।
13. क्या यह गिरावट जारी रहेगी? भविष्य का अनुमान
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी कब रुकेगी? बाजार विश्लेषकों का मानना है कि जनवरी का बाकी महीना भी उतार-चढ़ाव भरा रह सकता है।
- बजट तक अस्थिरता: जब तक बजट पेश नहीं हो जाता और सरकार की नीतियां स्पष्ट नहीं हो जातीं, तब तक विदेशी निवेशक ‘देखो और इंतजार करो’ (Wait and Watch) की नीति अपना सकते हैं।
- फेड की बैठक: अमेरिकी फेडरल रिजर्व की अगली बैठक के नतीजे बाजार की दिशा तय करेंगे।
- कमाई का मौसम: अगर भारत की बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां अच्छे नतीजे पेश करती हैं, तो एफपीआई का भरोसा लौट सकता है।
हालांकि, ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि एफपीआई भारत जैसे उच्च विकास वाले बाजार से ज्यादा दिन तक दूर नहीं रह सकते। जैसे ही वैल्यूएशन थोड़ा आकर्षक होगा और वैश्विक स्थिति स्थिर होगी, वे वापस आएंगे।
14. भारत की मैक्रो-इकॉनमी (Macro-economy) की मजबूती
भले ही शेयर बाजार से पैसा निकल रहा हो, लेकिन भारत की मैक्रो-इकॉनॉमिक स्थिति (मूलभूत आर्थिक स्थिति) मजबूत है।
- जीडीपी ग्रोथ: भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। आरबीआई का अनुमान है कि 2026 में भी विकास दर 7% के आसपास रहेगी।
- मुद्रास्फीति नियंत्रण: महंगाई दर आरबीआई के संतोषजनक दायरे में है।
- विदेशी मुद्रा भंडार: भारत के पास 600 बिलियन डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो किसी भी बाहरी झटके को सहने के लिए पर्याप्त है। यही कारण है कि विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी को एक अस्थायी सुधार (Correction) माना जा रहा है, न कि आर्थिक संकट।
15. धैर्य ही कुंजी है
अंत में, 18 जनवरी 2026 की यह स्थिति शेयर बाजार के चक्र का एक हिस्सा है। बाजार कभी भी सीधी रेखा में ऊपर नहीं जाता। जनवरी के पहले 15 दिनों में ₹22,000 करोड़ की निकासी एक बड़ा आंकड़ा जरूर है, लेकिन यह भारत की कहानी का अंत नहीं है।
यह समय घबराने का नहीं, बल्कि विश्लेषण करने का है। विदेशी निवेशक अपने वैश्विक समीकरणों के हिसाब से पैसा डालते और निकालते हैं। एक भारतीय निवेशक के रूप में, आपको भारत की विकास गाथा पर भरोसा करना चाहिए। अतीत में भी हमने 2008, 2013 और 2020 में इससे भी बड़ी निकासी देखी है, और हर बार भारतीय बाजार ने वापसी की है और नई ऊंचाइयों को छुआ है।
विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी उन निवेशकों के लिए एक अवसर है जो छूट पर (Discount) अच्छे शेयर खरीदना चाहते थे। याद रखें, शेयर बाजार में पैसा धैर्यवान निवेशकों के पास ही जाता है जो शोर-शराबे (Noise) को नजरअंदाज करके बुनियादी बातों (Fundamentals) पर ध्यान देते हैं।
बजट आने वाला है, नतीजे आ रहे हैं, और भारत बढ़ रहा है। यह उतार-चढ़ाव तो चलता रहेगा, लेकिन लंबी अवधि में जीत उसी की होगी जो बाजार में बना रहेगा।
निवेश करें, समझदारी से।
