भारत का इतिहास सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहरों, वास्तुकला और धर्म के अद्वितीय संगम से भरा पड़ा है। लेकिन कई बार इन ऐतिहासिक इमारतों की असली पहचान समय के थपेड़ों और आक्रमणों के कारण धुंधली पड़ जाती है। मध्य प्रदेश के धार (Dhar) जिले में स्थित ‘भोजशाला’ (Bhojshala) एक ऐसी ही ऐतिहासिक इमारत है, जो दशकों से हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच कानूनी और आस्था की लड़ाई का केंद्र रही है।
जहां हिंदू पक्ष इसे माता वाग्देवी (मां सरस्वती) का प्राचीन मंदिर और शिक्षा का बड़ा केंद्र मानता है, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे ‘कमाल मौला मस्जिद’ के रूप में देखता आया है। लेकिन हाल ही में उच्च न्यायालय के आदेश पर हुए वैज्ञानिक सर्वेक्षण और उसके बाद सामने आई Dhar Bhojshala ASI Report ने इस पूरे विवाद की दिशा ही बदल दी है। इस रिपोर्ट में मिले अकाट्य सबूतों ने ऐतिहासिक सच्चाई को फिर से उजागर कर दिया है, जिसे हिंदू पक्ष की एक बहुत बड़ी जीत माना जा रहा है।
आइए विस्तार से जानते हैं कि इस सर्वे के दौरान ऐसे कौन से प्रमुख सुबूत मिले हैं, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि भोजशाला मूल रूप से एक भव्य हिंदू मंदिर ही था।
भोजशाला का ऐतिहासिक महत्व (Historical Significance)
भोजशाला का निर्माण 11वीं शताब्दी में परमार वंश के सबसे प्रतापी और विद्या-प्रेमी शासक राजा भोज (Raja Bhoj) ने करवाया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, यह इमारत केवल एक मंदिर नहीं थी, बल्कि यह संस्कृत और वैदिक शिक्षा का एक बहुत बड़ा विश्वविद्यालय था। इस परिसर में माता वाग्देवी (Saraswati) की एक अत्यंत सुंदर और भव्य मूर्ति स्थापित थी।

बाद के वर्षों में, जब भारत पर इस्लामी आक्रमणकारियों (विशेषकर अलाउद्दीन खिलजी और अन्य सुल्तानों) का हमला हुआ, तो इस शिक्षा के केंद्र को भारी नुकसान पहुंचाया गया और इसे एक दरगाह व मस्जिद का रूप देने का प्रयास किया गया। तभी से यह स्थान विवादों में रहा।
Dhar Bhojshala ASI Report: सर्वे में मिले चौंकाने वाले खुलासे
हाई कोर्ट के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम ने भोजशाला परिसर का बेहद बारीकी से वैज्ञानिक और रडार सर्वे (GPR Survey) किया। कई हफ्तों तक चले इस सर्वे के बाद 2000 से अधिक पन्नों की जो Dhar Bhojshala ASI Report अदालत में पेश की गई, उसमें हिंदू मंदिर होने के कई पक्के प्रमाण मिले हैं:
1. देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां
सर्वेक्षण के दौरान दीवारों, स्तंभों और जमीन की खुदाई में कई देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। इनमें भगवान शिव, गणेश, ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के अवतारों की नक्काशी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इसके अलावा, यक्ष और यक्षिणियों की आकृतियां भी मिली हैं, जो परमार कालीन हिंदू मंदिर वास्तुकला (Temple Architecture) का अभिन्न हिस्सा मानी जाती हैं। किसी भी इस्लामी इमारत या मस्जिद में इस तरह की मूर्तियों का होना पूरी तरह से वर्जित होता है, जो इसे एक मंदिर साबित करता है।
2. संस्कृत श्लोक और नक्काशीदार स्तंभ
परिसर के 84 से ज्यादा स्तंभों (Pillars) की जांच में पाया गया कि ये पिलर्स एक प्राचीन मंदिर के हैं। इन स्तंभों पर कमल के फूल, शंख, चक्र, घंटी और स्वास्तिक के निशान खुदे हुए हैं। इसके साथ ही कई दीवारों पर संस्कृत में श्लोक और ब्राह्मी व प्राकृत लिपि में लेख उकेरे गए हैं। ये शिलालेख राजा भोज के समय के व्याकरण और कविताओं के अंश हैं।
3. प्राचीन हवन कुंड (Fire Altar)
Dhar Bhojshala ASI Report का सबसे अहम हिस्सा वह खोज है जहां परिसर के भीतर एक बहुत पुराना ‘हवन कुंड’ मिला है। वैदिक शिक्षा केंद्रों और गुरुकुलों में हवन और यज्ञ नियमित रूप से किए जाते थे। इस हवन कुंड का आकार और इसकी बनावट पूरी तरह से हिंदू कर्मकांडों के अनुसार है, जो इस बात पर मुहर लगाता है कि यहां सदियों पहले वैदिक मंत्रोच्चार हुआ करते थे।

4. वास्तुकला में परमार शैली
पुरातत्वविदों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि इमारत का मूल ढांचा (Original Structure) पूरी तरह से ‘परमार शैली’ का है। मस्जिद के लिए जो गुंबद या मेहराब बाद में बनाए गए, वे असल ढांचे के ऊपर अलग से जोड़े गए प्रतीत होते हैं। पत्थरों की कार्बन डेटिंग (Carbon Dating) से भी यह साबित हुआ है कि मूल इमारत इस्लामी शासकों के आने से कई सौ साल पहले ही बन चुकी थी।
एक नजर में ASI सर्वे के प्रमुख साक्ष्य
| साक्ष्य का प्रकार (Type of Evidence) | विवरण (Description) | मंदिर होने का प्रमाण |
|---|---|---|
| मूर्तियां (Idols) | शिव, गणेश, ब्रह्मा और नवग्रहों की आकृतियां। | इस्लामी वास्तुकला में मूर्तियां वर्जित हैं। |
| शिलालेख (Inscriptions) | संस्कृत श्लोक और ब्राह्मी लिपि में लिखे गए ग्रंथ। | यह मूलतः एक गुरुकुल और संस्कृत पीठ था। |
| धार्मिक प्रतीक (Symbols) | स्तंभों पर कमल, शंख, घंटी और स्वास्तिक। | स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म के शुभ प्रतीक। |
| हवन कुंड (Havan Kund) | परिसर के भीतर यज्ञ वेदी की उपस्थिति। | वैदिक कर्मकांडों का सीधा सबूत। |
ब्रिटिश म्यूजियम में कैद है असली ‘वाग्देवी’
भोजशाला की कहानी तब तक अधूरी है, जब तक मां वाग्देवी (सरस्वती) की मूल मूर्ति का जिक्र न हो। भोजशाला में स्थापित माता की असली मूर्ति आज भारत में नहीं है।
इतिहासकारों के मुताबिक, ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1902 में मेजर किनकेड (Major Kincaid) नामक एक अंग्रेज अधिकारी इस अष्टधातु की मूर्ति को अपने साथ लंदन ले गया था। आज भी यह अलौकिक मूर्ति लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम (British Museum) में रखी हुई है। हिंदू संगठनों और भारत सरकार द्वारा लंबे समय से इस मूर्ति को वापस भारत लाकर धार की भोजशाला में दोबारा स्थापित करने की मांग की जा रही है।
कानूनी जीत और आगे की राह
Dhar Bhojshala ASI Report का सामने आना ज्ञानवापी (Gyanvapi) और राम जन्मभूमि विवाद की तर्ज पर हिंदू पक्ष के लिए एक बहुत बड़ी कानूनी और नैतिक जीत है। उच्च न्यायालय ने भी ASI के वैज्ञानिक तथ्यों को गंभीरता से लिया है। इन पुख्ता सबूतों ने उस ऐतिहासिक सच को आईना दिखा दिया है, जिसे सदियों से दबाने की कोशिश की जा रही थी।
यह जीत केवल एक इमारत को वापस पाने की नहीं है, बल्कि यह भारत के उस स्वर्णिम इतिहास और शिक्षा-संस्कृति के पुनर्जागरण की जीत है, जिसकी नींव राजा भोज ने रखी थी। उम्मीद है कि जल्द ही कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद भोजशाला अपने पूर्ण गौरव के साथ फिर से स्थापित होगी और शायद वह दिन भी दूर नहीं जब माता वाग्देवी लंदन से अपने असली घर वापस लौटेंगी।

भावेश Tez Khabri के सह-संस्थापक और प्रबंध संपादक हैं। अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के बाद, अब वे पत्रकारिता के माध्यम से समाज में पारदर्शिता लाने का प्रयास कर रहे हैं। भावेश जी मुख्य रूप से राजनीति, क्राइम और शिक्षा से जुड़ी खबरों का नेतृत्व करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि हर खबर पूरी तरह से सत्यापित (Verified) हो।
